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मैं अकेला चलता मुसाफिर था, वो साथ में चलती सहारों सी : मधुरेश

 

 

मधुरेश

 

मैं मुरझाए से फूल सा था,
वो पानी के फुहारों सी।
मैं पतझड़ बेरंग सा था,
वो सावन में बहारों सी।
मैं डूबती नैया बेकरो सा,
वो उम्मीद से बनी किनारों सी।
मैं अकेला चलता मुसाफिर था,
वो साथ में चलती सहारों सी।
मैं मरे हुए शमशानों सा,
वो चुलबुल थी बाजारों सी।
मैं सुन पड़ी मैदानों सा,
वो गूंजते हुई पहाड़ों सी।
मैं बंजर पड़ी जमीन सा था,
वो सूखे में बरसातों सी!!!

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