राम नवमी सभी हिंदुओं के लिए एक खास पर्व है : श्वेता दीप्ति
‘कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं’
डॉ श्वेता दीप्ति, काठमांडू । सनातन धर्म में पूरे वर्ष कोई ना कोई त्योहार मनाया जाता है. जिनका अपना एक अलग महत्व होता है, उसी तरह से राम नवमी का यह त्योहार धरती पर से बुरी शक्तियों के पतन और यहाँ साधारण मनुष्यों को अत्याचारों से मुक्ति दिलवाने के लिए भगवान के स्वयं आगमन का प्रतीक मानी जाती है. इस दिन धरती पर से असुरों के अत्याचारों को समाप्त करने के लिए भगवान विष्णु ने स्वयं धरती पर श्रीराम के रुप में अवतार लिया था. राम नवमी सभी हिंदुओं को मानने वालों के लिए एक खास पर्व है, जिसे वह पूरे उल्लास के साथ मनाता है. इस दिन जन्में श्री राम ने धरती पर से रावण के अत्याचार को समाप्त कर यहाँ राम राज्य की स्थापना की थी और दैवीय शक्ति के महत्व को समझाया था. इस दिन ही नवरात्रि का आखरी दिन होता है, इसलिए दो प्रमुख हिन्दू त्योहारों का एक साथ होना, इस त्योहार के महत्वता को और अधिक बढ़ा देता है. पुराणों में उल्लेख मिलता है कि श्री गोस्वामी तुलसीदास जी ने जिस राम चरित मानस की रचना की थी, उसका शुभारंभ भी उन्होंने नवमी के दिन से किया था.
गोस्वामी तुलसीदास जी लिखित रामचरितमानस एक अनुपम ग्रंथ है जिसकी एक एक चौपाई मंत्र के समान प्रभाव रखती है। इसमें एक से बढ़ कर एक आध्यात्मिक रहस्य छिपे हुए हैं जो जगत जननी माँ आदिशक्ति, प्रभु श्रीराम एवं सद्गुरु की कृपा, आशीर्वाद से ही, साधक के अंतर्मन में उद्घाटित होते हैं।
रामचरितमानस का एक अद्भुत प्रसंग है जिसकी चर्चा यहाँ करने जा रही हूँ । माँ सीता का अपहरण रावण ने कर लिया था । सीता की खोज करते हुए जामवंत, अंगद और हनुमानजी दक्षिण के समुद्र तट तक पहुंच गए थे। यहां से किसी को लंका जाकर सीता के बारे में पता लगाकर वापस आना था। ये काम कौन करेगा, इस पर सभी मंथन कर रहे थे।
सबसे पहले जामवंत ने कहा कि मैं अब बूढ़ा हो गया हूं। वामन अवतार के समय मैं जवान था, लेकिन अब मेरे शरीर में इतनी शक्ति नहीं है कि मैं लंका जा सकूं।
‘जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा। नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा॥
जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी। तब मैं तरुन रहेउँ बल भारी॥’
उसके बाद सबकी आँखें अंगद की तरफ उठीं । तब अंगद ने कहा कि मैं लंका जा तो सकता हूं, लेकिन वापस आ सकूंगा या नहीं, इस पर मुझे संदेह है। यहाँ अंगद को स्वयं की शक्ति पर ही संदेह होता है ।
‘अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा॥’
अंगद के मना करने के बाद जामवंत ने हनुमानजी को इस काम के लिए प्रेरित किया।
‘कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥’
जामवंत ने हनुमानजी से कहा ‘हे हनुमान, हे बलवान। सुनो, तुम चुप क्यों हो? तुम पवन पुत्र हो, बल में पवन के समान हो, तुम बुद्धि-विवेक और विज्ञान की खान हो॥’
‘कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥’
इस संसार में ऐसा कौन सा काम है जो हे तात, तुम नहीं कर सकते हो। रामकाज के लिए ही तुम्हारा अवतार हुआ है। ये बात सुनते ही हनुमान पर्वत के आकार के हो गए।
जामवंत ने हनुमानजी को समझाया कि सिर्फ सीता का पता लगाकर लौट आना । हनुमानजी आत्मविश्वास से भरकर बोले कि अभी एक ही छलांग में समुद्र लांघकर, लंका उजाड़ देता हूं और रावण सहित सारे राक्षसों को मारकर सीता को ले आता हूं। तब जामवंत ने कहा कि नहीं, आप ऐसा कुछ न करें। आप सिर्फ सीता माता का पता लगाकर लौट आइए। हमारा यही काम है। फिर प्रभु राम खुद रावण का संहार करेंगे।
इस प्रसंग का आध्यात्मिक रहस्य यह है कि :— हनुमान जी के लिए वह क्षण आत्मबोध का था, आत्मज्ञान का था, दिव्यशक्ति प्रवाह के अवतरण का था, वामन से विराट होने का था, जब जाम्बवन्त ने उन्हें झकझोरते हुए कहा, ” राम काज लगि तव अवतारा ”
