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हमे समृद्ध मधेश चाहिए न कि लाशाे का ढेर : अब्दुल खानं

 

 

अब्दुल खानं, बर्दिया | मध्य देश अाैर मझिम देश के नाम से जाने वाले यह मधेश की भुमी ज्ञान गुन का सागर माना जाता था। यहा महान ऋषि मुनियाे की तपाे भूमी माना जाता था। यहा पर महान राजा महराजा शासन करते थे। काेषी, कमला, गण्डक अाैर सरस्वती जैसी नदीयाे से मधेश हरा भरा अाैर सम्पन रहा है। मधेश मे अनाजाे की पैदावारी भरपुर हुआ करती थी । मह मह महेकने वाला धान, दाल अाैर तेलहन का पैदावार अावश्यकता से अधिक हुवा करता था | लगभग सन १९५० के अास पास तक धान निर्यातकर्ता देशाे मे नेपाल पांचवा स्थान पर था। मधेशी लाेग अपनी जिविका खुद अपने खेत खरियान से चला सक्ते थे। पिच्छले ५०/६० वर्षाे मे मधेश पर निर्भर हाेचुका है। कृषि का गिरावट अत्याधिक हाेने के कारण अर्बाे का चामल खरिद कर अायात करना पडता है। दलहन अाैर तेलहन का भी वही हाल है। जंगल का कटान नदीयाें से अत्यधिक मात्र मे गिट्टी, बालु का उत्खनन् करने से अाज मधेश उजाड अाैर रेगिसतान बनते जा रहा है। पिच्छले चार,पाचं दशक से पहाड़ से मधेश मे अप्रवासन के कारण मधेश का जन घनत्व पहाड के तुलना मे तीन गुना से कम नही है।

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मधेशियाें का मुख्य अार्थिक मेरु दण्ड के रुप मे रहा कृषि ब्यवस्था पुर्णरुप मे लुर हाे चुका है। किसानाे के लिए खाद,बिज,सिचाई का प्रबन्ध सरकार नही करती पर किसानाे पे लगान दिन प्रतिदिन बढती जाती है। किसान गरिब अाैर ऋणी हाेते जाते है। जागिर, नाेकरी नही, ब्यपार कर नही सकते, गुड स्तरहिन शिक्षा जिस कारण मधेशी भूमि बेचने पर मजबुर हाेते जाते है अाज स्थिति यहाँ तक पहुची कि ४५ फिसदी दलित अाैर ४१ फिसदी मुस्लिम भूमि हिन बनचुके है। मधेश मे १९ फिसदी मधेशियाें काे दाे वकत की राेटी नही मिलती। मधेशी युवा विदेश जाने पर मजबुर है, वहाँ पर भी इनकी वही हालत है।

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मधेशयाें का हालात दिन प्रति दिन लाशाे का ढेर बनते जारहा है। बच्चाे मे पाेषण कि कमी, महिलाअाे मे खुन की कमी के कारण मधेशी अल्प  अायु मे ही बुडे दिखते है, अाैर जीवन अायु कम हाेते जाता है। पिच्छले दशक मे राजनीतिक दलाे के कारण पूरा मधेश रणभुमी मे तपदिल हाे चुका है, कब अान्दाेलन हाेगा, कब कहाँ काैन नाैजवान मारा जाऐगा कब पुलिस गाेली चला देगी इसका निश्चित समय नही हाेता, नेता संसद, मन्त्री बनते जा रहे है। गरिब अाैर गरिब हाेते जा रहे है। इसलिए हमे हमारा समृद्धमधेश चाहिए न कि लाशाे का ढेर।

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