क्या आप भावनाआं से संचालित होते हैं ::अमित भटनागर
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रेश एक अच्छी कम्पनी में नौकरी करता था । उसका बाँस और वह पिछले पाँच सालों से साथ काम कर रहे थे और उसका बाँस उसके काम से संतुष्ट था । अचानक नरेश के बाँस को कंपनी ने प्रमोशन दे कर, दूसरी बडी ब्रांच में भेज दिया और नरेश की ब्रांच में उसका दूसरा बाँस आ गया ।
यही से नरेश के लिए मुश्किलें शुरू हो गई, नए बाँस की कार्य करने की पद्धति पुराने बाँस से अलग थी । नया बाँस उम्र में भी अपेक्षाकृत युवा था । नरेश परेशान रहने लगा और इसका असर उसके काम पर भी पडÞने लगा । नरेश का अक्सर मन होता कि वह नौकरी छोड कर कहीं भाग जाए, पर वह यह सोच कर रह जाता कि बिना नौकरी के वह करेगा क्या -
एक तरफ नौकरी के बदले हुए हालत और दूसरी तरफ नौकरी करने की मजबूरी उसकी परेशानी को और बढा देते थे । इसी उधेडÞबुन और परेशानी में कई महीने गुजर गए । एक दिन नरेश की कंपनी ने उसके कार्य से असंतुष्ट हो कर उसे नौकरी से निकाल दिया । नरेश की परेशानी और बढ गयी । वह दुखी रहने लगा । जरूरतों के कारण उसे अपनी योग्यता से कमतर वाली नौकरी करनी पडÞी ।
हम अपने आस-पास इस तरह के या इससे मिलते जुलते घटनाक्रमों को अनुभव करते रहते हैं । हम अपनी स्वयं की जिन्दगी में भी तनाव, परेशानियाँ और दुखों को पहले से कहीं अधिक बढÞा हुआ पाते हैं ।
अगर गहर्राई में जा कर देखें तो पाएंगे कि इन सभी के पीछे कहीं न कहीं हमारी भावनाऐं हैं । जरा सोचिये इस लेख के शर्ीष्ाक ‘क्या आप भावनाओं से संचालित होते हैं’ का अर्थ आप के लिए क्या है -
हममें से कई लोग अत्यन्त भावुक होते हैं । भावनाओं में बह कर अपने कार्य करते हैं और अक्सर बाद में पछताते हैं । वहीं दूसरे प्रकार के लोग भी हैं, जो भावनाओं का होना और उन्हें अभिव्यक्त करना अच्छा नहीं मानते हैं । ऐसे लोग अक्सर गुस्से और आन्तरिक असन्तोष के शिकार पाए जाते है ।
सही मायने में देखा जाये तो हम पाएंगे की भावनाओं में बहना या उन्हें नकारना, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं क्योंकि दोनों ही तरह से जो परिणाम मिलते हैं, वह हमारी दूरगामी खुशी और सफलता के लिए हानिकारक होते है ।
आइये देखें कि हमारी जिन्दगी में भावनाओं का अस्तित्व क्यों है – शायद आप को पता होगा कि हमारे मस्तिष्क में दो अलग-अलग केन्द्र होते हैं- एक केन्द्र भावनाओं को संचालित करता है और दूसरा हमारे विचारो को । हमारे विचार और भावनाएँ अलग-अलग हैं, विचार मस्तिष्क में उपजते हैं और भावनाएँ हम शरीर में महसूस करते हैं । हमारी भावनाएँ हमारे विचारों से सौ करोडÞ साल पुरानी है ।
भावनाएँ प्रकृति का अद्भुत उपहार है । यह हमें आंतरिक संदेश देती है कि हम जिस स्थिति में है या हम जो कर रहे हैं वो हमारे विश्वास, हमारी मान्यताओं और हमारी इच्छाओं एवं आकांक्षाओं के अनुरूप है या नहीं ।
हम अच्छी भावनाओं को महसूस करते हैं, जब हम अपने अनुकूल कार्य कर रहे होते हैं और यदि हम अपने प्रतिकूल होते हैं तो हम बुरी भावनाएँ महसूस करते है ।