शिष्य–साधक की अंतश्चेतना को जब सद्गुरु की वाणी बारंबार सचेत करती है, राम काज लगि तव अवतारा। राम काज लगि तव अवतारा। जिस क्षण शिष्य साधक को हनुमान जी की तरह यह आत्मबोध हो जाये ? वह वामन से विराट हो जाता है, दिव्यचेतना प्रवाह के अवतरण से बड़े बड़े संकल्प लेने लगता है, लक्ष्यप्राप्त करने के लिए तन, मन, धन न्योछावर करने लगता है।
क्योंकि वह जानता है , कि देनहार कोई और है, भेजत है दिन रैन, मैं तो निमित्त मात्र हूँ। यह कार्य तो परमात्मा का है, लक्ष्यप्राप्त करने के लिए आवश्यक ज्ञान, विद्या, बुद्धि, शक्ति,साधन, संसाधन, सब वही देंगे। आत्मबोध से आत्मविश्वास सौ प्रतिशत हो गया, मैं कर सकता हूँ, मैं करूँगा।
दिव्यचेतना के असीम शक्तिप्रवाह का अवतरण हनुमान जी पर जब उस क्षण हुआ तो ?? सुग्रीव के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर छिप कर रहने वाले,वानरों के समूह में चुप चाप बैठे रहने वाले हनुमान गरजने लगे — ” मैं लंका को गूलर के फल की भाँति समुद्र में डुबा दूँगा, रावण को कुल खानदान समेत नष्ट कर दूँगा, सीता जी को अभी वहाँ से ले आऊँगा। ”
शक्तिप्रवाह सम्भाले नहीं सम्भल रहा था, हनुमान उछल रहे थे, गर्जना कर रहे थे। जो कार्य पहले असंभव माने बैठे थे अब लग रहा था कि ये तो कुछ भी नहीं है। मैं तो इसे खेल खेल में चुटकियों में कर सकता हूँ क्योंकि, “राम काज लगि मम अवतारा ” जो हो गया था।
जाम्बवन्त उन्हें सम्भालते हैं, रोकते हैं, ” नहीं नहीं ! हनुमान ऐसा कुछ नहीं करना है, केवल तुम माता सीता का पता लगा कर, प्रभु श्रीराम का संदेश देकर चले आओ ।
फिर भी हनुमान जी, स्वयं को रोक नहीं पाते, अशोक वाटिका उजाड़ देते हैं, राक्षसों को, रावण के पुत्र अक्षयकुमार को मारते हैं, लंका नगरी में आग लगा देते हैं। इस प्रसंग का तात्पर्य यह है कि साधक- शिष्य में साधनामार्ग पर चलते हुए जब आत्मबोध होता है, ” राम काज लगि मम अवतारा ” तब उसके हृदय में दिव्यशक्तिप्रवाह अवतरित होता है। वह शक्ति अनियंत्रित न हो जाये अन्यथा लक्ष्यप्राप्त न करके भटक कर विध्वंस में न लग जाये, इसलिए शिष्य साधक को तब भी, सद्गुरु के नियंत्रण, निर्देशन, मार्गदर्शन में ही कार्य करते रहना चाहिए, जब तक उस महान लक्ष्य, राम काज की प्राप्ति न हो जाये।
हनुमान जब लंकानगरी से वापस लौटे तो —- ये बात उन्हें भली भाँति समझ में आ गयी थी कि जो कुछ भी हुआ उस में मेरी शक्ति काम नहीं कर रही थी, बल्कि दिव्यशक्ति प्रवाह मुझसे ये असंभव कार्य करवा रहा था। इसीलिये जब प्रभु श्रीराम ने हनुमान जी की प्रशंसा करते हुए, उन्हें गले लगा लिया था तो हनुमान जी ने बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया था — शाखामृग की बड़ी प्रभुताई, शाखा ते शाखा पर जाई, अर्थात पेड़ की डालियों पर उछलने वाले वानर की क्षमता तो बस इतनी सी होती है कि वह एक डाली से दूसरी डाली पर छलाँग मारता रहता है।
‘नाघि सिंधु, हाटकपुर जारा, निशिचर बध सब विपिन उजारा, सो सब तव प्रताप रघुराई।’
अर्थात विशाल समुद्र को उछल कर पार कर लेना, सोने की लंकानगरी को जला देना, राक्षस सब को मारना, अशोक वाटिका को उजाड़ देना, प्रभु ! ये सब असंभव कार्य तो सब आप के ही दिव्यशक्ति प्रवाह के कारण सम्पन्न हुए हैं। इसमें मेरा कुछ भी श्रेय नहीं है।
जो सच्चे शिष्य हैं- साधक हैं, उन्हें हनुमान जी के इस वामन से विराट बनने के आध्यात्मिक रहस्य को मनन, चिंतन कर स्वयं को भी भक्त शिरोमणि हनुमान की तरह स्वयं को राम काज लगी मम अवतारा की भावना के साथ यह दृढ़ संकल्प लेना चाहिए — ‘राम काज किन्हें, बिना, मोंहि कहाँ विश्राम।’
यह प्रसंग हमें यह सीख देता है कि अपने अन्दर की शक्ति को हमें पहचानना चाहिए । कोई कार्य कठिन नहीं होता । अगर आप ईश्वर को स्मरण करें और अपनी इच्छा शक्ति को जाग्रत करें तो सफलता अवश्य मिलती है ।

