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चीन चाँद पर करेगा अालू की खेती

 

आधी सदी पहले जब इंसान ने चांद पर कदम रखा तो उसे मानवता की भलाई के लिए लंबी छलांग बताया गया। अब उसी मानवता के कल्याण के लिए चंद्रमा पर बसने की योजना पर काम चल रहा है। इसकी व्यावहारिकता की पड़ताल करने के लिए चीन इसी साल दिसंबर में चंद्रमा के सुदूर क्षेत्र में अपने चेंग 4 लैंडर से आलू के बीज, रेशम के कीड़े और सरसों कुल का पौधा भेज रहा है। चंद्रमा पर ल्युनर बेस बनाने की उसकी योजना का यह मिनी ल्युनर बायोस्फेयर तैयार करना एक हिस्सा है।

क्या है योजना

चीन चंद्रमा पर शोध केंद्र बनाने की योजना पर काम कर रहा है। इसके तहत वह इस बात की पड़ताल कर रहा है कि क्या वहां पर गए अंतरिक्षयात्रियों के ऑक्सीजन और खाद्य जरूरतें वहीं तैयार की जा सकती हैं? इसके लिए आलू के बीज, रेशम के कीड़े और पौधा भेजकर वह मिनी ल्युनर बॉयोस्फेयर बनाना चाहता है।

तैयार होगा पारिस्थितिकी तंत्र

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परियोजना का नेतृत्व कर रहे चोंगक्विंग विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक के अनुसार 18 सेमी लंबे डिब्बे में पौधे और कीड़े बंद रहेंगे जिसमें हवा, पानी और मिट्टी एक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करेंगे। एक ट्यूब के सहारे डिब्बे को प्राकृतिक रोशनी मिलेगी। इससे प्रकाश संश्लेषण क्रिया होगी। पौधा अपना भोजन बनाएगा और ऑक्सीजन अवमुक्त करेगा। इस ऑक्सीजन से हैचिंग से निकले रेशम के कीड़े जीवित रहेंगे। कीड़े कार्बन डाईऑक्साइड और अवशेष पैदा करेंगे जो पौधे के फलने-फूलने में मददगार होगा। जीवन के इस विकास क्रम को धरती पर रहकर लाइव देखा जा सकेगा।

 

आलू है खास

वैज्ञानिकों ने इस अभियान में आलू का ही चयन इसलिए किया है क्योंकि उनका मानना है कि आने वाले दिनों में आलू अंतरिक्षयात्रियों के भोजन का प्रमुख स्नोत बनने जा रहा है। कम समय में तैयार होने के चलते इसका प्रेक्षण आसानी से किया जा सकता है।

दिक्कतें कम नहीं

चंद्रमा का कठोर पर्यावरण वैज्ञानिकों के मकसद के आड़े आ सकता है। तापमान नियंत्रण बड़ी समस्या है। चांद की सतह पर तापमान गिरकर -100 डिग्री सेल्सियस तक चला जाता है जबकि वैज्ञानिक डिब्बे के तापमान को 1 से 30 डिग्री के बीच रखना चाहते हैं।

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गुरुत्व बल का असर

इस अभियान के दौरान वैज्ञानिक यह भी देखना चाहते हैं कि सजीवों पर चंद्रमा का गुरुत्व बल किस तरह असर डालता है? धरती के गुरुत्वाकर्षण से वहां का गुरुत्व बल 16 फीसद है। अध्ययन बताते हैं कि माइक्रोग्रेविटी मानव स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डालते हैं।

चीन के नाम होगी उपलब्धि

अगर यह प्रयोग सफल रहता है तो चांद के सुदूर क्षेत्र में उतरने वाला चीन पहला देश बन जाएगा। लंबी अंतरिक्षयात्रा पर निकले अंतरिक्ष यान में जीवन को मदद करने वाले एक सेल्फ सस्टेनिंग सिस्टम पर भी यह देश काम कर रहा है। साल भर से चल रहा यह प्रयोग अगले महीने समाप्त होगा। इसके तहत छात्रों के तीन बैच को अंतरिक्ष सरीखे हालात वाले बंद केबिन में रखा गया है। वहां वे आलू और फलियां उगाकर उसी से जीवित रह रहे हैं।

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बड़ा बजट

अपने अंतरिक्ष अभियानों पर चीन हर साल तीन अरब डॉलर खर्च करता है। हालांकि अमेरिका के 21 अरब डॉलर के मुकाबले ये बहुत मामूली है। लेकिन इसकी रफ्तार तेज है। भविष्य की योजनाएं नियोजित हैं। 2022 में चीन अकेला देश होगा जिसके पास अंतरिक्ष केंद्र होगा। 2024 में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र की सेवाएं खत्म हो रही हैं। नासा का नया अंतरिक्ष केंद्र 2023 से पहले नहीं तैयार हो पाएगा।

 

पूर्व के अध्ययन

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र में एक खास प्रजाति का फूलदार पौधा और सलाद के पत्ते उगाए गए थे। हाल ही में धरती पर गिरे चीन के अंतरिक्ष लैब तियांगोंग में धान की खेती की गई थी। हालांकि ये सारे शोध चांद के दुरुह वातावरण की बजाय धरती की निचली कक्षाओं में किए गए थे।

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