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साहित्य का बदलता रूप : महेश्वर राय

 

हिमालिनी, अंक फेब्रुअरी 2019 |ब्रहमाण्ड में जितनी भी वस्तुयें हंै, प्रकृति रचित या मानवकृत, सभी गुण–दोषों के मेल से निर्मित हैं । गुण–दोषों की प्रधानता और न्यूनता की स्थिति के अनुसार ही उनके अलग अलग नाम, रूप, उपयोग, प्राप्ति– स्थान हैं । निरीक्षण–परीक्षण के बाद निर्धारित निष्कर्षों के आधार पर ही वेद (ज्ञान) के द्वारा इनकी समानता, भिन्नता स्थापित की है । यह वैज्ञानिकों की पद्धति है, किन्तु सामान्य आँखें तो वस्तुओं की अच्छाई की ओर ही जाती हैं और तदनुसार ही नाम–सुनाम, यश–अपयश देती हैं ।

ग्रह, भेषज, जल, पवन, पट पाइ कजोग सुजोग । होहिं कुवस्तु, सुवस्तु जग लखहि सुलक्षण लोग । ।
भारोपेली भाषाओं के विशाल वाङमय में वेद ही सबसे प्राचीन माने जाते हैं । वेद अर्थात ज्ञान, ब्रहमाण्ड की सभी वस्तुओं के बारे में प्रयोग सिद्ध जानकारी । वेद की ही स्थापना है ‘वाक’, ‘वाचो’ अर्थात ‘ब्रह्म’,‘परमात्मा’ (तै ।उ.ब्र.व.चतुर्थ अनुवाक) साभिप्राय ध्वनि को ‘वाक’ कहा गया है और पूर्णरूप से अभिप्राय को अभिव्यक्त करने वाले वाक समूह को ‘वाचो’ कहा गया है । वायुरूप वाक को स्थाई रूप देने के लिए वर्ण का निर्माण हुआ है । वर्ण ही स्वर है । स्वर उच्चारण करने में जो बल लगता हैं, उसे मात्रा कहते हैं । स्वर और बल के विविध प्रयोग विविध लय को गेय गीतों को जन्म देते हैं । – तैत्तरीय उपनिषद शीक्षा वल्ली द्वितीय अनुवाक) । इस प्रक्रिया से सामवेद बना है ।

 

ऋक, यजु, सामवेद परमात्मा, देवताओं और मनुष्य का अनुसन्धानात्मक अध्ययन होने के साथ ही ऋषियों के द्वारा उनकी प्रार्थनायें हैं, जो अनुभूति, कल्पना और अभिव्यक्ति की गहनता, सत्यता और गायन की मधुरता के गुणों से विभूषित और स्वप्रकाशित हैं । ये इतने सरस, प्रिय, आनन्द और शान्ति देनेवाले हैं कि आज से दस–पन्द्रहों हजार वर्ष पहले से लेकर आज के कम्प्यूटर और कैसेट के जमाने में भी सर्वोत्कृष्ट साहित्य के रूप में बने हुए है । ऋषियों का निष्कर्ष है– परमात्मा (निर्पेक्ष) सत्य, ऋत (व्यवहारिक, सत्य, शिव) और आनन्द है । वही सब कुछ का निर्माणकर्ता, सुकृत है । वही रस है । यदवै तत्सुकृतम् । रसोवै सः । यही आनन्द रस वाणी में प्रवेशकर सभी पीडि़तों, टूटे बिखरों को जोड़ता है । सम्पूर्ण ब्रहमाण्ड का ही योग क्षेम वहन करता हैं । इस तरह पूरे वैदिक साहित्य के प्रमुख लक्षण मनुष्य की भावनाओं, अभिलाषाओं, अनुभवों, अनुभूतियों को सत्य, शिव और सौन्दर्य के मार्ग से आनन्द रस का सृजन है । वैदिक साहित्य परमसत्ता प्रकृति, देव और मनुष्य के बीच का संवाद है ।
वैदिक साहित्य का प्रधान लक्षण परमात्मिक रस का आस्वादन है । अभिव्यक्ति की कोमल कमनीय कान्तिमान काव्यात्मकता, मुक्ति रस के साथ जीवन की अदम्य आकांक्षा है ।

