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नेपाल का वार्षिक बजट, पैसा फेको तमाशा देखो : बिम्मीशर्मा

 

 बिम्मीशर्मा,काठमांडू ,३० मई |

पैसा फेको तमाशा देखो जैसा है नेपाल का वार्षिक बजट । जनता की खून–पसीने की कमाई कर (टैक्स) के चुकाए हुए पैसाें को ही बजट के रूप में बडे ताम–झाम के साथ हर साल तमाशा दिखाया जाता है । लाचार जनता इस सरकारी तमाशे को हर साल देखती है । साढे १० खरब रुपएं का बजट ला कर सरकार बडे गर्व से बोलती है हम यह करेगें, वह करेगें । अर्थ मंत्री के बजट भाषण को सुनकर ऐसा लगता है कि पैसे की बुआई वह अपने घर या खेत में करते हैं ।

जितना वेतन में वृद्धि नहीं होता उतने से ज्यादा महँगी का ठिकरा जनता के माथे पर फोड़ा जाता है । जब वेतन में २५ प्रतिशत वृद्धि सिर्फ कमर्चारियों या सरकारी संस्थानो में ही होता है तो महँगाई भी बस वही झेले न ? जो सरकारी नौकरी में नहीं है । छोटी, मोटी नौकरी कर के जो किसी तरह अपनी जिंदगी का जुगाड़ कर रहे हैं उन के भाग में भी महगाई बिन बुलाए मेहमान की तरह आ बैठती है ।

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जो राजनीतिक दल सरकार में जाती है या जो दल देश का बजट पेश करती है वह सिर्फ अपने पार्टी कार्यकर्ता और सरकारी कर्मचारियों को ही इस देश का नागरिक मानती है । बांकी जनता जाए भाड़ में । सरकार और उसकी नौकरशाह के पांचो उंगली घी में और सिर कड़ाही में है । सरकारी कर्मचारी अभी बहुत खुश है वेतन में २५ प्रतिशत ईजाफा होने के कारण । पर शायद वह भूल गए हैं कि बढ़े हुए घोषित वेतन तो महीनें में सिर्फ एक बार मिलती है पर अघोषित महंगाई तो हर दिन बढ़ रही है । पर उस को हटाने के लिए यह तमाशाई सरकार क्या कर रही है ?

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यह सरकार देखने मे ललचाने वाला पर अंदर से खोखला बजट पेश कर के तत्काल भले ही वाहवाही बटोर ले पर कर्यान्वयन में ईमानदारी के अभाव में यह बजेट भी टांय, टायं फिस्स ही सावित होगा । क्योंकि इस देश में ईमानदारी और नैतिकता का सर्वथा अभाव है । देश मे आर्थिक वृद्धिदर है ही नहीं, न सरकार में न जनता में ही बचत की भावना है । बस हर साल कर्ज ले कर घाटा बजट पेश कर के सरकार अपना (अ)धर्म निभा रही है । बिना बचत का कमिशनखोर और कालाबजारियों के लिए यह बजेट भले ही दिवाली मनाने जैसा हो पर आमजनता के लिए मरघट जैसा ही है ।

दशहरा में कर्ज ले कर भी देश के आम नागरिक नए कपडे पहनते हैं । खसी या बकरी काटते हैं वैसे ही सरकार भी कर्ज ले कर और जनता के माथे पर उस कर्ज को मढ़ कर हर साल बजट पर्व धूमधाम से मनाती है । मासिक वृद्ध भत्ता शतप्रतिशत बढ़ा कर, पत्रकारों के इलाज सरकारी अस्पतालों में ५० प्रतिशत छूट दे कर सरकार को लगता है कि उसने बड़ा तीर मार लिया । पर तीर निशाने पर न लगे या इस का फायदा पेंशनधारी नागरिकों और गैर पत्रकारों ने भी ले लिया तो यह सरकार क्या करेगी?

