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साै साल पहले जब स्पेनिश फ्लु ने मचाया था तांडव और निगल ली थी कराेडाे जिन्दगी

 

वैश्विक महामारी (Pandemic) कोरोना वायरस (Coronavirus) से आज दुनियाभर के देश परेशान हैं। सभी अपनी तरफ से इस महामारी से निपटने की हर संभव कोशिश में लगे हुए हैं। अमेरिका इसके इलाज के लिए तरह-तरह के प्रयोग कर रहा है। इस बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कुछ दिनों में कोरोना संक्रमण के मामले 10 लाख हो जाएंगे और मौतों का आंकड़ा 50,000 तक पहुंच जाएगा। इस तरह की महामारी कोई पहली बार नहीं हुई है। 100 साल पहले भी विश्व इसी तरह की महामारी का दंश झेल चुका है। 1918-1919 में भी इसी तरह के हालात पैदा हो गए थे जब स्पैनिश फ्लू (Spanish Flu) महामारी बनकर उभरा था।
स्पैनिश फ्लू
एक तरफ तो प्रथम विश्व युद्ध के खत्म होने पर जनजीवन वापस पटरी पर लौट रहा था वहीं दूसरी तरफ युद्ध से घर लौट रहे सैनिक अपने साथ करोड़ों लोगों की मौत साथ लेकर आ रहे थे। आलम ये था कि कब्रिस्तान छोटे पड़ गए थे लोगों को दफनाने की जगह नहीं बची थी। ये सब केवल एक देश में नहीं बल्कि पूरे विश्व में हो रहा था। स्पैनिश फ्लू की महामारी से दुनिया की करीब एक तिहाई आबादी (50 करोड़) प्रभावित हुई थी और करीब पांच करोड़ लोगों की मौत हुई थी। अकेले भारत में इस फ्लू से करीबन 6 प्रतिशत (कुल जनसंख्या) लोगों की जान चली गई थी। एक तरफ युद्ध खत्म होने की खुशी थी तो दूसरी तरफ मौत और अपनों को खो देने का दर्द भी साथ था। वो ऐसा खौफनाक साल था जब जन्म से ज्यादा मौतें हुई थीं।स्पैनिश फ्लू

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कैसे शुरू हुआ यह वायरस
यह एवियन इन्फ्लूएंजा (भारत में बर्ड फ्लू के नाम से पहचाने जाने वाला खतरनाक वायरस) के घातक स्ट्रेन के कारण सबसे पहले स्पेन में शुरू हुआ और प्रथम विश्व युद्ध के कारण फैल गया था। भारत में, इस बीमारी को वे सैनिक लाए जो प्रथम विश्व युद्ध में लड़ाई लड़ने गये थे। सबसे पहले इस वायरस से संक्रमित मरीज बॉम्बे प्रेजिडेंसी में मिला सैनिक था। उस वक्त वायरस के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी और डॉक्टरों को पता नहीं था कि लोगों का इलाज कैसे किया जाए।स्पैनिश फ्लू

वायरस से बचने के लिए क्वारंटीन करने, खुद को आइसोलेशन में रखने और सैनिटाइजेशन के अलावा कोई उपाय नहीं था। बीमार हो रहे लोगों को नमक के पानी से गरारे करने और क्वारंनीन की सलाह दी गई थी। ”कार्ल मार्क्स ने कहा था इतिहास स्वयं को दोहराता है, पहले एक त्रासदी के रूप में और दूसरा एक मजाक के रूप में।” इतिहास बेशक खुद को दोहरा रहा है लेकिन दूसरी बार भी दूर-दूर तक सिर्फ त्रासदी ही नजर आ रही है। और ये त्रासदी का कारण है कोरोना वायरस जिसने अभी 10 लाख लोगों को अपना शिकार बनाया है।

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दुनिया को इस महामारी से बचाने के लिए आज की तरह ही लॉकडाउन किया गया था। तमाम स्कूल, चर्च और सार्वजनिक स्थानों पर ताले लगा दिए गए थे। कई संवेदनशील शहरों में लॉकडाउन कर दिया गया था। ये कदम कुछ प्रेसिडेंसी में ही उठाए गए थे जो स्वतंत्र थे क्योंकि उस वक्त संघीय सरकार के पास निर्णय लेने का अधिकार नहीं था। भारत शासन अधिनियम, 1919 के तहत भारत का शासन पूरी तरह से ब्रिटिश संसद के इशारों पर चल रहा था।
खासतौर पर बॉम्बे प्रेजिडेंसी में तेजी से फैलने के बाद इस वायरस ने उत्तर और पूर्व में सबसे ज्यादा तांडव मचाया था। जिस तरह करोना का इलाज करने वाले डॉक्टर्स इस बीमारी से संक्रमित हो रहे हैं उसी तरह उस वक्त भी ऐसी खबरें भी आईं कि मदद करने वाली नर्सें खुद फ्लू का शिकार हो गई थीं।

स्पैनिश फ्लू

 

उस समय के तमाम अखबारों में विज्ञापन देकर स्वच्छता के लिए हाथ धोना सिखाया गया था। अखबारों में हाथ धोने के विज्ञापन थे। सड़कों पर पोस्टर लगाकर बताया गया कि वायरस से कैसे बचें। मास्क न पहनने पर जेल जाने तक का नियम बना था। महामारी की यही स्थिति आज फिर कोविड-19 में है। नर्सों की भर्ती निकली थी। सोशल डिस्टेंसिंग की सलाह दी गई थी।

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अमेरिकन सोसाइटी ऑफ साइटोपैथोलॉजी के जर्नल में प्रकाशित शोध के मुताबिक कई अमेरिकी शहर में मृत्यु दर में 30 से 50 फीसदी कमी आई। क्योंकि यहां पर एहतियातन कदम फ्लू फैसने के साथ ही उठाए गए। वहीं, उन शहरों में मौतें ज्यादा हुई, जहां पर बाद में लॉकडाउन किया गया या फिर बाद में बंदी जैसे एहतियाती कदम उठाए गए।

ये थे लक्षण
इस वायरस से संक्रमित मरीज के शरीर का तापमान 104 डिग्री और पल्स 80 से 90 के बीच पहुंच जाती थी।
सिर, पीठ और शरीर के दूसरे अंगों में बहुत दर्द होता था।
श्वासनली में सूजन आ जाती थी।
नाक और फेफड़ों से खून बहना शुरू हो जाता था और शरीर का रंग बदलने लगता था।
नोट: सभी आंकड़े CDC के मुताबिक हैं।

अमर उजाला से साभार

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