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मधेश ने दिखा दिया कि अब वो अपनी मांग के लिए किसी भी हदतक जा सकता है : कैलाश महतो

 

कैलाश महतो, २ अक्तूबर,परासी

नेपालियो की फितरत सी हो गयी है हिन्दी का विरोध करना, हिन्दी पर पावन्दी लगाना और हिन्दी को सिर्फ भारत की भाषा समझना । नेपाल अगर सफल राष्ट्र होता तो कम से कम इस बात का ज्ञान रखता कि दुनिया की तिसरी शक्तिशली भाषा सिर्फ भारत की नही, अपितु यह मधेश और मधेशियो की गर्वशाली अभिव्यक्ती की माध्यम भी है, जिसे कोई मधेशियो से अलग नही कर सकता । कुछ लोग बचपने मे जी भी रहे होङ्गे कि यह मधेश की भाषा नही हो सकती, मगर हिन्दी उन्हे पुछने तक नही जाती है कि तुम मुझे बोलो । वे खुद हिन्दी के करीब चले जाते है जानकर या न जानकर । वे यह जानते है कि हिन्दी का विरोध कर देने से वे भारत को चुनौती दे रहा है, भारत से लडने का साहस कर रहा है, देश्भक्ती का वो प्रमाण दे रहा है जो कि उनकी बचपना है । वो यह नही जानता कि वो मधेशियो को चुनौती दे रहा है जो सर्वथा उसकी गलत कोशीश होगी ।

भारत से नेपालियो का अपना कोई कुटनीतिक असमझदारी होगी, पर इसका मतलव यह बिलकुल नही होना चाहिए कि भारत से हार का झोक वो किसी बर्ग या समुदाय पर उतारे । वैसे भी नेपालियो ने मधेशियो का बहुत चीजो को मटियामेट कर चुका है । उन्होने मधेश की भाषा, सन्स्कृति, रिति-रीवाज, परम्परा, पहिचान आदी को नामेट करने की कोशीश की  है और बहुत चीज नष्ट भी किया जा चुका है, मगर अब मधेश और बर्दाश्त करने को तैयार नही है ।

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j-3एक मुहाबारा हमारे गाव घर मे प्रचलित है, ” सैंया न जितल त मैया से बदला ।” नेपालियो के अनुसार भारत ने अघोषित रूप से  ही अगर नेपाल के प्रती नाकाबन्दी की है तो उसे कुटनीतिक ढङ्ग से ही समाधान करने के बजाय अन्ध राष्ट्रभक्ती की पराकाष्ठा को नाङ्घकर उसके उत्तर के पडोशी देश चीन से जुडे नाकाओ तथा उसके किसी दुसरे राजमार्गो पर खडे मालबाहक गाडीयो को फेसबुक पर लोड कर कभी भारत से दो गुने सस्ते मे चीन नेपाल को सामान देने को तैयार, तो कभी चीनिया सेना ने भारतिय सेना को दिया धम्की, तो कभी भारत के सामने नेपाल झूक नही सकता, कभी भारत नाकाबन्दी कर नही सकता, कभी नेपाल भारत के स्थायी सदस्य बनने के लिए भोट डालने पर चीन के साथ करेगी विचार तो कभी भारत को एक और झटका- चीन भारत के यू- एन- मे स्थायी सदस्य बनने से रोकने की खबर आदी फिजुल की खबरो को प्रचार प्रसार कर अपना असन्तुष्टी पूरा करने मे मशगूल दिखायी दे रही है- जबकी भारत को इसकी राष्ट्रीयता या इसकी बहादुरी से कुछ लेना देना नही है । क्यूकी भारत आजतक इसके ओछेपन का कोई जबाव ही देना शायद जरूरत नही समझा है, लेकिन सम्भवत: यह देख और सुन जरूर रहा है कि देखे नेपालियो की बहादुरी और आत्मसमान कितना बडा है ।

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जहाँतक चीन की बात है तो चीन दुनिया का जिम्मेबार एक शक्तिशाली राष्ट्र है और वह यह बखूबी जानता है कि नेपाली किसी का हित नही हो सकते । यह चीन और भारत के बीच के शक्ती प्रयोग का भरपूर फायदा लेना चाहता है । यह भी चाहता है कि दोनो राष्ट्रो के बीच नोकझोक होता रहे, जिसका फायदा नेपाली लोग उठाते रहे । चीन का और भारत का विकास एक दुसरे या किसी और की चम्चागिरी करने से नही, अपने मेहनत और बल पर हुई है और ए दोनो राष्ट्र मानव अधिकार और विगत के आन्दोलनकारीयो के साथ किसी राज्य के द्वारा की गयी सम्झौतो के खिलाफ खडे नही हो सकते, क्यूकी वो देश इन्ही सिद्धान्तो के आधारपर आज दुनिया के सामने शक्तिशाली देशो के रूप मे खडे है ।

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मधेश अपने आप मे एक शक्ती की तलाश मे है जो न तो भारत या चीन लगायत के न्यायप्रेमी राष्ट्रो के सहयोग के बिना सम्भव है । मधेश नेपाल से भी मित्रवत रिश्ता कायम रखेगी । नेपाल से मधेश गुजारिश यह जरूर करता है कि जितना जल्द हो, मधेश को उपनिवेश से मुक्त कर दे । मधेश स्वतन्त्र होकर विकास करना चाहता है । मधेश अब और गुलामी नही सहन कर सकता । मधेश ने दिखा दिया है कि अब वो अपने आजादी के लिए किसी भी हदतक जा सकता है । सैकडो मधेशियो के जाने के बाद भी मधेश मरने को तैयार है, महिनो मधेश बन्दी होने के बाद भी मधेश बन्द  विरूद्ध टस से मस नही हो रहा है । अब कौन सा प्रमाण मधेश दे कि विश्व के राष्ट्रो के साथ साथ सन्युक्त राष्ट्र सङ्घ भी बोले कि मधेश को आजाद करो । क्या दुनिया के राष्ट्रो और सन्युक्त राष्ट्र सङ्घ से भी शक्तिशाली नेपाल ही हो गया है ?

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