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‘नेपाल सरकार मांगें माने तो धरना कल वापस हो जाए’

 

सोमवार को भारत की राज्यसभा में नेपाल की नाकेबंदी और वहां ज़रूरी चीज़ों की कमी पर बहस हुई जिसमें विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने फिर उन आरोपों का खंडन किया कि नाकेबंदी में भारत का हाथ है.

नेपाल में नया संविधान बनने के बाद से मधेसी विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और भारत-नेपाल सीमा पर नाकेबंदी के कारण वहाँ ज़रूरी चीज़ों की आपूर्ति नहीं हो पा रही है.

जहां नेपाल में आपसी बातचीत से मामले को सुलझाने की कोशिशें जारी हैं, वहीं कुछ मधेसी नेता बातचीत के लिए भारत आए हैं.

पेश हैं बीबीसी संवाददाता विनीत खरे की नेपाल की तराई मधेस लोकतांत्रिक पार्टी के अध्यक्ष महंत ठाकुर से बातचीत के मुख्य अंश:

भारतीय नेताओं से आपकी क्या बातचीत हुई है?

मधेसी मोर्चा ने जो मधेस आंदोलन आयोजित किया है, उसके विषय में हमने उन्हें बताया और ये भी बताया कि हमें आंदोलन में क्यों जाना पडा.

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मधेस आंदोलन पहली बार नहीं हुआ है. इसके पहले भी आंदोलन हुए थे. समझौते हुए थे. समझौते की महत्वपूर्ण बात थी कि मधेसी जनता के इच्छानुरूप स्वायत्त मधेस प्रदेश होगा.

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समझौते में और भी कई बातें थीं.

पहले (नेपाल के) उप-प्रधानमंत्री कमल थापा भारत आए थे तो उन्होंने एक प्रस्ताव दिया था. उनका कहना था कि अगर आप इससे संतुष्ट हैं तो ठीक है नहीं तो इसमें क्या होना चाहिए? आप लोग मिलकर उसका समाधान कीजिए.

नेपाल के एक मंत्री का भारत आना, आपका यहां आना…आपके आलोचक कहेंगे कि ये नेपाल का आंतरिक मामला है और भारत दखल देता प्रतीत हो रहा है.

ये बात तो सरकार के साथ होनी चाहिए. हम तो एक नागरिक के नाते आए हैं. हम लोगों के साथ जो व्यवहार हो रहा है, हम सिर्फ़ अपनी बात कहने आए हैं, कि हमारे साथ ये हुआ है और इसलिए हम आंदोलन कर रहे हैं.

भारत पर भी ये आरोप लगाया जा रहा है कि उन्होंने ये ब्लॉकेड किया है. जबकि हम सड़कों पर धरना दे रहे हैं, सीमा पर धरना दे रहे हैं, हाइवे पर धरना दे रहे हैं. हम हर जगह शांतिपूर्ण ढंग से बैठते हैं और वो गोली चलाते हैं. इस कारण देश के भीतर का यातायात बंद हो जाता है तो बाहर का सामान कैसे आएगा.

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लोग मारे गए हैं. हिंदुस्तानी मारे गए हैं. ड्राइवर मारे गए थे. पचास से ज़्यादा मधेसी मारे गए हैं. तो हिंसा है, अशांति है. घरों में घुसकर लोगों को मारा गया है, पीटा गया है, उनकी जान ली गई है.

ऐसे वक्त जब नेपाल में दवाइयों, ईंधन आदि की कमी की ख़बरें आ रही हैं, ये आंदोलन कब तक जारी रहेगा?

ये नेपाल सरकार पर निर्भर है. जिस दिन वो राज़ी होंगे, ये (आंदोलन) समाप्त हो जाएगा.

क्या आप किसी नतीजे की ओर बढ़ते हुए लग रहे हैं?

हम लोग वार्ता और संवाद के लिए तैयार रहे हैं, चाहे वो अनौपचारिक रूप से हो या औपचारिक रूप से.

सरकारें बदलीं और फिर जब दूसरी सरकार आई तो भी सरकार के साथ बातचीत हुई है. संवाद चल रहा है लेकिन अभी कोई निष्कर्ष नहीं निकला है.

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भारतीय विदेश नीति पर कई हमले हुए हैं. भारत और नरेंद्र मोदी को लेकर नेपाल में माहौल बदला है.

मैं इस पर कोई टीका टिप्पणी नहीं करना चाहता हूं लेकिन जब कभी मधेस में इस तरह का मामला उठता है तो ये नेपाल सरकार का चलन रहा है कि समाधान करने के बदले उसे वो भारत से जोड़ देते हैं. अभी भी वही किया जा रहा है.

आप नेपाल किस संदेश के साथ वापसी करेंगें?

पहले भी जब आंदोलन हुआ है तब भी हम यहां आते रहे हैं, लोगों से मिलते रहे हैं. उन्हीं लोगों के सामने हमने ये बातें रखीं. उन्होंने कहा है कि ये आपका आंतरिक मामला है और आप इसका मिलजुल कर जल्द से जल्द समाधान कीजिए.

क्या आप संतुष्ट हैं कि आपकी बात यहां सुनी गई है?

जिन लोगों से मैं मिला, उन्होंने धैर्यपूर्वक हमारी बातें सुनी. बहुत सारी बातें उन्हें पता भी थीं. आंदोलन के कारण जो चीज़ें अस्तव्यस्त हैं, इसके बारे में भी उन्हें जानकारी थी.

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