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लौकिक संस्कृत साहित्य आदिकवि वाल्मीकि से आरंभ होकर ईशा की सत्रहवीं शताब्दी तक माना जाता है, जब कि इसके साथ साथ बौद्ध और जैनों के द्वारा पूर्वप्राकृत, पाली और उत्तरप्राकृत आदि क्षेत्रीय, प्रादेशिक भाषाओं में साहित्य रचना कें बीच ही सातवीं शताब्दी के उत्तरप्राकृत से सरहपा, कढँपा, कुकुरिपा सिद्धों के द्वारा हिन्दी साहित्य का उषाकाल प्रारंभ हो जाता है । यह काल लौकिक संस्कृत साहित्य का समृद्धिकाल है । लौकिक संस्कृत साहित्य में परमात्म रस से लौकिक भावाश्रिृत रस बढ़ता जाता है । भगवदभक्ति से राजभक्ति बढ़ती जाती है । आम आदमी चेट, बिट और विदूषक बना दिए जाते हैं । राजा सभी विधाओं का नायक और मालिक बना दिया जाता है । परमात्मा, जो एक ही रस था, नौ राजसी रसों में बंटकर उनके भोजन, व्यंजन, शयन, कोलि की वस्तुयें बन जाती हैं ।

छठ्ठी शताब्दी में भतृहरि के द्वारा समग्र काव्य को साहित्य के नाम से संबोधन के बाद भी लौकिक संस्कृत काव्य ही बना रहा । कवि वेदकाल में परमात्मा था, काव्य उसकी ब्रहमाण्डीय रचना कर्म था । इसलिए कवि का साहित्यकार से अधिक सम्मान था । इस युग में साहित्य (काव्य) की मुख्य विधायें हैं– नाटक, श्रृँगारकाव्य, राजाओं की गद्यपद्यमय जीवनी । अब साहित्य की परिभाषा, पहचान बन गई “शब्द्वाथौँ सहितौ काव्यम्” (वामन) ‘तद्दोषौ शब्द्वाथौँ सगुणावलंकृति पुनः क्वापि’ (मम्मट) ‘वाक्यम् रसात्मकम् काव्यम’ (पंडित विश्वनाथ) ‘सहितस्य भावः साहित्यम्’ । इसकाल के साहित्य के मुख्य लक्षण लेखन शैली पद्यप्रधान गद्य, शद्व वाक्य संरचना अलंकार प्रधान, विषय में–श्रृंगार, वीर, भक्ति रस–भाव, विधा में पद्यात्मकता और नाटक । भरत मुनि (नाटय शास्त्र) से लेकर काव्यस्यात्मा ध्वनिः मत के संस्थापक आनन्दवर्धन तथा कालिदास, भारवि, माघ, श्रीहर्ष, भवभूति, भोज आदि काव्यकार तत्कालीन काव्य शास्त्रीय मान्यताओं के अंदर साहित्य का स्वर्णयुग निर्माण करते दिखते हैं ।

