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आयुर्वेद का अर्थ ही जीवन का विज्ञान और जीने की कला से सम्बंधित है : डॉ राकेश सिंह

 
डा राकेश कुमार सिंह
एमडी बालरोग
पिएचडी बाल उदररोग (नेपाल में प्रथम)

जनकपुरधाम । आज विश्व स्वास्थ्य दिवस के उपलक्ष्य पर आयुर्वेद चिकित्सा से नेपाल के प्रथम विद्या वारिधि (पि एच डी) से विभूषित डा.राकेश सिंह जी से नेपाल में सहज उपलब्ध दुर्लभ जड़ीबूटियों के सहज उपयोग तथा आयुर्वेद चिकित्सा के नेपाल में विकास हेतु हुए वार्तालाप में डा.राकेश सिंह ने बताया की “आयुर्वेद का अर्थ ही जीवन का विज्ञान और जीने की कला से सम्बंधित है”।
आयुर्वेद (आयुः (जीवन)+ वेद:(विज्ञान) = आयुर्वेद) यह विश्व की प्राचीनतम चिकित्सा प्रणालियों में से एक है। यह ऋग्वेद का उपवेद है। यह विज्ञान, कला और दर्शन का मिश्रण है। ‘आयुर्वेद’ नाम का अर्थ है, ‘जीवन का ज्ञान’ और यही संक्षेप में आयुर्वेद का सार है।
आयुर्वेद विश्व में विद्यमान वह साहित्य है, जिसके अध्ययन पश्चात हम अपने ही जीवन शैली का विश्लेषण कर सकते है।
इस शास्त्र के आदि आचार्य अश्विनीकुमार माने जाते हैं जिन्होने दक्ष प्रजापति के धड़ में बकरे का सिर जोड़ा था। अश्विनी कुमारों से इंद्रने यह विद्या प्राप्त की। इंद्र ने धन्वंतरि को सिखाया। काशी के राजा  दिवोदास धन्वंतरि के अवतार कहे गए हैं। उनसे जाकर सुश्रुत ने आयुर्वेद पढ़ा। (नकुल, सहदेव, अर्कि, च्यवन, जनक, बुध, जावाल, जाजलि, पैल, करथ, अगस्त्य, अत्रि तथा उनके छः शिष्य (अग्निवेश, भेड़, जतुकर्ण, पराशर, सीरपाणि, हारीत) ,चरक और वाग्भट) आदि आयुर्वेद के आचार्य के रुप में प्रतिष्ठित हैं।
चरक, सुश्रुत, काश्यप आदि मान्य ग्रन्थ आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद मानते हैं। इससे आयुर्वेद की प्राचीनता सिद्ध होती है। अतः हम कह सकते हैं कि आयुर्वेद की रचनाकाल ईसा पूर्व ३,००० से ५०,००० वर्ष पहले यानि सृष्टि की उत्पत्ति के आस-पास या साथ का ही है।
चरक मत के अनुसार मृत्युलोक में आयुर्वेद के अवतरण के साथ अग्निवेश के नाम का उल्लेख है।
अग्निवेश ने सर्वप्रथम एक संहिता का निर्माण किया- अग्निवेश तंत्र का जिसका प्रतिसंस्कार बाद में चरक ने किया और उसका नाम चरकसंहिता पड़ा, जो आयुर्वेद का आधार स्तंभ है।
संहिताकाल का समय 5वीं शती ई.पू. से 6वीं शती तक माना जाता है। यह काल आयुर्वेद की मौलिक रचनाओं का युग था। इस समय आचार्यो ने अपनी प्रतिभा तथा अनुभव के बल पर भिन्न-भिन्न अंगों के विषय में अपने पाण्डित्यपूर्ण ग्रन्थों का प्रणयन किया।
आयुर्वेद के त्रिमुनि (चरक, सुश्रुत और वाग्भट,) के उदय का काल भी संहिताकाल ही है। चरक संहिता ग्रन्थ के माध्यम से कायचिकित्सा के क्षेत्र में अद्भुत सफलता इस काल की एक प्रमुख विशेषता है। शल्य चिकित्सा (सर्जरी) के पितामह सुश्रुत ने 300 प्रकार की ऑपरेशन प्रक्रियाओं की खोज की थी। 125 प्रकार औजार को प्रयोग करते थे।सुश्रुत नेत्र शल्य चिकित्सा भी करते थे। सुश्रुत संहिता में मोतियाबिंद के ऑपरेशन करने की विधि को विस्तार से बताया है। उन्हें शल्य क्रिया द्वारा प्रसव कराने का भी ज्ञान था। सुश्रुत को टूटी हुई हड्डी का पता लगाने और उनको जोड़ने में विशेषज्ञता प्राप्त थी। शल्य क्रिया के दौरान होने वाले दर्द को कम करने के लिए वे मद्यपान या विशेष औषधियां देते थे। सुश्रुत श्रेष्ठ शल्य चिकित्सक होने के साथ-साथ श्रेष्ठ शिक्षक भी थे।