हम इसे कुछ इस तरह समझ सकते हैं, हम एक ऐसे क्षेत्र में रहते है जहाँ अक्सर आग लगती रहती है और वहाँ भावनाएँ हमारे घर में लगे फायर अलार्म की तरह है, इसे यदि हम बंद कर देंगे तो घर जल कर खाक भी हो सकता है, वहीं दूसरी तरफ इसके अत्यधिक संवेदनशील होने पर हमें बार-बार बजने वाले अलार्म मिलेंगे, यह हर छोटी-मोटी बातों पर बजता रहेगा और हम सुचारू रूप से कोई काम नहीं कर पाएंगे ।
जरूरत इस बात कि है हम इस फायर अलार्म की कार्य प्रणाली को समझ कर इसका संयोजन इस प्रकार करंे कि यह हमें न सिर्फविपत्तियों से बचाए बल्कि हमें सुचारू रूप से कार्य करने में भी मदद करंे ।
बुरी भावनाओं से निपटने का सबसे आसान उपाय है उन्हें समझना, न कि उन्हें नकारना या उनके साथ बह जाना । सबसे पहले हम अपने आप से यह पूछंे कि हम जो भावना महसूस कर रहे है, वह क्या है, कैसी महसूस हो रही हैं और वह हमें क्या बताना चाहता है – उसके बाद हम उपलब्ध विकल्पों को देखें और उन में से ऐसे विकल्पों को चुने जिससे हमारी दूरगामी खुशियाँ भी सुनिश्चित होती हों । हम यह भी देखें कि हम अच्छा महसूस करने के लिए क्या कर सकते हैं । बेहतर होगा हम उन उपायों पर अपना ध्यान केन्द्रित करे जो हमारे बस में हों । ऐसा करने पर हमें धीरे-धीरे न सिर्फअपनी बुरी भावनाओं से निपटने का अभ्यास होगा बल्कि हम सही दिशा में अपने प्रयासों का उपयोग कर पाएंगे और अधिक सफल भी बन पाएंगे ।
नरेश के उदाहरण को यदि हम देखें तो पाएंगे कि परेशानी, दुःख और नौकरी न रहने पर होने वाली तकलीफ के भय ने नरेश को इस तरह जकडÞ लिया कि उसकी कार्य करने की क्षमता और कम हो गई । नरेश की तरह हम सभी भी यही गलती करते हैं, और बुरी भावनाओं के अस्तित्व को ही स्वीकार करना नहीं चाहते हैं । यह र्सवविदित तथ्य है कि जिस बात का हम प्रतिरोध करते हैं, वही बात हम पर हावी हो जाती हंै ।
यदि कोई आपसे कहे कि आपको लाल मुंह वाले बंदर के बारे में नहीं सोचना है तो सबसे पहले आपके दिमाग में लाल मुंह के बंदर का ही ख्याल आएगा । हमारा मस्तिष्क इसी तरह काम करता हैं । उसे यदि आप निर्देश देंगे कि यह काम नहीं करना है तो उसे पहले उस काम के बारे में सोचना पडेगा जो नहीं करना है । बस यही कारण है कि हम बुरी भावनाओं को नकारते हैं तो वह हम पर और ज्यादा हावी हो जाती हैं ।
यदि नरेश ने बजाय भावनाओं से पीछा छुडÞाने के, भावनाओं के पीछे छुपे संदेश को समझा होता तो बजाय परेशान होने के वह अपनी कार्यपद्धति को बदल कर न सिर्फअपनी नौकरी बचा पाता बल्कि बदलाव का सकारात्मक उपयोग कर अपने को और अधिक प्रभावशाली भी बना पाता । तो आइये संकल्प करं कि हम बजाय भावनाओं में बहने या उन्हें नकारने के, उन्हें समझने की कोशिश करें और अपनी भावनाओं एवं विचारों के बेहतर तालमेल से अपने लिए एक सुखी और सफल जिन्दगी की रचना करें ।
-लेखक अमोघ फाँउण्डेशन के चेयर्रपर्शन और इमोशनल इन्टलिजेन्स के गुरू है)

