आइए पृथ्वी को साँस लेने का अवसर दें, वह है तो हम हैं : डा. श्वेता दीप्ति
आः धरती कितना देती है
यह धरती कितना देती है ! धरती माता
कितना देती है अपने प्यारे पुत्रों को !
रत्न प्रसविनी है वसुधा, अब समझ सका हूँ !
इसमें सच्ची ममता के दाने बोने हैं,
इसमें जन की क्षमता के दाने बोने हैं
इसमें मानव ममता के दाने बोने हैं,
जिससे उगल सके फिर धूल सुनहली फसलें
मानवता की—जीवन श्रम से हँसे दिशाएँ !
हम जैसा बोयेंगे वैसा ही पायेंगे !
सुमित्रानन्दन पंत ।
डा. श्वेता दीप्ति, काठमांडू, २२ अप्रैल २०२० | २२ अप्रील पृथ्वी दिवस ये पृथ्वी हमें कितना देती है, बस देती ही जाती है, पर हम इसे क्या दे रहे हैं ? पृथ्वी को हमारे शास्त्रों में सबसे पहले नमन किया जाता है । हिन्दु धर्म में गायत्री मंत्र सबसे अधिक शक्तिशाली मंत्र माना जाता है जिसकी शक्ति एवं उर्जा को देश–विदेश में स्वीकारा गया है । इसमें भी पृथ्वी की महत्ता वर्णित है । कहने का तात्पर्य यह कि पृथ्वी को हमेशा पूजनीय माना गया है । विगत २२ अप्रील को पृथ्वी दिवस मनाया गया । भले ही सैन फ्रांन्सिसको के जान मेक कोनेला ने पृथ्वी को नमन करने के लिए २१ मार्च १९६९ में युनेस्को की बैठक में सुझाव दिया था किन्तु हिन्दु संस्कृति ने हमेशा ही पृथ्वी को पूजा है । पृथ्वी दिवस हर वर्ष २२ अप्रील को मनाया जाता है । यह पृथ्वी के प्रति हर व्यक्ति को दायित्व समझाने का दिवस है । करोड़ों वर्षों से पृथ्वी ने अपने बचाव और संतुलन के कई मार्ग खोजे किन्तु मानव जाति ने हमेशा उसके मार्ग को अवरुद्ध किया । एक बड़े बाँध की योजना अपने दस वर्षों के निर्माण के दौरान लाखों करोड़ों वर्षों में पनपे स्थानीय पारिस्थितियों को स्वाहा कर देती है । नदियाँ मार दी जाती हैं, वन नष्ट हो जाते हैं और पृथ्वी को अनगिनत जख्म दे दिए जाते हैं । परिणामतः पहाड़ डूब जाते हैं, गाँव के गाँव गर्त में समा जाते हैं । पृथ्वी के ऊपर मानव जाति ने इतने दवाब बना रखे हैं कि उसमे असामान्य रूप से विचलन की परिस्थिति उत्पन्न हो गई है । जिसके कारण आए दिन प्राकृतिक आपदा से विश्व जूझ रहा है । फिर भी हमें होश नहीं है कि हम क्या कर रहे हैं । टुकड़े टुकड़े में धरती ने यह संकेत देना शुरु कर दिया है कि अब ज्यादा समय मानव जाति की मनमानी नहीं चलने वाली है । नदियाँ सूख रही हैं हमारे बीच पानी का अभाव होता जा रहा है । किसी गीत की एक पंक्ति याद आ रही है, ‘जल जो न होता तो ये जग जाता जल’ और ये भविष्यम्भावी नजर आ रहा है । आखिर कब तक ? कल को देखते और सोचते हुए पृथ्वी दिवस मनाने की अवधारणा सचेतकों के मन में आई होगी पर, एक प्रश्न तो है कि क्या किसी एक दिन को पृथ्वी दिवस मना लेने से पृथ्वी का वह दर्द कम हो जाएगा जो हम मानव निरंतर उसे दे रहे हैं ? इसके लिए क्या समस्त मानव जाति को सजग नहीं होना चाहिए ?
