सत्ता की हकदार पर सुरक्षा की मोहताज:: स्िमृति जोशी
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हनजी के राज में महिलाओं पर होते अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाली उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी के बयान पर मचा बवाल इतनी जल्दी थमता नजर नहीं आता । हालाँकि इस जर्ुम के लिए रीता बहुगुणा जोशी को गिरफ्तार कर ज्ञद्ध दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है पर शायद अब सवाल यह नहीं है कि रीता ने मायावती के विरुद्ध क्यों अभद्र टिप्पणी की और क्यों की – इस टिप्पणी पर बौखलाए कथित मायावती र्समर्थकों ने इसकी प्रतिक्रिया स्वरुप रीता बहुगुणा के सरकारी आवास पर हमला कर तोडÞ-फोडÞ व आगजनी की, इस घटना के बाद भी सवाल यह नही है कि इन कथित मायावती र्समर्थकों ने जो किया वह कितना सही है – सवाल बडÞा पुराना और बस इतना है कि आखिर एक स्त्री की इज्जत की कीमत क्या है -
क्या वह ओहदे और वर्ग के अनुसार बदल जाती है – या फिर हर औरत का उत्पीडÞन ताकत के अनुसार छोटा-बडÞा हो जाता है – अगर नहीं तो फिर भला क्यों एक महिला के विरुद्ध की गई टिप्पणी मात्र पर इतना बवाल जबकि बलात्कार की शिकार महिलाओं की एक लंबी सूची संवेदना के स्तर पर कोई हलचल नहीं मचा पाती – विशेषकर एक महिला ही जब मुख्यमंत्री हो तब ऐसी विडंबना तकलीफदेह है । सारा मामला इतना पेचीदा है कि पक्ष और पिक्ष कहीं नजर ही नहीं आता । अभद्रता के विरुद्ध और एक अभद्रता । अगर इस सारे प्रकरण में से राजनीति हटा दी जाए तो बचती है सिर्फमहिला और उसकी संवेदनहीनता ।
करोडÞों रुपए खर्च कर अपनी मर्ूर्तियाँ स्थापित कर दलित उद्धार करने की आकांक्षा पाले मायावती को अपने पद और गरिमा के अनुसार आचरण पर ध्यान देना था । तत्पश्चात् पिक्ष की नेता रीता को अपने बयानों में संयम बरतना था । जो कि नहीं हुआ, जब बचती है आम स्त्री । जिसे किसी भी संबोधन से पुकारा जाए उसकी नियति है छले जाना, और हमेशा की तरह वह फिर छली जा रही है । अब इस तथ्य को दिलचस्प कैसे कहें कि इस सारे मामले में बस महिला ही महिला है । मुख्यमंत्री महिला, पीडित महिला, मृतका महिला, बयान देने वाली नेता महिला । यानि महिला बनाम महिला । किसने किया बलात्कार – कौन है असली दोषी – किसे है फुरसत इस पर बात करने की – महिला इस देश में कितनी सुरक्षित है कौन सोचेगा इस पर – आर्श्चर्य कीजिए कि यह सब वर्तमान स्थिति में हो रहा है जबकि देश की राष्ट्रपति महिला, शासित दल की प्रमुख नेता, लोकसभा स्पीकर महिला, संसद में वर्चस्व बढÞाती महिला । कल तक जो हम महिलाएँ पुरुषों के विरुद्ध मोर्चा खोले रहती थी अब क्या कहें और किसके खिलाफ कहें – हमारे -यानी महिलाओं के) राज में वे -पुरुष) इतने अलमस्त कैसे हो गए कि अपराध करने के बाद उन पर किसी तरह का दबाव नहीं, उल्टे महिलाओं के बहाने महिलाएँ ही आपस में स्तरहीन होकर सामने आ खडÞी हर्ुइ – होना तो यह था कि महिलाओं के पदासीन होने पर एक आम स्त्री में आत्मविश्वास अंकुरित होता कि अब हम पाँवर में हैं, हमें कोई खतरा नहीं । पर हुआ क्या – हम महिलाएँ, महिलाओं से ही आतंकित है । और ऐसा इसलिए कि हम नारी संवेदनशीलता के गहरे अहसास को भूलते जा रहे हैं । हम अपने ही संकर्ीण्ा दायरों में लिपटी आपस में उलझ रही हैं । जबकि यह मुद्दा सदियों से न्याय की आस में विवश हो छटपटा रहा है । प्रति वर्षबलात्कार पीडिÞताओं के आँकडÞे बढÞते जा रहे हैं और समाज से एक बर्ेशर्म खामोशी की परत है कि हटती ही नहीं । एक और सच कि आँकडÞों के पीछे छुपी कितनी पीडिÞताएँ हैं जो खामोश सो जाती है या सुला दी जाती है हमेशा के लिए – कितनी ही ऐसी हैं जिन्हें समाज और इज्जत की दुहाई देकर खामोश रहने पर मजबूर कर दिया जाता है । ये आँकडÞे सतह के ऊपर आ ही नहीं पाते क्योंकि इनके प्रति हमारी नीयत ही दोषपर्ूण्ा है । हमने इस घृणित मुद्दे पर कभी गंभीर होने की कोशिश ही नहीं की । क्यों – क्योंकि यह मुद्दा, यह खबर, यह घटना हमारी मानसिकता पर कोई हलचल मचाने में कामयाब नहीं होती । हममें संवेदना नहीं बची, यही वजह है कि कोई महिला संयम खो बैठती है और दुःखी मन से कह जाती है कि तुम्हारे साथ होगा तब… – लेकिन ऐसे मुद्दे प्रत्यारोप नही माँगते, बहस भी नहीं माँगते ऐसे मुद्दे संवेदना और न्याय माँगते हैं । अगर इस देश में ये दो चीज कहीं मिले तो राजनीति को इनका पता दीजिए । शायद कुछ हासिल हो सके हम नारियों को ।


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Posted on September 27th, 2009 at 5:46 pm