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अक्षरों की रोशनी (लघुकथा) : विनोदकुमार विमल

 

विनोदकुमार विमल, काठमांडू, १ जून, ०२६। शहर के पास एक गांव में रहने वाला भोला बचपन से ही अपने परिवार का भरण – पोषण करने के लिए मज़दूरी करता था । उसे स्कूल जाने का अवसर नहीं मिला । बड़े होने पर एक दिन, शहर में काम की तलाश करते हुए  वह एक सहकारी समिति के कार्यालय गया और उसे वहां नौकरी मिल गई ।

कुछ दिनों बाद, वहां के बॉस  ने भोला को एक बड़ा कागज़ का थैला दिया और कहा, ” इसे लो और श्याम नाम के एक आदमी को दे दो जो बाहर चौक में खड़ा है ।”

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भोला कागज का थैला  लेकर शहर की गलियों में भटकता रहा, लेकिन उसे वह चौराहा नहीं मिला । दफ्तर बंद होने से पहले, वह निराश होकर दफ्तर लौटा और बोला, ” सर ! आपने मुझे कागज पर लिखे अक्षर नहीं बताए । मैं वह कागज़ का थैला तो नहीं पहुँचा सका,  लेकिन रास्ते में मुझे जो लोग मिले, उनकी स्थिति और पीड़ा की मुझे गहरी समझ प्राप्त हुई ।“

बॉस ने आश्चर्य से पूछा, ” तुम्हें क्या समझ आया ?”

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भोला ने विनम्रता से कहा, ” शहर में बहुत से पढ़े – लिखे लोग हैं, लेकिन मानवता का पाठ उनके मन से विमुख होता जा रहा है।  सड़क पर बहुत से भूखे लोग थे, लेकिन पढ़े – लिखे लोगों ने उन्हें अनदेखा कर दिया । मैं पढ़ा – लिखा तो नहीं हूँ, लेकिन मेरी माँ ने मुझे सिखाया है कि किसी को भूखा देखना कितना दुखदायी होता है । शायद यही सच्ची शिक्षा है ।”

बॉस कुछ देर चुप रहे । उन्हें एहसास हुआ कि किताबी ज्ञान किसी को ऊँचा पद तो दिला सकता है, लेकिन अगर दिल में मानवता का भाव न हो, तो शिक्षा अधूरी रह जाती है । उन्होंने भोला को अपने दफ्तर में ज़्यादा वेतन देने का वादा किया और कहा, ” आज से तुम ही मुझे रास्ता दिखाओगे । आज मुझे आखिरकार समझ आ गया कि शिक्षा सिर्फ किताबी ज्ञान या डिग्री नहीं है, बल्कि जीवन का असली अर्थ समझने का एक ज़रिया है ।”

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विनोदकुमार विमल

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