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प्रधानमंत्री जी ! मधेश में सम्मान पाने के लिये थोड़ा झुकना सीखिए फिर देखिए मधेशी आपको गला मिलने को तैयार है।

 

दीपेन्द्र कुमार चौबे। देश की राजनीति में बीते कुछ दिनो से सरकार द्वारा पास किया गया दो अध्यादेश पर काफ़ी चर्चा रही है । अनंत:सरकार को इस अध्यादेश को वापस लेना पड़ा है अध्यादेश लाने के पीछे सरकार का क्या मनसा रही होगी यह तो पता नहीं लेकिन यह अध्यादेश ने वर्षों से अनसुलझी कुछ सवालों को सुलझा दिया है और कुछ नए सवाल को जन्म दे गया है ।

वर्षों से  अनसुलझी सवाल ये था की दो धार में बटी दो मधेशी पार्टियों को रातों रात एक करदिया है और नए सवालों में मधेशी आत्मविश्वास से लेकर संस्कार तक को कठघरे में खड़ा कर दिया है ।

ये बात स्वीकार तो पहले ही होगया था की काठमांडू को मधेश कितना पसंद है इसका जीता जगता श्वेत पत्र के रूप में संबिधान को मधेशी जनता तो देख ही रही है ,लेकिन काठमांडू के मन में इतना द्वेष भरा है मधेश के प्रति फिर से एक बार जगज़ाहिर हो गया है , ओली ने अध्यादेश अपनी सत्ता बचाने केलिए लाए या मधेशी दल को फोड़ने के लिए ये तो प्रधानमंत्री को ही बेहतर पता होगा लेकिन उस अध्यादेश के बचाव में आप की कपोलकल्पित अभिव्यक्ति ने इसबार मधेशी के संस्कार पर बड़ी कुठाराघात किया है प्रधानमंत्री जैसे गरिमामय पद पर बैठ के देश के एक समुदाय के लोगों के संस्कार को चुनौती देना आप के सोच का परिचय देता है ।

प्रधानमंत्री जी आप को बतादूँ सत्ता और संस्कार में बहुत फ़रक होता है सत्ता पैसे से ख़रीदा जा सकता है लेकिन संस्कार पैसे से नहीं ख़रीदा जा सकता है संस्कार तो माँ के परवरिश से सुरू होता जिसको ना ख़रीदा जा सकता है ना ही बेचा जा सकता है ।

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जिस भूमि पर रह रहे मधेशी के संस्कार की आप राजनीतिक रुप से धज्जी उड़ा रहे है वह भूमि आप के लिए बाज़ार हो सकता है लेकिन हम मधेशी के लिए यह भूमि मातृभूमि है ।

मुझे लगता था की प्रधानमंत्री का जीवन का एकचौथाई जीवन मधेश में गुजरा है तो बकाई उनको मधेशी संस्कार अच्छे से पता होगा लेकिन ऐसा हो ना सका, प्रधानमंत्री जी आज मैं अपनी मधेश का संस्कार क्या है आप से साँझा करता हु ।

मधेश ने पहाड़ को हाथ धोने से लेकर मुँह धोने तक सिखाया ,आप को नेपाली वर्णमाला से लेकर अंग्रेज़ी के अल्फ़ाबेटस तक सिखाया, आप के रसोई घर के रासन से लेकर आप के छप्पन प्रकर के व्यंजन तक पहुँचाया और आप हमारे संस्कार पे अंगुली उठते है ।

जब पहाड़ी को खुद पहाड़ ने नकार दिया था उसी समय मधेश ने अपने भाईचारा के संस्कार से दोनो हाथों से आप को उठाया और आधी दर्जन से उपर काठमांडू को प्रधानमंत्री दिया जिसमें आप खुद भी शामिल है और आप मधेश के राजनीतिक संस्कर पर प्रश्न उठाएँगे।

प्रधानमंत्री जी आपके और हमारे संस्कर में बुनियादी फ़र्क़ है इसमें कोई शक नहीं है, जब मधेश में अधिकार के लिए ५४ शाहिद हुए थे तब आपने कहा था दो चार आम गिरने से कुछ नहीं होता है अपने अधिकार के लिए मधेश में लोग शाहिद हो रहे थे लेकिन आप को उस समय मज़ा आरहा था लेकिन जब पहाड़ भुक्कंप से त्रस्त हो रहा था और लोग मर रहे थे,तब अपने भाइयों के बचाव और राहत के लिए बिना सोचे मधेश के घर घर से हाथ आगे आया था ये ही हमारी और आप के संस्कार में बुनियादी फ़र्क़ है।

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जब आपने मधेशी को यूपी बिहारी कहा था तब मधेश ने आप को सिक्किमी और गढ़वाली नहीं बताया था मधेशी अपने पहचान और अस्तित्व के भूभाग को अपने लिए मधेश राज्य माँग रहा था तब आपने बोला की यूपी बिहार भी लेना होगा लेकिन कभी मधेश काठमांडू से नहीं कहा पहाड़ी भूभाग में पहाड़ी राज्य बनने के लिए सिक्किम या तिब्बत को लेना होगा, कितना फ़र्क़ है हमारे आप के सोच से लेकर संस्कार तक में ।

जब आपके ही पार्टी के एक वरिष्ठ नेता और भूपू प्रधानमंत्री ये कहता है की ये घोती (अर्थात् मधेशी ) धोती जैसे प्रदेश चाहता है लेकिन हम कभी नहीं कहे की ये पहाड़ी पूरे देश को दाउरा सलवार राज्य बना चाहते है ऐसे बाते क़रने को हमारा संस्कार अनुमति नहीं देता है ।
‘वसुधैव कुटुम्बकम और सर्वे भवंतु सुखिनो हमारी संस्कर के विरासत है ।
उनको धोती कहने में शर्म तो नहीं आयी होगी लेकिन आप को बतादु मुझे अपने धोती पर बहुत गर्भ है पता है क्यूँ की वो मेरा पैर से सर तक को ढकता है मेरी लाज को बचता है आप के दाउरा सुरवाल जैसे नहीं की ना ठीक से तन धकपता है ना ठीक से लाज भी ।

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विभेदकारी संबिधान के विरुद्ध जब सम्पूर्ण मधेश काला दिवस मना रहा था तब आप के एक और नेता और अभी एक प्रदेश के मुख्यमंत्री ने मधेशी काला होता है इसलिए काला दिन मना रहा है ट्वीट किया था ,प्रधानमंत्री जी काला गोरा होना हमारे बस का तो नहीं है यह तो भूभाग और प्रकृति पर निर्भर करता है लेकिन हमें अपने काला होने पर फकर ज़रूर है पता है क्यूँ इस कालापन में सभी को समाहित क़रने का संस्कार है हरवर्ण हररंग अपने समरूप क़रने की शक्ति है जो की आप के गोरेपन में नहीं है ।

ओली जी आप को बिना जाने समझे और अपने उखान टुके के आधार पर मधेशी संस्कार पर कोई टीकाटिप्पणी से बचना चाहिए और अपने ही समाज के लोगो के प्रति इतनी गहरी नकारात्मकता भरी द्वेष से उपर उठना चाहिए,ऐसे नकारात्मकता के साथ कैसे आप सो पाते है।
छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता और टूटे मन से कोई खड़ा नहीं हो सकता, प्रधानमंत्री जी
मधेशी संस्कार को देखने के लिए थोड़ा तो आप झुकिए फिर देखिए हर मधेशी आप को अपनी बाँहें फैला के कैसे स्वागत करता है ।

दीपेन्द्र चौबे

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