बिना योजना और पूर्वाधार के किसी भी कार्य की घोषणा करना और उस को आधे–अधूरे ही छोड़ देना नेपाल सरकार और यहां के नौकरशाहों का दीर्घ रोग है । “थोथाचनाबाजे घना” वाली उक्ति यहां ठीक बैठती है । हांडी मे भुनने पर वही चना ज्यादा शोर मचाता है जो अंदर से खोखला होता है । यह सरकार भी वही कर रही है । देश तो अंदर से खोखला है, कर्ज मे डूबा हुआ है पर सरकार वेतन वृद्धि और वृद्ध भत्ता मे ईजाफा कर के रेवड़ियां बांट रही है । यह रेवड़ी भी कर्ज ले कर ही खरीदा गया है ।

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वेतन वृद्धि से अच्छा तो महंगाई पर नियत्रंण किया जाता । तेल और गैस की उपल्बधता और सहजता पर ध्यान दिया जाता । पर नहीं नकली जेवरात पर सोने का पालिस लगा कर उस के असली होने का भ्रम फैलाया जा रहा है । पत्रकारिता के नाम पर पार्टीकारिता करने वाले इस बजट को मसाला और नमक, मिर्च लगा कर स्वादिष्ट बनाने में लगे हुए हैं । पर आखिर में कलई तो खुल ही जाएगी ।

महंगाई के सगरमाथा से हम हर दिन दबते जा रहे हैं और सरकार सगरमाथा शिखर की उँचाई और प्रसिद्धि का राग अलाप रही है । भुखे पेट से भजन तो क्या प्रभु का नाम भी नहीं ले सकता कोई । पर सरकार महंगाई, कालाबाजारी और भ्रष्टाचार को अनदेखा कर बजट का बेलुन फुला रही है । इस बजट को फुलाने से देश के नागरिको के ही गले में दर्द होगा और यदि फूट गया तो ईस का हर्जाना भी जनता को अपने पैसे से ही देना पड़ेगा ।

सरकार सुंदर और भव्य बजट की सीढ़ी चढ़ा कर महंगाई के शिखर को छूना सिखा रही है । महँगाई और कालाबजारी से आक्रांत देश की जनता पानी की चाह में मृग तृष्णा जैसे बजट के पीछे भाग रही है । पर अंत मे सरकार और उस के कारिदां ही अपनी प्यास मिटाएगें और जनता बेचारी भूखी, प्यासी ही रह जाएगी । आठ महीने से देश की जनता अति आवश्यक बस्तुओं की अभाव झेल रही है । उनकी अभावों की पूर्ति सहज और सुगम तरीके से कर महंगाइ घटा कर कालाबजारी नियत्रंण करना तो दूर की बात सरकार वेतन वृद्धि का झुनझुना और वृद्ध भत्ता का लालीपप के आकर्षण मे जनता को भुला रही है । और मूर्ख जनता भी नशेड़ी के जैसा लालीपप चूस कर झुनझुना बजाने में मस्त है ।

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बजेट वह वार्षिक तमाशा है जिसे बनाने वाले और और संसद में इस को पेश करने वाला मालामाल होते है । और इसे टिभी, रेडियो में देखने, सुनने और पत्रिका में पढ़ने वाले देश के आम नागरिक चूस कर फेकें गए आम की गुठली को ही अपना नसीब मान कर उसी को खा कर धन्य हो जाती है । और वह भी मुफ्त में नही अपने खून, पसीने की कमाई को टैक्स के रुप में सरकार नाम के जीव के चरणों में न्यौछावर करने के बाद ही । हम जनता अपनी पसीने की गाढी कमाई को महंगाई, भ्रष्टाचार और कालाबजारी के नाम पर हर साल सरकारी मदारी या जोकर के सामने फेंक कर उसके द्धारा दिखाया जाने वाला बजट का यह “तमाशा” हर साल देखने के लिए अभिशप्त हैं । व्यग्ंय ,

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