२२ अप्रील १९७० को पृथ्वी दिवस ने आधुनिक पर्यावरण आंदोलन की शुरुआत की । लगभग २० लाख अमेरिकी लोगों ने एक स्वस्थ, स्थायी पर्यावरण के लक्ष्य के साथ इसमें भाग लिया । हजारों कॉलेजों और विश्वविद्यालयों ने पर्यावरण के दूषण के विरुद्ध प्रदर्शणों का आयोजन किया । वे समूह जो तेल रिसाव, प्रदूषण करने वाली फैक्ट्रियाँ और उर्जा संयन्त्रों, कच्चे मल–जल, विषैले कचरे, कीटनाशक, खुले रास्तों, जंगल की क्षति और वन्य जीवों के विलोपन के खिलाफ लड़ रहे थे उन्होंने महसूस किया कि वे समान मूल्यों का समर्थन कर रहे हैं । २०० मिलियन लोगों का १४१ देशों में आगमन और विश्वस्तर पर पर्यावरण के मुद्दों को उठाकर, पृथ्वी दिवस ने १९९० में २२ अप्रील को पुनः चक्रीकरण के प्रयासों को उत्साहित किया और रियो डी जेनेरियो में १९९२ के संयुक्त राष्ट्र पृथ्वी सम्मेलन के लिए मार्ग बनाया । सहस्राब्दी की शुरुआत के साथ ही ग्लोवल वार्मिंग पर ध्यान केन्द्रित किया गया और स्वच्छ उर्जा को प्रोत्साहन दिया गया । २२ अप्रील २००० का पृथ्वी दिवस पहले पृथ्वी दिवस की उमंग और १९९० के पृथ्वी दिवस की अन्तर्राष्ट्रीय जनसाधारण कार्यशैली का संगम था । २००० में इन्टरनेट ने पूरी दुनिया को पृथ्वी दिवस के साथ जोड़ दिया । पृथ्वी दिवस वह दिन है जो सभी राष्ट्रीय सीमाओं को अपने आप में समाए हुए है, सभी पहाड़, महासागर और समय की सीमाएँ इसमें शामिल हैं और पूरी दुनिया के लोगों को एक गूँज के द्वारा बाँध देता है । यह प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने के लिए समर्पित है ।
आज पूरा विश्व अनदेखे कहर को झेल रहा है मौत की संख्या दिन प्रतिदिन बढती जा रही है और विश्व स्वास्थ्य संस्था की मानें तो आने वाला दिन और भी घातक सिद्ध होने वाला है । आधुनिक और विकसित होने के दावे खोखले सिद्ध हो रहे हैं । मौत के आगे या यूँ कहें कि प्रकृति के आगे लाचार इंसान खुद को बेबस समझ रहा है । जिन्दगी की गति ठहरी हुई है । पूरी कोशिश की जा रही है कि कोरोना के जहर से बचने का रास्ता जल्द से जल्द ढूँढा जाए । हम इसमें भी कामयाब हो जाएँगे । किन्तु इस महामारी से आज एक सीख तो इंसान को अवश्य लेना चाहिए कि प्रकृति के आगे हमें नत होना ही पड़ता है । भले ही कोरोना को जैविक हथियार कहा जाए किन्तु यह भी कटु सत्य है कि इसे बनाकर इंसान ने इंसान के साथ ही खिलवाड़ किया है । मानवता कराह रही है और हम रोज मौत के आँकड़े गिन रहे हैं । जिन्दगी जहाँ ठहर गई है वहीं प्रकृति हँसने लगी है । आइए हम और आप सभी प्रण लें कि इस धरती को बचाएँ, सृष्टि को बचाएँ अपनी आने वाली पीढ़ी को एक स्वस्थ और समृद्ध जीवन प्रदान करें ।


