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हीन भावना कैसी ? हिन्दी तो विश्वभाषा बन रही है : रमेश सर्राफ धमोरा

 

हिमालिनी, अंक जनवरी 2019 | हिन्दी विश्व की एक प्राचीन, समृद्ध तथा महान भाषा होने के साथ ही हमारी राजभाषा भी है । भारत की स्वतंत्रता के बाद १४ सितम्बर १९४९ को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी की खड़ी बोली ही भारत की राजभाषा होगी । इस महत्वपूर्ण निर्णय के बाद ही हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रचारित÷प्रसारित करने के लिए १९५३ से सम्पूर्ण भारत में १४ सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी–दिवस के रूप में मनाया जाता है । वहीं १० जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस मनाया जाता है । हिन्दी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली राज्यों की राजभाषा भी है । राजभाषा बनने के बाद हिन्दी ने विभिन्न राज्यों के कामकाज में आपसी लोगों से सम्पर्क स्थापित करनें का अभिनव कार्य किया है । लेकिन विश्व भाषा बनने के लिए हिन्दी को अब भी दुनिया के १२९ देशों के समर्थन की आवश्यकता है । भारत सरकार इस दिशा में तेजी से कार्य कर रही है, उससे यह संभावनाएं जता सकते हैं कि शीघ्र ही हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा में शामिल कर लिया जायेगा ।
हिन्दी ने भाषा, व्याकरण, साहित्य, कला, संगीत के सभी माध्यमों में अपनी उपयोगिता, प्रासंगिकता एवं वर्चस्व कायम किया है । हिन्दी की यह स्थिति हिन्दी भाषियों और हिन्दी समाज की देन है । लेकिन हिन्दी समाज का एक तबका ही हिन्दी की दुर्गति के लिए जिम्मेदार है । अंग्रेजी बोलने वाला ज्यादा ज्ञानी और बुद्धिजीवी होता है यह धारणा हिन्दी भाषियों में हीन भावना ग्रसित करती है । हिन्दी भाषियों को इस हीन भावना से उबरना होगा क्योंकि मातृभाषा में ही मौलिक विचार आते हैं । शिक्षा का माध्यम भी मातृभाषा होनी चाहिए क्योंकि शिक्षा विचार करना सिखाती है और मौलिक विचार उसी भाषा में हो सकता है जिस भाषा में आदमी सांस लेता है, जीता है । जिस भाषा में आदमी जीता नहीं उसमें मौलिक विचार नहीं आ सकते । हिन्दी किसी भाषा से कमजोर नहीं है । हमें जरूरत है तो बस अपना आत्मविश्वास मजबूत करने की ।
चीनी भाषा के बाद हिन्दी विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है । भारत और अन्य देशों में ७० करोड़ से अधिक लोग हिन्दी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं । पाकिस्तान की तो अधिकांश आबादी हिंदी बोलती व समझती है । बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, तिब्बत, म्यांमार, अफगानिस्तान में भी लाखों लोग हिंदी बोलते और समझते हैं । फिजी, सुरिनाम, गुयाना, त्रिनिदाद जैसे देश तो हिंदी भाषियों द्वारा ही बसाए गये हैं । एक तरह से देखें तो पूरी दुनिया में हिंदी भाषियों की संख्या लगभग सौ करोड़ है । आज हिन्दी विश्व भाषा बनने की ओर अग्रसर है । हिन्दी भाषा प्रेम, मिलन और सौहार्द की भाषा है । यह मुख्य रूप से आर्यों और पारसियों की देन है । हिन्दी के ज्यादातर शब्द संस्कृत, अरबी और फारसी भाषा से लिए गए हैं । इस कारण हिन्दी अपने आप में एक समर्थ भाषा है । जहां अंग्रेजी में मात्र १०, ००० मूल शब्द हैं, वहीं हिन्दी के मूल शब्दों की संख्या २, ५०, ००० से भी अधिक है ।
बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में हिन्दी का अन्तर्राष्ट्रीय विकास बहुत तेजी से हुआ है । विश्व के लगभग १५० विश्वविद्यालयों तथा सैंकड़ों छोटे–बड़े केन्द्रों में विश्वविद्यालय स्तर से लेकर शोध के स्तर तक हिन्दी के अध्ययन–अध्यापन की व्यवस्था हुई है । विदेशों से हिन्दी में दर्जनों पत्र–पत्रिकाएं नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं । हिन्दी भाषा और इसमें निहित भारत की सांस्कृतिक धरोहर सुदृढ़ और समृद्ध है । इसके विकास की गति बहुत तेज है । लेकिन यह कैसी विडम्बना है कि जिस भाषा को कश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे भारत में समझा जाता हो, उस भाषा के प्रति घोर उपेक्षा व अवज्ञा के भाव, हमारे राष्ट्रीय हितों में किस प्रकार सहायक होंगे । हिन्दी का हर दृष्टि से इतना महत्व होते हुए भी प्रत्येक स्तर पर इसकी इतनी उपेक्षा क्यों ?
