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गीत–संगीत से नेपाल–भारत को जोड़नेवाले गायक पन्नाकाजी

 

लिलानाथ गौतम
नेपाली गीत–संगीत के क्षेत्र में चिर–परिचित नाम स्व. पन्नाकाजी की आज (पौष २४ गते) ८७वें जन्म दिन है । पन्नाकाजी वह शख्स हैं, जिन्हों ने गीत–संगीत के माध्यमों से नेपाल और भारत को जोड़ने का काम किया है । उन का जन्म वि.सं. १९८८ पौष २४ गते काठमांडू में हुआ था, जिन्होंने अनुमानित ४ सौ कालजयी गीत में अपना स्वर दिया है, जो रेडियो नेपाल से प्रसारित हुआ करता था । लेकिन उस समय की प्राविधिक कठिनाई के कारण अधिकांश गीत आज संरक्षित नहीं है ।
पन्नाकाजी के जेष्ठ सुपुत्र प्रीतममान शाक्य कहते हैं कि पन्नाकाजी द्वारा स्वरवद्ध लगभग ३ सौ से ४ सौं गीत हैं, जिस में आज सिर्फ ५७ गीत पाया गया है, उस में से १२ भजन हैं । पन्नाकाजी की सबसे अधिक चचिर्त गीत, जिसका शब्द है– ‘तिरिरी मुरली बज्यो बनैमा’ जो आज भी चर्चित है । गीत–संगीत में प्रवेश करनेवाले नव–गायक तथा संगीतकार इसी गीत में आज भी प्राक्टिस करते हैं । ‘तिरिरी मुरली बज्यो बनैमा’ गीत में दर्जनों गायकों ने अपना स्वर दिया है, जिसमें बंगलादेशी गायिका रेविकासफी उल्ला भी एक हैं । वैसे तो मसहूर भारतीय गायिका लता मंगेश्वर ने भी पन्नाकाजी द्वारा संगीतबद्ध गीत में अपना स्वर दी है, जिस को भारतीय संगीतकार जयदेव ने संगीतबद्ध किया था । ‘आमा तिमीलाई शुभकामना’ बोल की उक्त गीत नेपाली चलचित्र ‘माइती घर’ में भी गया रखा है ।

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पन्नाकाजी वह शख्स है, जो नेपाली के अलवा अपनी भातृभाषा नेवारी और हिन्दी में भी गाते थे । जानकार लोगों का कहना है कि उस वक्त पन्नाकाजी स्टेज कार्यक्रम में नेपाली और नेवारी के अलवा हिन्दी गीत भी गाते थे । पन्नाकाजी द्वारा स्वरबद्ध ‘कसरी म बिर्सु उनलाई ?’ बोल की गीत ने सन् १९७० में संगीत की दुनियां में एक तरंग सिर्जना की थी । उक्त गीत का रचनाकार राममान तृषित हैं और संगीतकार शिव शंकर हैं । जापान में आयोजित ‘एक्स्पो ओशाका’ नामक कार्यक्रम में उक्त गीत और संगीत ने सभी का मन जीत लिया था । उक्त गीत अल–इण्डिया रेडियो में प्रसारण होने के बाद भारतीय संगीत जगत के हस्ती पं. शिवकुमार शर्मा (सन्तुर वादक) और हरिप्रसाद चौरसिया (बांसुरी वादक) का हृदय छु लिया । बाद में उन लोगों ने अपनी कृति Instrumental Album (The Best of Sound Scapes) में उक्त संगीत को समेट लिया, जहां उस को Spring Times: Music of The Mountains नाम दिया गया, जो विश्वभर आज भी सुना जाता है ।
इतना ही नहीं, पन्नाकाजी द्वारा स्वरबद्ध और संगीतबद्ध अन्य दर्जनों गीत–संगीत है, जो आज भी प्रसिद्ध है और नयी पीढ़ी के गायिक–गायिका उन गीतों को गाना चाहते हैं । गीत–संगीत में लगनेवाले नयी पीढ़ी के लोगों को पन्नाकाजी रचित गीत–संगीत जिस तरह छूता है, उसी तरह उस को संरक्षण करना भी आज की आवश्यकता है ।

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