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चुनाव को बहिष्कार ही नहीं, होने भी नहीं देंगेः अशोक यादव

ashok yadav
 
जैसे, हिमाली क्षेत्रों में १५ हजार, पहाड़ी क्षेत्रों में २३ हजार और मधेश में ५०, ६०, ७० और ७५ हजार जनसंख्या निर्धारण कर बदनीयत ढंग से गांवपालिका बनाया गया है । वास्तव में देखा जाए तो यह अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक भी है । जबकि हमारी मांगे हैं– समान जनसंख्या के आधार पर गांवपालिका बनाया जाए । 
२६० वर्षों से राज्य द्वारा शोषित, पीड़ित वंचित व बहिष्कृत रहे मधेशी, दलित, आदिवासी जनजाति, अल्पसंख्यक पिछड़ावर्ग आदि समुदयों ने संविधान सभा द्वारा बनने वाले संविधान में अपने संवैधानिक अधिकारों को स्थापित करने हेतु संघर्षरत व आंदोलनरत थे । लेकिन संविधान सभा द्वारा उनकी मांगें पूरी नहीं की गई । यहां तक कि संविधान सभा को ही अवसान कर दिया गया और पाँच वर्षों के बाद पुनः संविधान सभा का चुनाव हुआ । इस संविधान सभा द्वारा भी उनकी मांगों को दरकिनार कर जबरन नेपाल का संविधान जारी किया गया । संविधान जारी होेने के पश्चात् ही मौजूदा संविधान को जलाया गया और मधेश में महान् जनविद्रोह का आरंभ किया गया । इसी प्रकार पहाड़ी इलाकों में लिंबूवान, खुंवुवान आंदोलन हुआ । दलित एवं जनजातियों द्वारा सम्पूर्ण देश में आंदोलन किया गया । इन आंदोलन के क्रम में सैकड़ों नेपाली सपूतों को शहादतें देनी पड़ी । आंदोलन के दौरान सरकार व आंदोलनरत दलों के बीच करीब ४० बार बर्ताएं हुईं । २२ सूत्री, २६ सूत्री, ८ सूत्री समझौते हुए । दो–दो बार सरकारें बदलीं । तत्पश्चात् प्रचंड जी के नेतृत्व में सरकार बनी । प्रचंड जी से भी ३ सूत्री सहमति हुई थी । लेकिन प्रचंड जी ने विगत में हुए सभी समझौते को दरकिनार कर दिये और संघीय गठबंधन एवं संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा की सहमति बेगर संविधान संशोधन प्रस्ताव पंजीकृत किये । जबकि मौजूदा संविधान संशोधन प्रस्ताव अधूरा है ।

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अशोक यादव
सीमांकन, नागरिकता, समानुपातिक–समावेशी प्रतिनिधित्व, भाषा आदि जैसे मुद्दें गठबंधन और मोर्चा की मागें हैं । वैसे सीमांकन के सम्बन्ध में शुरु से ही हमारी पार्टी की मांग रही है कि मधेश में एक प्रदेश हो । और मध्यविन्दु में इसकी राजधानी हो । प्रथम संविधान सभा पश्चात् राज्य पुनर्संरचना सुझाव आयोग बनाया गया । और आयोग ने मधेश में दो प्रदेश बनाने के लिए सुझाव दिया । देश की परिस्थिति को मध्य विन्दु निकालने की दृष्टि से हमलोग सहमत भी हुए और हमने यह भी कहा कि पूर्व में झापा से लेकर पश्चिम में पर्सा या चितवन तक एक प्रदेश तथा नवलपरासी से लेकर कञ्चनपुर तक दूसरा प्रदेश बनाया जाए । इसी प्रकार हमने समानुपातिक समावेशी प्रतिनिधित्व, नागरिकता और भाषा के बारे में भी परिमार्जन के लिए कहा । लेकिन नस्लवादी सोच के कारण हमारी मांगों को खटाई में डालकर प्रचंड जी ने जबरन २०७४ वैशाख ३१ गते स्थानीय चुनाव की तारीख घोषणा की है । इससे जाहिर होता है कि सरकार मधेशी, जनजाति, दलित, अल्पसंख्यक समुदायों को फिर से शोषित, वंचित बहिष्कृत व दास बनाना चाहती है । जबकि यह कभी हो ही नहीं सकता है । अगर सरकार यही मानसिकता व धारणा बना रखी है, तो उनके लिए बड़ी भूल होगी ।
सरकार ने स्थानीय चुनाव की तारीख घोषणा की है । जबकि इसमें बहुत ही विविधताएं हैं । जैसे, हिमाली क्षेत्रों में १५ हजार, पहाड़ी क्षेत्रों में २३ हजार और मधेश में ५०, ६०, ७० और ७५ हजार जनसंख्या निर्धारण कर बदनीयत ढंग से गांवपालिका बनाया गया है । वास्तव में देखा जाए तो यह अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक भी है । जबकि हमारी मांगे हैं– समान जनसंख्या के आधार पर गांवपालिका बनाया जाए ।
जहां तक सवाल है चुनाव होने का, तो मैं कहना चाहूंगा कि हमारी सहमति बेगर अगर चुनाव करवाया जाता है, तो हम चुनाव को बहिष्कार ही नहीं, होने भी नहीं देंगे । मैं संस्मरण कराना चाहूंगा कि एमाले के मेची–महाकाली अभियान के दौरान फल्गुन २३ गते ओली ने सप्तरी में मधेशियों के खून से होली खेले अर्थात् ५ मधेशी सपूतों की जानें ली । इस घटना को हम अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उठाएंगे । इस घटना में प्रचण्ड जी मधेशियों के साथ मूकवत् बने रहे और एमाले को संरक्षित किया । इस प्रकार सरकार व नश्लवादी पार्टी एमाले की करतूत को देख कर मधेश के युवाओं में आज आग सुलग रही है । कहीं ऐसा भी न हो कि उस आग को बुझाने के लिए बन्दूकें उठानी पड़े ।
(अशोक यादव, संघीय समाजवादी फोरम नेपाल के केन्द्रीय सदस्य हैं ।)

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