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चीन का नाम लेकर भारत को धमकी ! सरकार खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चला रही है : श्वेता दीप्ति

 

श्वेता दीप्ति, काठमांडू ,२८ अक्टूबर |

दूर के ढोल सुहाने लगते हैं, जी हाँ आज एक पड़ोसी आँख की किरकिरी बनी हुई है, वहीं दूसरा आँख का तारा बन रहा है । अच्छी बात है, आँख अपनी है, तो मरजी भी अपनी है, जिसे चाहें आँखों में बसाएँ या आँखों से गिराएँ, यह आप पर निर्भर करता है । हेलमेट के प्रचार में एक उक्ति हमेशा देखने को मिलती है “सर है आपका, मर्जी है आपकी” । कमोवेश नेपाल इसी अवस्था से गुजर रहा है । देश की बागडोर जिनके हाथों में है मर्जी भी उन्हीं की है, चाहे तो उबारे चाहे तो डुबाए । सच है कि सत्ता सपनों की खेती करती है, सपने दिखाती है, सपने बाँटती है और इन्हीं सपनों के पीछे जनता आँख बन्द कर चलती है । नया नेपाल, नया संविधान, नई सत्ता, नई सरकार परन्तु जनता के हाथों में नया कुछ नहीं है, वह अपनी पुरानी लीक से भी कई गुणा पीछे चलने को विवश है । एक गरीब और विकास की राह से कहीं दूर देश जम्बो मंत्रीमण्डल के निर्माण में व्यस्त है । और मजे की बात तो यह है कि इस बहुमतीय सरकार में देश के महत्वपूर्ण हिस्से मधेश की भागीदारी शून्य है । तो क्या सत्ता ने मन बना लिया है कि उस हिस्से को देश से अलग कर के देखा जाय ? क्या ऐसा नहीं लग रहा कि सरकार खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चला रही है ? देश रसातल की ओर जा रहा है । उद्योग, व्यवसाय, शैक्षिक संस्थान बन्द हैं । भविष्य दाँव पर लगा हुआ है और प्रधानमंत्री अपने काफिले की गाड़ियों को कम कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ रहे हैं । एक अशिक्षित और बीमार मंत्रीमण्डल विश्व के नक्शे पर एक नया कीर्तिमान स्थापित करने के लिए तैयार है । अब तक सरकार किसी नए एजेन्डे के साथ सामने नहीं आ रही है । अर्जुन को मछली की आँख दिख रही थी और इन्हें सिर्फ और सिर्फ कुर्सी दिख रही है । न तो भूकम्प से पीड़ित जनता इन्हें पहले दिखी थी और न आज पूरे देश की बदहाल जनता दिख रही है । आज भी भूकम्प से पीड़ित जनता त्रिपालों में जिन्दगी बसर कर रही है । बारिश के थपेड़ों को इन्होंने झेल लिया और अब शीत का कहर झेलने को तैयार हैं । परन्तु राहत के नाम पर करोड़ों के वारे न्यारे करने वाले इन सबसे बेखबर अपने अकाउन्टस को भरने पर लगे हुए हैं ।

