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माता के रूप में नारी डर के साए में साँस ले रही है कि न जाने कब उसका अस्तित्व बिखर जाय ! श्वेता दीप्ति

 

माता के रूप में पूजी जाने वाली नारी आज डर के साए में साँस ले रही है कि न जाने कब उसका अस्तित्व बिखर जाय !  कब उसके चेहरे को झुलसा दिया जाय, कब उसे रौंद दिया जाय ।

डा. श्वेता दीप्ति, सारी कोशिश हैं कि ये सूरत बदलनी चाहिए,सम्पादकीय,हिमालिनी अंक अक्‍टूबर २०१८| 

नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः ।
नास्ति मातृसमं त्राणं, नास्ति मातृसमा प्रिया ।।
“माता के तुल्य कोई छाया नहीं है । माता के तुल्य कोई सहारा नहीं है । माता के सदृश कोई रक्षक नहीं तथा माता के समान कोई प्रिय वस्तु नहीं है ।”

संतति निर्माण में माता की भूमिका पिता से हजार गुणा अधिक है । माता के रूप में नारी अम्बा है, संतान निर्मोत्री है, दया है, क्षमा है, कल्याणी है, मां जैसा त्याग ईश्वरीय सत्ता के अतिरिक्त कोई और नहीं कर सकता । मां सर्वव्यापक सत्ता की प्रतिमूर्ति है । नारी ‘मां’ के रूप में रक्षक, मित्र और गुरू के रुप में हमारे लिए शुभ कार्यो की प्रेरक है ।

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यह मैं नहीं कह रही यह हमारा धर्म, हमारी संस्कृति कहती है । परन्तु नैतिकता को खोता हमारा समाज किस रसातल में जा रहा है इसकी अनुभूति हम रोज कर रहे हैं । कहाँ है नारी के लिए सम्मान की भावना ? सभ्य समाज में असभ्य मानव जाति के रोज नए रूप देखने को मिल रहे हैं । किन्तु सत्ता, सरकार और कानून व्यवस्था की असक्षमता के लिए अब तो कोई शब्द भी नहीं मिलते क्योंकि ये सभी जब मिलकर अपराध की लीपापोती करने लगें तो न्याय की अपेक्षा भला किस से कर सकते हैं ? माता के रूप में पूजी जाने वाली नारी आज सिर्फ और सिर्फ उस डर के साए में साँस ले रही है कि न जाने कब उसका अस्तित्व बिखर जाय, कब उसके चेहरे को झुलसा दिया जाय, कब उसे रौंद दिया जाय ।

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आमतौर पर सत्य के बारे में कहा जाता है कि वह एक ही होता है । हां, लेकिन जब सत्ता की बात आती है तो पता चलता है कि इसके सत्य एक से ज्यादा होते हैं । बल्कि वे कई तरहों से अलग–अलग तरह से लोगों के सामने परोसे भी जाते हैं । सत्तासीन लोगों का एक सत्य वह होता है जो कि वे असल में होते हैं । दूसरा सत्य वह है जिसे वे अपनी छवि बनाने के लिए आम जनता के सामने लाते हैं । जहाँ वो वायदे करते हैं, सपने दिखाते हैं । किन्तु सबसे बड़ा सत्य राजनीति का वह है जब नेताओं को सत्ता मिल जाती है । तब जो जनता के समक्ष उनका सत्तालोलुप रूप सामने आता है वही उनका सत्य होता है ।
देश का सबसे महत्तवपूर्ण त्योहार विजयादशमी को मनाने का कोई उत्साह जनता के दिलों में नजर नहीं आ रहा । महँगाई से टूटती कमर ने आम जनता को मर्माहत ही किया है ।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए ।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए ।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए ।
दुष्यंत कुमार की इन्हीं पंक्तियों के साथ विजया दशमी, दीपावली और छठ की अशेष शुभकामनाएँ ।

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