हिन्दी हमारी मातृ भाषा है और हमें इसका आदर और सम्मान करना चाहिये । देश में तकनीकी और आर्थिक समृद्धि के एक साथ विकास के कारण, हिन्दी ने कहीं ना कहीं अपना महत्ता खो दी है । प्रत्येक क्षेत्र में सफलता पाने के लिये हर कोई अंग्रेजी को बोलना और सीखना चाहता है और इसी प्रकार की माँग भी है । हालांकि, हमें अपनी मातृ भाषा को नहीं छोड़ना चाहिये और इसमें भी रुचि लेनी चाहिये और सफल होने के साथ अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये दोनों का ज्ञान एक साथ होना चाहियें । किसी भी देश की भाषा और संस्कृति किसी भी देश में लोगों को लोगों से जोड़े रखने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है । हिंदी भाषा प्राचीन काल से ही भारतीय इतिहास को उजागर करती है और भविष्य में हमारी पहचान की कुंजी है । यह एक दूसरे के साथ बातचीत करने के लिए बहुत आसान और सरल साधन प्रदान करती है । यह विविध भारत को एकजुट करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है इसलिये सम्पर्क भाषा के रूप में कही जाती है ।
साक्षर से निरक्षर तक प्रत्येक वर्ग का व्यक्ति हिन्दी भाषा को आसानी से बोल–समझ लेता है, पर प्रान्तीय अथवा अन्य भाषीय लोगों के बीच हिन्दी का प्रयोग कर वह अपने विचारों को आसानी से पहुंचा सकता है । राष्ट्रीय कर्तव्य एवं अधिकार की दृष्टि से भी हिन्दी के प्रयोग एवं प्रचार हेतु मनाया जाने वाला हिन्दी(दिवस एवं हिन्दी पखवाड़ा विशेष महत्वपूर्ण है । जो न केवल हिन्दी के प्रयोग का अवसर प्रदान करता है, बल्कि इस बात का भी ज्ञान दिलाता है कि हिन्दी का प्रयोग भारतीय जनता का अधिकार है । जिसे उससे छीना नहीं जा सकता । हम जानते हैं कि इतने बड़े जनसमुदाय वाले देश में अपने अधिकार की लड़ाई आसान नहीं है । यदि महात्मा गांधी, स्वामी दयानन्द सरस्वती, पण्डित मदनमोहन मालवीय, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन, आचार्य केशव सेन, काका कालेलकर तथा गोविन्दवल्लभ पन्त जैसे अनेक महान व्यक्तियों के अनेक वर्षों में किये गये अथक प्रयासों से हमें हिन्दी को राष्ट्रभाषा कहने का अधिकार मिला है, तो हम उसे क्यों छोड़े ?
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से हिन्दी और देवनागरी के मानकीकरण की दिशा में अनेक क्षेत्रों में प्रयास हुये हैं । हिन्दी के विकास में अनेक लोगों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है । हिन्दी भारत की सम्पर्क भाषा भी है अतः हम कह सकते है कि हिन्दी एक समृद्ध भाषा है । भारत की राष्ट्रीय एकता को बनाये रखने में हिन्दी भाषा का बहुत बड़ा योगदान है । हिन्दी दिवस के अवसर पर आज हमें यह संकल्प लेना चाहिये कि हम पूरे मनोयोग से हिन्दी भाषा के प्रचार–प्रसार में अपना निस्वार्थ सहयोग प्रदान कर हिन्दी भाषा के बल पर भारत को फिर से विश्व गुरु बनवाने का सकारात्मक प्रयास करेंगे । कोई भी भाषा तब और भी समृद्ध मानी जाती है, जब उसका साहित्य भी समृद्ध हो । आदिकाल से अब तक हिन्दी के आचार्यों, सन्तों, कवियों, विद्वानों, लेखकों एवं हिन्दी–प्रेमियों ने अपने उत्कृष्ट ग्रन्थों, अद्वितीय रचनाओं एवं लेखों से हिन्दी को समृद्ध किया है । परन्तु हमारा भी कर्तव्य है कि हम अपने विचारों, भावों एवं मतों को विविध विधाओं के माध्यम से हिन्दी में अभिव्यक्त करें एवं इसकी समृद्धि में अपना योगदान दें ।

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