डा अजीत राय रचित ‘मृत्यु -पर्व ‘ मानव के विनाश लीला का दुखद संदेश है : ललन चौधरी
पृथ्वी दिवस पर डा. अजीत राय की हिंदी कविता ‘मृत्यु- पर्व..’ की समीक्षा
ललन चौधरी
हिंदी कविता में नये मानदंड और नयी चेतना स्थापित करने की जो सफल व सार्थक कोशिशें जिन कवियों के द्वारा संभव हो सकी है,उसमें हाल फिलहाल के दशकों में कुछ नये और कुछ पुराने स्थापित कवियों का नाम गिनाये जा सकते हैं..यथा आलोक धन्वा, अरूणकमल ,ज्ञानेन्द्रपति ,मंगलेश डबराल ,पंकज चतुर्वेदी और परवर्ती कवियों की नयी टोली में अजीत राय,डा.दीप्ति,अर्चना लार्क,डा. संजय कुमार सिंह ,अनुराधा प्रसाद आदि के नाम सुझाए जा सकते हैं..समय और काल के प्रवाह के समानान्तर कविता की भाषा ,शिल्प और कथ्य में भी परिवर्तन होते रहे हैं..जरूरी भी है कि परिस्थितियों की चाक पर घूमता हुआ आदमी अपनी तमाम इच्छाओं के बीच इस भटके और बिगड़े हुए समय में कहां जाय..सवाल बड़ा भी है और नहीं भी..कारण कि हर कविता का अपना एक उद्देश्य है,उसकी अपनी चेतना से जुड़ी समस्या और उसका सच होता है..निदान कविता के विद्यमान सच हो सकते है,लेकिन उससे भी ज्यादा कवि की वह धारा है जो अपनी पुरानी राह को छोड़कर नये मार्ग का अनुशरण कर चल पड़ी है..जिससे कविता के नये प्रतिमान बनते और टूटते रहते हैं…यह तब होता है जब हमारे मूल्यों में अति क्षरण और पतन का काल समा जाता है..तब कवि अपने नये शब्दों के जादू से फिर नया खेल शुरू करता है ,जहां दर्शकों की भीड़ इकट्ठी होती है,और वह एक जादूगर की तरह खेल दिखाकर अपना गठरी बांध चल फिरता है..तब दूर से उसे सुनाई पड़ती है कोई आवाज,जब कवि को जादूगर कह कोई पुकार रहा होता..सच में कवि एक जादूगर होता है..अपनी जादुई ताकत से शब्दों का ऐसा खेल खेलता है ,जहां सब सच होते दिखते हैं.।ऐसे ही खिलाड़ी का नाम डा. अजीत राय है..इनकी कविता जब भी सामने होती है,तो लिखने को बेचैन कर देती है,नये तेवर और नये विश्वास के साथ नये शब्दों को साथ लिए…नयी चेतना भरती है. कविता किसी भी वक्त और बेवक्त में लिखी जाती रही है,सुनी जाती रही है और अच्छे प्रबुद्ध वर्गों के बीच बड़ी ही गहराई से पढ़ी जा रही है..इन पढ़नेवालों में ज्यादातर कवि ही होते हैं…उन लोगों की संख्या कम ही होती है,जिन्हें कविता के पंखों की फडफड़ाहटसमझ में नहीं आती या जो बेवजह कविता पर सवार होकर कहानी की खोज करते हैं.।ऐसे प्रबुद्धजनों से कविता नष्ट भ्रष्ट होती दिखती है..कोई अर्थ नहीं रह जाता कि कविता क्या है..यह बताने के लिए.।
दर असल.यह पृथ्वी का कवि के द्वारा गाया गया ऐसा शोक गीत है ,जहां हर दर्द पिघलते नजर आते हैं,हर जख्म़ गहरे नजर आ रहे है और हर वेदना व पीड़ा की अनुभूतियां कड़वी हो चुकी है..
आगे जारी..
‘मृत्यु- पर्व’
मृत्यु – पर्व ————-
सोचा था , आज पृथ्वी दिवस है ।
धरती को झाड़ – पोंछ कर खूबसूरत बनाएँगे ।
नव किसलयों से अलंकृत छायाद्रुमों के सीमंत में
सिन्दूरी रेखा खींचेंगी किरनें उषा की ।
किरण अप्सराएँ छाप छोड़ जाएँगी ,
आलक्तक चरणों की जल – थल में ।
मलयानिल कानों में संदेश सुनाएगी अनागत का ।
पर यह क्या ?
अहिंसा के मसीहा की उपासना
रक्त रंजित हो उठी लंका में ।
लीप दिया था आंगन को किसी ने
बच्चों और वनिताओं के रुधिर से ।
टाँग दिया था बंदनवार नर मुण्डों का ।
बेकसूर बूढ़ों की बलि चढ़ाकर
कौन कर रहा था शक्ति – साधना ?