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सातवीं शताब्दी में हिन्दी साहित्य के उषाकाल के बाद मागधी, सौरसेनी और क्षेत्रीय अपभं्रश की विविध प्रादेशिक भाषाओं के साहित्य रचना से बढ़ते हुए चौदहवीं शताब्दी में मानव मर्मज्ञ, महापंडित कविकोकिल विद्यापति ठाकुर ने अवहठ्ठ भाषा कहकर अपने पद्यात्मक भक्ति श्रृंगार प्रधान गीतों की रचना कर आज के बंगाल, ओडिसा और पूरे बिहार में अति लोकप्रिय हुए । फिर १५ वीं शताब्दी के महात्मा कबीर और उनके साथियों सहकर्मियों, सोलहवीं शताब्दी में सूर, तुलसी, मीरा, रीतिकाल के पंडित केशव दास, पद्माकर, बिहारी, सेनापति, रसखान आदि की कृतियों से हिन्दी साहित्य संसार के ही साहित्य संसार में सशक्त, गरिमामय, गतिमान तथा मानव समाज का श्रद्धाकेन्द्र बन गया । इस युग में भी हिन्दी साहित्य कविता, काव्य ही बना रहा, जैसे निर्गुणियाँ संतों की रचनाये सूर की सूरसारावलि, तुलसी का रामचरित मानस, नाभादास को भक्तमाल, पं.केशवदास की रामचन्द्रिका आदि । इस युग में मानव के साथ भगवान ने फिर अपनी जगह पाई । साहित्य ने मानव गरिमा को स्थापित किया । पद्यात्मकता की प्रधानता रही । सत्यं, शिवं, सुन्दरं साहित्यकारों का मुख्य लक्ष्य बना, युगीन साहित्य का औचित्यवाद बना– “कीरति भनिति भूति भलि सोई । सुरसरि सम सबकहं हित होई ।”

अभी हिन्दी साहित्य का आधुनिक काल चल रहा है । साहित्य के भीतर खड़ी बोली के साहित्यिक विधाओं की शैली में रसात्मकता की जगह भावात्मक तन्मयता की अगुवाई में साहित्यकार चीर–फाड़ कर नये नये विधागत रूपों का निर्माण कर रहे हंै । आज साहित्यकारों की कृतियाँ रसों की खान नहीं रहीं, जीवन जगत की सांगोपांग कहानी नहीं रहीं । ये जीवन जगत की यज्ञाग्नि से उठती ज्वालाओं की लपटें नहीं रहीं, बल्कि जीवन लौह भठ्ठी से उड़ती चिलचिलाती चिनगरियाँ बन गई हैं । हम अब अपनी भाषाओं के न अच्छे पाठक रह गए हैं और न अपनी जीवनशैली के कद्रदाँ । हमारे मन मस्तिष्क के भीतर पाश्चात्य

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आधुनिक साहित्यों के भाव, दर्शन, विधायें असर कर रही हैं । लगता है, हिन्दी में अब कबीर, सूर, तुलसी या प्रेमचन्द्र जयशंकर प्रसाद, पंत, निराला, जैनेन्द्र, यशपाल, मुक्तिबोध जैसे युगधर्मी और युगप्रवर्तक साहित्यकारों का पुनरावतार न होगा । अब तीरों जैसी तीखी, अग्न्यास्त्र की गोलियाें जैसी क्षणिकाओं की होती रहेगी बरसात । यथा– ‘फूटने से पहले बम भी शांत रहता है । ’

अंततः संस्कृत और हिन्दी साहित्य के इस लघुतम् ऐतिहासिक पर्यवेक्षण से विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि आज तक साहित्य मौलिक रूप से समान्य आवश्यकता के लेखन से हटकर रचना करनेवाले साहित्यकारों के हृदय की गहरी बैठी भावनाओं की असाधारण, ऊर्जावान, सरस तन्मय करनेवाली अभिव्यक्ति रहा है, जो पाठकों को आनन्द के साथ अपने और अपने इस संसार को जानने के लिए सत्यं, शिवं और सुन्दरं की स्वस्थ अंतरदृष्टि प्रदान करता है । साहित्य के स्पष्ट लक्षण दिखते है– १) भावों, विचारों की गहनता, असाधारणता २) अभिव्यक्ति में विशिष्टता, कल्पना में नवीनता तथा कमनीयता ३) आत्मिक और सामाजिक सच्चाई की अभिव्यक्ति ४) रचना में सत्य, शिव और सौन्दर्य की स्थापना ५) इसके आनन्द से आत्मा और समाज का परिप्कार एवम् ६) पूरी कृति में रचनात्मक, काव्यात्मक औचित्य ।

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