आयुर्वेदिक औषधियों के अधिकांश घटक जड़ी-बुटियों, पौधों, फूलों एवं फलों आदि से प्राप्त की जातीं हैं। अतः यह चिकित्सा प्रकृति के निकट है। व्यावहारिक रूप से आयुर्वेदिक औषधियों के कोई दुष्प्रभाव (साइड-इफेक्ट) देखने को नहीं मिलते। अनेकों जीर्ण रोगों के लिए आयुर्वेद विशेष रूप से प्रभावी है।आयुर्वेद न केवल रोगों की चिकित्सा करता है बल्कि रोगों को रोकता भी है।आयुर्वेद भोजन तथा जीवनशैली में सरल परिवर्तनों के द्वारा रोगों के कारक तत्व कफ, पित्त, और वायुको संतुलित कर रोगों को दूर रखने के उपाय सुझाता है। अतःआधुनिकता के दुष्प्रभाव से बचने के लिए यह हमें जीवन जीने की श्रेष्ठ, स्वस्थ व उत्तम शैली सिखाता है। नेपाल के हिमाली,पहाड़ी और ग्रामीण भाग जो की पूर्णतः प्रकृति के समीप है; वहाँ के लोगों को स्थानीय जड़ी बूटी और फल, सब्जी, मसाला लगायत के खाद्यान्न को कैसे ऋताहार, मिताहार और हिताहार अर्थात सम्यक आहार और सम्यक विहार के रूप में प्रयोग किया जाय इसकी जानकारी आम नागरिक को होते ही लोग स्वस्थ और निरोग रहने लगेंगे। यह सहज ही आयुर्वेद के जरिए जन चेतना फैलाया जा सकता है। लोग अज्ञानता वस् बिरुद्ध आहार भी बड़े शौक और मजे से करते हैं; न मौसम का खयाल रखते हैं न अपने शारीरिक गुण धर्म का ही। जो की वाद में रोग को जन्म देता है। अंग्रेजी डाक्टर को कुछ पता है नहीं इसके बारे में। परिणाम स्वरुप वो लोग कुछ भी पथ्य नहीं बताते हैं। लोग छू मन्तर के तलास में रहतें हैं जो एंटीबायोटिक कर दिखाता है। परिणाम चाहे जो हो। लोग संक्रामक विमारियों डरते थे। महामारियाँ फैलती थी। हजारो। लोग मृत्यु के मुख में चले जाते थे। परन्तु आज अंग्रजी औषधियों के अंधाधुंध प्रयोग से मधुमेह, उच्च रक्तचाप, थायरायड और कैंसर जैसे असंक्रामक रोग के चपेट में विश्व की आधी आवादी आ चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन करिव करिव सरेंडर करने की अवस्था में है। थक हार के अब आयुर्वेद और योग की ओर WHO अपना मुख करते दिख रहा है। वर्तमान में नेपाल के श्रद्धेय बालकृष्ण जी जो (चरक,शुश्रुत और वाग्भट के सम्मिलित रूप हैं) और भारत के योगऋषि श्रद्धेय रामदेव बाबा जी जो (पतंजलि)के ही अवतार हैं। विश्व में ही आयुर्वेद का शंखनाद कर रहे हैं। WHO CC For Ayurveda.गुजरात आयुर्वेद विश्वविद्यालय, All India Institude for Ayurved New Delhi. ऐसे बहुतों आयुर्वेदिक सँस्थाए एवं शोध केंद्र सक्रीय है। वैसे हर देस का अपना स्थानीय चिकित्सा प्रणाली होता है। जो वहां के देस काल और परिस्थिति के अनुकूल होता है। यहाँ नेपाल, भारत,श्रीलंका,बंगलादेस आदि में आयुर्वेदिक पद्दति ही जन स्वास्थ का आधार था। जो विदेसी आक्रमण और आधुनिक अंग्रेजी चिकित्सा प्रणाली के कारण शिथिल हो गया था।अब जबकि अंग्रेजी औषधियों के दुष्परिणाम के कारण हर व्यक्ति वीमार और अल्पायु होते जा रहे हैं। इस अवस्था में आयुर्वेदिक जीवन शैली की ओर रुझान बढ़ना स्वाभाविक ही है। हमारे यहाँ छह ऋतुएँ हैं। और सभी के सन्धि काल भी है। इस सन्धि काल में हम अपने आहार विहार में संतुलन न रख पाने के कारण हमारे भीतर के कफ,पित्त और वायु के बिच का संतुलन असंतुलित हो जाता है। जिस के परिणाम स्वरुप हम वीमार पर जातें हैं। इसी प्रकार योग जो आयुर्वेद का अभिन्न अंग है;मनुष्य के शारीरिक और मानसिक सबलता के लिए अनिवार्य है। ब्रह्ममुहूर्त में प्रकृति के सान्निध्य में जाना हजारों रोगों से मुक्ति ओआने के बराबर है। ब्रहमाण्डीय ऊर्जा के श्रोत सूर्य को सुवह में सूर्य नमस्कार योग करके शक्ति संम्पन्न और सहज ही निरोगी जीवन जिया जा सकता है। हिमाल,पहाड़ और तराई के प्राकृतिक विविधिता को स्वास्थ पर्यटन के रूप में विकसित किया जा सकता है। जिससे जडीबुटी के अपार भण्डार को आर्थिक भण्डार में बदला जा सकता है। वही ऋषियों के धरोहर हमारी सांस्कृतिक विरासत को विश्व
मंच पे ससम्मान उपस्थित किया जा सकता है। नेपाल को आयुर्वेद के आधार स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है।
आयुर्वेद चिकित्सा अब नेपाल सरकार के स्वास्थ सम्बन्धी बजेट का मूल विषय बने जो की बहुत सस्ता और सुलभ भी है। क्युकी अपच में अजवाइन और कफ में तुलसी अदरक खाना चाहिए, ए सब को पता है। बस थोड़ी सी वैज्ञानिकता और सचेतता की आवश्यकता है। सरकारी पहल की आवश्यकता है। प्रस्तुति : आजयकुमार झ

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