क्रंदन , विलाप , चीख – चीत्कार
जिनके संगीत का हिस्सा हो ,
सपनों में जन्नत , जेहाद का किस्सा हो ।
ऐसी आत्मघाती शिक्षा से आशा !
” लंका निशिचर निकर निवासा । ”
धर्म की ऐसी वीभत्स परिभाषा !
और सबसे बड़ा अजनबी है ईश्वर ,
जो अंत तक सूने आकाश में
क्रास बनकर टँगा रह जाता है ।
यह एक खूबसूरत कविता तो नहीं हो सकती ..बदसूरती की तमाम कल्पनाओं से लदी अलंकृत भाषा शैली में लिखी गयी यह ‘मृत्यु -पर्व ‘है..जैसे मरी हुई काया को फूल पत्ते से हम सजा लेते हैं…
याद आ रहे हैं प्रकृति के सुकुमार और कोमल कवि सुमित्रानंदन पंत…..।जिनके लिए प्रकृति ही प्रेमिका ,मां और प्रेरणा है..जीवन के वास्तविक सुखों की वेहद सुखद अनुभूतियां जहां पूर्ण होती है,वही धरा अपना संपूर्ण शृंगार करती है..कवि की कविता में आत्मा प्रवेश करती है..हिंदी साहित्य के सबसे शोक संतप्त काल की अगर विवेचना हो तो उसमें इक्कीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में काव्य कानन की आत्मा रो उठी है,तमाम संवेदना सूख गई और निष्ठुर व क्रूर मानव ने पृथ्वी माता के साथ जो अन्याय और पाप किए..उसे शब्दों में कहना फिर से उन कुकृत्यों पर आंसू बहाना है..कहते हैं कि आदमी की हत्या से भी ज्यादा खतरनाक और विभत्स प्रकृति के साथ अन्याय करना है..
छायावादोत्तर काल पर अगर ध्यान देंगे तो कविता की काया नंगी हो चुकी दिखाई देती है और मानव असभ्य और बर्बर होता हुआ दिख रहा होता है..
डा. अजीत राय की कविता ‘मृत्यु -पर्व ‘प्रकृति के संरक्षण और सुरक्षा के तमाम ढकोसले पर मानवीय व्यग्रता व बेचैनी का इस कदर उपहास करती है कि उसे बताना भी एक बिगड़ी व बड़ी नोटंकी होगी..आजकल तो बड़े सभाओं में ,गोष्ठियों में और बड़े मंचों पर पौधे को उपहार स्वरूप दिया जाता है..अलबत्ता फिर उसे कहां रोपा गया या लगाया गया..मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि को पता तक नहीं रहता.!!.या उसी गमले में दम तोड़ देता है..!
खैर,हम विषयांतर होने से ज्यादा उस बिंदू पर आना चाहते हैं,जहां पहाड़ की नंगी पीठ पर चमकती हुई धूप काल का रूप धारण कर रही है और दूर ..बहुत दूर तक कोई भी भी हरे पत्ते वाले वृक्ष दिखाई नहीं देते..पहाड़ों ,जंगलों और घाटियों में जो प्रकृति की मनोरम ,मनमोहक छटा व रंगबिरंगी चिड़ियों की चहक ,पत्तियों की सरसराहट के बीच जब कोयल की कूक सुनाई देती तो लगता की धरा की आत्मा जाग उठी.!.ऐसे में मां वसुंधरा उस क्षण को पाकर मानव के लिए नये पल और नयी खुशियों का संचार करती है..
काव्यजगत में सबसे दुखद और बदसूरत क्षण ,जहां हम मृत्यु -पर्व मनाकर आलाप कर रहे हैं..सच में कवि की कविता का शीर्षक मृत्यु पर्व आज की काव्यगत चेतना में एक मनहूसियत और वह उदासी है,जहां कवि की कल्पना बदरंग होती दिखाई देती हैं..प्रेम तत्व का लोप होना ही हमारे पतन का सबसे कारण है..यह कारण प्रकृति से ,धरा से दूर होते रिश्ते का है..मानव और प्रकृति के अनादिकाल से चले आ रहे रिश्ते में दरार पड़ गई है..सर्वत्र हाहाकार मचा है और मां वसुंधरा की आत्मा रो उठी है..
‘मृत्यु -पर्व ‘एक कविता नहीं मानव के विनाश लीला का वह दुखद संदेश है,जहां पृथ्वी पर कोई भी जीव सुख और चैन की नींद आने वाले दिनों में नहीं सो सकता..!!



