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स्त्री, विचार से देह बन जाती है अक्सर : प्रतिभा राजहंस

 

परिभाषा
————–
प्रतिभा राजहंस

मेरे मन में बार- बार उठता है सवाल
कि
मर्यादा की परिभाषा है क्या?
वय:संधि प्राप्ता नायिका- सी
यह खने- खन बदल कैसे जाती है?

स्त्री के लिए मर्यादा यह
तो पुरुष के लिए वह
पति के लिए यह
पत्नी के लिए वह
प्रेमी के लिए यह
और प्रेमिका के लिए वह

और, हर बार
यह परिभाषा, पुरुष के लिए
ज्यादा लचीली हो जाती है
जबकि, तन जाती है
स्त्री के सारे रास्ते रोककर

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आज तक
ऐसी परिभाषा
किसी और चीज की मिली क्यों नहीं ?
जो कि
अपना रूप- सरूप बदलती हो
सामने वाले की औकात देखकर

बचपन से आज तक
जितनी परिभाषाएँ मिलीं
उन्हें शब्दश: रटती – रटाती हुई
और दुहराती- दुहरवाती हुई
सदा, सीखा
और सिखलाया जो था
कि किसी भी चीज की
परिभाषा नहीं बदलती कभी
तो, आज मैं कैसे कहूँ
कि
एक परिभाषा है अपवाद
कि
यह तिलस्मी भी है
कि
इसका ओर- छोर
कभी हम औरतों की पकड़ में नहीं आता है
न ही इसका जिन्न
अलादीन नाम की किसी स्त्री
के हाथों पकड़ाता है

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फिर- फिर
जाने क्यों
मन में उठता है यह सवाल
कि
मर्यादा की परिभाषा है क्या?

2

विचार
————-
देह की दुनिया अलग होती है
विचार की अलग
पर दोनों एकमेक हो जाती है क्यों
किसी पुरुष विचारक के सामने
वह, स्त्री के विचारों को तोलता है
उसके अंगों को देखकर

विचारणीय प्रश्न है
स्त्री, विचार से देह बन जाती है अक्सर
यह तिलस्म जब टूटेगा
विचार का जिन्न
देह के चिराग से छूटेगा
जाने कितने विचारकों का
ब्रह्माण्ड फूटेगा
तब उसी के खाद – पानी से
धरती में
स्वस्थ विचार अंकुरेगा

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विक्रमशीला कालनी

भागलपुर, बिहार

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