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शी जिनपिंग का नेपाल दौरा : श्रीमन नारायण

 

श्रीमन नारायण, हिमालिनी  अंक  अक्टूबर 2019 | चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेपाल दौरा को यहाँ के सत्ताधारी दल और वाममन्थी मीडिया इस कदर प्रशंसा करने में लगा है मानो इतना सफल दौरा आज तक न किसी विदेशी मेहमान का हुआ और न ही आगे हो पावेगा । महज एक राजकीय भ्रमण होना ही कूटनीतिक सफलता का घोतक नही हो सकता । नेपाल में वामपन्थी दलाें की दो तिहाइ बहुमत की सरकार है । यह सरकार चीन के प्रति अधिक झुकाव रखे हुई है । वैसे भी चीन में माओत्सेतुङ के समय से लेकर आज तक दुनिया के तीन ही ऐसे देश हुए जिन्होने अनवरत रूप में चीनी सत्ता का समर्थन किया पाकिस्तान, उत्तर कोरिया और नेपाल । पाकिस्तान और उत्तर कोरिया पूरी दुनिया से अलग–अलग है । नेपाल की वामपन्थी सरकार चीन से बेहतर सम्बन्ध को हीं अपना कर्तव्य मानती है । भारत के साथ बेहतर सम्बन्ध बनाना नेपाल की सरकार की आवश्यकता और मजबूरी दोनो रही है ।

सरकार के द्वारा चीनी राष्ट्रपति का आतिथ्य करना किसी भी वामपन्थी नेता या सरकार के लिए गौरव का विषय होता है । नेपाल जैसे निकट पडोसी देश के द्वारा विश्व की दूसरी अर्थव्यवस्था वाले चीन के राष्ट्रपति का आतिथ्य करना स्वाभाविक रूप से ही गौरव का विषय हो जाता है । परन्तु दो देशों के सत्ताधारी दलों का आपसी सम्बन्ध दो देशों के बेहतर सम्बन्ध से सर्बथा अलग विषय होता है । राजनीतिक भ्रमण से ही कूटनीतिक सम्बन्ध बेहतर नहीं हो जाता लेकिन कूटनीतिक लक्ष्य हासिल करने का एक जरिया भर हो सकता है । शी के नेपाल भ्रमण की समीक्षा होनी ही चाहिए ।

चीन में माओत्सेतुङ और देंग जिआओ पिंग के वाद सर्वाधिक शक्तिशाली नेताओं की फेहरिस्त में शी जिनपींग का नाम आता है । चीन जैसे दुनिया के शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति का दौरा अपने आप मे महत्वपूर्ण हो जाता है और पूरी दुनिया में चर्चा का विषय भी । २३ वर्षाें के लम्बे अन्तराल के बाद किसी चीनी राष्ट्रपति का यह नेपाल दौरा था । इस भ्रमण के दौरान दोनों देशाें के वीच विभिन्न २० सूत्री सम्झौतों पर दस्तखत भी हए । इन सम्झौतों का महत्व और सांकेतिक मतलब भी है । ये बहुआयमिक तो है हीं दूरगामी प्रभाव का भी है । इस बार के साझा विज्ञप्ति मे पहली बार रणनीतिक साझेदारी शब्द का प्रयोग हुआ है । अब तक बहुआयमिक साझेदारी शब्द का इस्तमाल होता रहा है । इस बार खुलकर रणनीतिक साझेदारी शब्द का प्रयोग हुआ है । इस पर काठमाण्डु में मीडिया का बाजार गर्म रहा । आशंकाओं को दूर करने के लिए प्रधानमन्त्री को खुद आगे आना पडा और उन्होंने स्पष्ट किया कि रणनीतिक साझेदारी का अर्थ आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास भर है, इससे अधिक कुछ भी नही । आगामी दिनों मे नेपाल भारत के साथ भी रणनीतिक साझेदारी सम्बन्धी सम्झौता करना चाहेगी कहकर ओली ने मीडिया को चुप कर दिया “प्रधानमन्त्री ओली ने यह भी कहा कि नेपाल” इण्डो प्यासिफिक रणनीतिक साझेदारी से खुद को अलग रख रहा है । इससे पहले नेपाल के विदेश मन्त्री प्रदीप ज्ञवाली दो माह पूर्व जब अमेरिका भ्रमण पर गए थे तो उन्होंने “इण्डो प्यासिफिक रणनीतिक साझेदारी” में नेपाल की सहभागिता पर हामी भरी थी । ये अलग बात हैं कि काठमाण्डौ आने पर उन्हाेंने अलग ही सफाई दे डाली । प्रधानमन्त्री ओली के नये वक्तव्य के बाद अमेरिका का प्रतिक्रिया आना बाकी है । जाहिर हैं अमेरिका की प्रतिक्रिया भी अर्थपूर्ण ही होगी ।