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रोज नेपाली मीडिया एक नई उम्मीद से भरी खबर सुना रही है, आज चीन से इंधन आ रहा है, आज पेट्रोल आ रहा है तो आज डीजल आ रहा है । परन्तु कड़वा सच यह है कि आज अगर देश अपनी सामान्य गति को छोड़कर भी किसी तरह चल रहा है, तो सिर्फ वह भारत से आ रहे टैंकर की वजह से । चीन से ही लाना है तो अब तक लाया क्यों नहीं जा रहा है ? क्यों जनता बेबसी की जिन्दगी जीने को विवश है ? या फिर चीन का नाम लेकर भारत को धमकी दी जा रही है ? अगर ऐसा है, तो सरकार को यह समझना होगा कि देश धमकी देने की स्थिति में तो बिल्कुल नहीं है । जिस रास्ते से आम आदमी आसानी से नहीं आ जा सकते उस रास्ते से तेल और गैस के टैंकर कैसे आ जा सकते हैं ? सुनने में आ रहा है कि नेपाल की गाड़ियों को चीन में प्रवेश की इजाजत नहीं होगी अगर होगी भी तो केवल २० किलोमीटर तक | बल्कि चीन सीमा तक अपनी गाड़ी से आवश्यक सामान की पूर्ति करेगा, तो क्या इसका मतलब यह है कि चीन को नेपाल पर भरोसा नहीं है ? और हो भी कैसे, जो चीन अपनी जनता पर यकीन नहीं करता और हमेशा खतरा महसूस करता है वह भला किसी दूसरे देश पर भरोसा कैसे कर सकता है ? खैर यह तो चीन का आन्तरिक मामला है, पर हमारी सरकार किस खुशफहमी में है ? जिस रास्ते या नाके से तेल, पेट्रोल, डीजल, इंधन लाने की बात हो रही है, उसकी हालत क्या सरकार को नहीं दिख रही है ? आज रास्ता खुलता है तो कल प्रकृति के प्रकोप से बन्द हो जाता है । साल में कुछ ही महीने वो रास्ते खुले होते हैं और वह भी जोखिमपूर्ण अवस्था में हमेशा होते हैं, तो क्या वह रास्ता आयात निर्यात के लिए सही है ? मान लिया जाय कि सरकार ने मन बना ही लिया है कि अब भारत से नहीं चीन से पेट्रोलियम पदार्थ मंगाया जाय, तो इसे कार्यान्वयन करने में काफी वक्त लगेगा, तब तक जनता का क्या ? क्या जनता भूखी मरेगी ? इस समस्या के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है ? उनके घरों में समस्या नहीं है इसलिए वो शान से कह रहे हैं कि हम भूखे रहेंगे पर नहीं झुकेंगे, परन्तु वास्तविकता इससे कोसों दूर है । न तो इनके लिए गैस की कमी है और न पेट्रोलियम पदार्थ की । खरबों की आर्थिक क्षति को झेलता हुआ देश, नेताओं की गलत नीतियों की बलि चढ़ रहा है । भावुक और अन्धी जनता भी उनके नक्शे कदम पर साथ साथ है । जो थोड़ी बहुत शक्ति बची है वह भारत को कोसने में खर्च की जा रही है । रोज चीन की तारीफ में कसीदे काढ़े जा रहे हैं । सुनने में आया है कि चीन का तेल भारतीय तेल से कहीं अधिक गुणस्तरीय है । यह अच्छी खबर है, किन्तु साथ ही यह भी सुनने में आया है कि चीन के तेल के प्रयोग से यहाँ की गाड़ियों के पार्ट पुर्जे के खराब होने की सम्भावना अधिक है । अगर यह सच है तो मुश्किल है, क्योंकि गाड़ियों के पार्टपुर्जे अधिकांशतः भारतीय होते हैं । हाँ एक उपाय है कि तेल के साथ साथ गाड़ियाँ भी चीन से ही मंगाई जाय तभी आसानी होगी । बात फिर वहीं आएगी कि चाहे कितने भी दावे कर लिए जाय, गालियाँ दी जाय, अन्तर्राष्ट्रीय अदालत में खींचने की धमकी दी जाय पर वास्तविकता यह है कि सहजता जिस ओर है अन्ततः आप उसी ओर जाएँगे ।

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11215701_480534228792867_323094198110764596_nसमस्या देश की है, मधेश की जनता देश की है, मधेश इसी देश का है इसे समझने की मानसिकता बनाएँ सबकुछ सुलझ जाएगा । झूठे आन और अहंकार ने हमेशा विनाश ही किया है, जिसका साक्षी हमारा धर्मग्रंथ और इतिहास है । वर्चस्व की मानसिकता का त्याग और समानता की दृष्टि ही देश के लिए हितकर सिद्ध हो सकती है । वरना जिसतरह बीमार नेता वेन्टीलेटर पर स्वयं रहकर देश को चलाना चाह रहे हैं, वह दिन दूर नहीं जब स्वयं देश को वेन्टीलेटर की जरुरत हो जाएगी ।

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