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ना बिखरे जिंदगी का रैन बसेरा कहीं, बस नई सुबह की इंतजारी में है सभी : लालिमा घोष

 

हाहाकार
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मानवता का यह हाहाकार
असहनीय प्रतीत समय काल
है टूट रहा मन सबका आज
जैसे जीवन से हो रहा खिलवाड़

आई महामारी बदली रूप विकराल
उमड़ता हुआ जैसे विशाल सैलाब
उजड़ा जिससे अनेक घर परिवार
समस्त विश्व घिरा संकट में आज

सुलझेगी कैसे कठिन विपदाएं?
नदियां उफान कर देखती लाशें
नहीं बुझ रही श्मसान की आगें
अब भी मंत्री गण राजनीति जाने

लाचार लोगों से पैसे की वसूली
कोविड को लेकर भी कालाबाजारी
क्या यही हमारे देश की है पहचान?
है अफसोस, चल रही सब खुलेआम

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शंकित दृष्टि बन गई है महामारी
पॉजिटिव केस जैसे शर्मनाक बीमारी
क्यों सोच है ऐसी दकियानूसी?
भावनाएं घृणा की उजागर होती

एक तरफ अंतिम संस्कार में लगे लोग
सो रहे थक कर ,शमशान में एक ओर
एंबुलेंस की तरह ,कई ऑटो चालक भी
पहुंचा रहे रोगी लेकर ,अस्पताल में ही

फासले दूरियां सब रखते हुए बरकरार
मदद करनी होगी थोड़ी सी इस बार
सिस्टर्स, डॉक्टर्स लगे हैं जैसे दिन रात
आखिरकार जंग जीतना है इस बार

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दुखद छवि कभी ना बने २१वीं सदी
कोशिश हमारी हर पल यही रहेगी
ना बिखरे जिंदगी का रैन बसेरा कहीं
बस नई सुबह की इंतजारी में है सभी।

 

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