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चीनी राष्ट्रपति के नेपाल भ्रमण में दोनों देशाें के वीच आर्थिक विकास एवं समृद्धि से जुड़े विषयो पर भी सम्झौता हुए । नेपाल की वामपन्थी सरकार यह चाहती है कि भारत के साथ जो उसकी कारोबारी निर्भरता है उसको कम किया जा सके और चीन के साथ भी कारोबार बढाया जाय । हालांकि चीन के साथ जो नेपाल का कारोबारी रिश्ता रहा है उसमे नेपाल को भारी घाटा उठाना पड़ रहा है । आयात की तुलना में निर्यात का आयतन ४०० गुणा अधिक है । नेपाल को उम्मीद थी कि शी के नेपाल भ्रमण के दौरान रेल, सड़क या पानी जहाज से सम्बन्धित विषयों पर सम्झौता होंगे लेकिन इन विषयों पर कोई खास चर्चा ही नही हो सका । ३५ हजार करोड रुपया खर्च करके चीन शायद ही केरुङ – काठमाण्डौँ रेल मार्ग निर्माण का जोखिम उठाना चाहेगा, जहाँ उसे सिर्फ घाटा हीं होने वाला है । अलवता रसुवागढी– काठमाण्डौँ सडक मार्ग के निर्माण में चीन ने सहयोग का वादा जरूर किया है । इसी तरह उत्तर–दक्षिण कोशी, गण्डकी और कर्णाली कोरिडोर निर्माण मे सहयोग का वचन भी दिया है ।

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नेपाल को उम्मीद थी कि नेपाल–तिब्बत चार सौ केभी प्रसारण लाईन का निर्माण तथा बुढीगण्डकी पन बिजली परियोजना के निर्माण मे चीन सहयोग हेतु कोई आश्वासन देगा लेकिन ऐसा कुछ भी नही हुआ । तमोर और मोदीखोला बिजली परियोजना के निर्माण मे सहयोग का वचन जरूर दिया है । बी आर आई से जुडे परियोजनाआें को अमली जामा पहनाने मे अब जल्दीबाजी की जाएगी । मदन भण्डारी विश्व विद्यालय के निर्माण तथा कन्फयुसियस अध्ययन केन्द्र की स्थापना जैसे विषय भी काफी चर्चा में है । पिछले महीना ही नेपाल तथा चीन के बीच एक सम्झौता हुआ जिसके तहत नेपाली युवाओं को चीनी भाषा सिखाऐंगे इसके लिए पाँच सौ चीनी भाषा विज्ञ नेपाल आएँगे । जब नेपाल के सत्ताधारी नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी के २०० से अधिक शीर्ष नेता ही शी जिनपिंग के राजनीतिक विचार का प्रशिक्षण लेने के लिए बिजिंग से सिपीसी के विज्ञों को आमन्त्रित करके बुलाया तथा दीक्षा हीं लेलीे तो चीनी भाषा की पढाई कोई बडा विषय नही रहा । लेकिन समस्या तब और कठिन हो जाएगीं जब रुस, फ्रान्स, जर्मनी, पाकिस्तान, बङ्लादेश, भारत, अमेरिका और उत्तर कोरिया जैसे देश भी जब यह कहने लगे कि हम भी ५०० भाषाविज्ञ भेजते हैं तथा उन्हें भी हमारी भाषा पढाने दो ? तब नेपाल सरकार क्या जवाब देगी ? विकास के लिए साझेदारी होनी चहिए लेकिन विचारधारा में नहीं । पूर्वीय सभ्यता, संस्कृृति और सनातन धर्म के अनुुयायी हमें नेपाल में चीन से सीखना ही क्या है ? जो है उस पर तो ध्यान दे नही रहे । बामपन्थ के नाम पर अपनी विरादरी से रिश्ता बनाया जा रहा है परन्तु विदेश नीति का आधार निजी या दलगत पसंद या ना पसंद नही होना चाहिए देश और जनता का हित सर्वोपरी होना चाहिए ।

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चीनी राष्ट्रपति का नेपाल दौरा उनकी एक सख्त धम्की वाली टिप्पणी के कारण भी पूरी दुनिया में चर्चा का विषय रहा । नेपाल के प्रधानमन्त्री ओली के साथ हुई दुईपक्षीय सम्वाद में उन्होंने कहा कि चीन के किसी भी भू–भाग में अस्थिरता फैलाने की सपना देखने वालाें को चीन चटनी की तरह पीस कर रख देगा । भले हीं शी का यह संकेत तिब्बत, हङकङ शिनजियाङ और ताईवान के विद्रोह को लेकर रहा हो तथा पश्चिमी देशों खास करके अमेरिका और यूरोपीय देशों की और लक्षित रहा हो परन्तु नेपाल की मिट्टी से अगर उन्होने धमकी दी है तो कही न कही नेपाल को भी लपेटे में ले हीं लिया । वैसे नेपाल एक चीन नीति के प्रति प्रतिबद्ध है तथा अपनी मिट्टी से भारत या चीन विरोधी गतिविधि को रोकने की हर मुमकिन प्रयास करता रहा है । चीनी राष्ट्रपति का नेपाल भ्रमण सन्तोषप्रद रहा लेकिन इससे बहुत अधिक उत्साही होने का कारण नहीं दिखता ।

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