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वुहान डायरी लिखने की कीमत चुका रहीं हैं चीन की पुरस्कृत लेखिका “फेंग फेंग”

 

अजय श्रीवास्तव

 

चीन के वुहान शहर की 64 वर्षीय लेखिका फेंग फेंग को उनकी आँनलाइन डायरी लिखने के कारण जान से मारने की धमकियां मिल रहीं हैं।वुहान की रहनेवाली साहित्यिक पुरस्कार विजेता फेंग फेंग ने लाँकडाउन के दौरान एक के बाद एक साठ पोस्ट लिखीं और उस पोस्ट को अपने सोशल मीडिया एकाउंट पर भी डाला।उन्होंने अपने हर दिन के पोस्ट में वुहान शहर के नजदीकी हालात से लोगों को रूबरू करवाया।उनका पोस्ट इतना जीवंत होता था कि वुहान समेत पूरे चीन में बड़े चाव से पढा जाने लगा था।उन्होंने पहला लेख 25 जनवरी को कोरोना वायरस के संक्रमण के फैलाव पर लिखा,जो काफी पसंद किया गया।उसके बाद तो ये सिलसिला लाँकडाउन समाप्त होने की घोषणा (24 मार्च)तक अनवरत जारी रहा।इन साठ दिनों में लेखिका ने चीन के सरकारी अस्पतालों में बदइंतजामी की बखिया उधेड़ कर रख दी।वे हर उन बातों को सजीवता से लिखती रहीं जो उन्होंने लाँकडाउन के दौरान देखा था,अपने बौद्धिक दोस्तों से सुना था।इस दौरान वो क्या महसूस कर रहीं थीं उसका वर्णन उन्होंने अपने आँनलाइन डायरी में किया है जो अब प्रकाशित होने वाला है।
उनके एक पोस्ट को काफी पसंद किया गया जिसमें उन्होंने एक स्थानीय श्मशान का माहौल लिखा था।दरअसल उनके एक डाक्टर मित्र के रिश्तेदार की मौत कोरोना संक्रमण से हो गई थी।वो डाक्टर स्थानीय श्मशान में अपने रिश्तेदार के अंतिम क्रियाकर्म के लिए गए थे।वहाँ से उन्होंने एक फोटो फेंग फेंग को भेजा।वो लिखती हैं कि फोटो में दिख रहा है कि श्मशान भूमि पर लोगों के मोबाइल फोन अनाथों की तरह पडे हुऐ हैं।
उन्होंने एक पोस्ट में लिखा कि सरकार का ये दावा कि हमारी स्वास्थ्य सेवा कोरोना संक्रमण को रोकने और मरीजों के इलाज के लिए सक्षम है,उसकी पूरी तरह पोलपट्टी खुल गई है।अस्पताल में मरीजों को भर्ती करने के लिए बेड नहीं है।मरीजों को मरने के लिए उनके घरों में भेजा जा रहा है।अव्यवस्था का ये आलम है कि कोई भी जवाबदेह व्यक्ति कुछ भी बोल नहीं पा रहा है।ये बात उन्होंने वुहान के सरकारी अस्पताल में कार्यरत उनके डाक्टर मित्र के हवाले से कही थी,जो शायद अक्षरतः सत्य भी है क्योंकि जब अस्पताल मरीजों से पट गया था तब आननफानन में कई अस्थायी अस्पताल बनाए गए थे।जिसके फुटेज चीन सरकार ने अपनी वाहवाही में जारी किया था कि देखो चीन ने ग्यारह दिन में अस्पताल तैयार कर वहां मरीजों का इलाज शुरू कर दिया है।
वुहान डायरी की लेखिका लाँकडाउन के शुरूआती दिनों में लिखती हैं कि डाक्टरों ने वुहान सरकारी अस्पताल के इंचार्ज और वुहान प्रशासन से ये गुहार लगाई थी कि ये वायरस इंसान से इंसान में फैल रहा है मगर हम लोगों की आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज हीं साबित होकर रह गई।ये बात भी पूरी तरह सच होती प्रतीत होती है क्योंकि वुहान शहर को कोरोना वायरस के खतरे से आगाह करनेवाले सबसे पहले शख्स डा.ली वेनलियांग ने भी सरकार और अस्पताल प्रशासन से काफी गुहार लगाई थी मगर जब उनकी नहीं सुनी गई तो उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखकर लोगों को आगाह करना शुरू किया था।
जब तक फेंग फेंग ने हल्की फुल्की बातें लिखीं तब तक तो सबकुछ ठीक था मगर जब उन्होंने सरकार की नाकामयाबियों को उजागर करना शुरू किया, वो सरकार और सरकार समर्थक लोगों के निशाने पर आ गईं।उन्हें धमकी मिलनी शुरू हो गई थी।चीन सरकार के दवाब में आकर उन्हें अपने सोशल मीडिया एकाउंट से बहुत कुछ डिलीट करना पडा था मगर तब तक देर हो चुकी थी।ब्रिटेन और जर्मनी के प्रकाशकों ने उनके डायरी को किताब की शक्ल देने का दृढ़ निश्चय कर लिया था, जिसमें फेंग फेंग की भी पूर्ण सहमति थी।
फेंग फेंग ने एक स्थानीय मीडिया को दिये एक साक्षात्कार में कहा कि लोगों के दवाब के कारण उन्हें अपने डायरी के बहुत से पन्नों को हटाना पड रहा है।पुलिस भी उनकी सुरक्षा के प्रति उदासीन है जैसे वुहान प्रशासन है।सरकार ने उनका सोशल मीडिया अकाउंट Weibo अस्थायी तौर पर बंद कर दिया है।
साक्षात्कार के कुछ हीं दिनों बाद स्थानीय मीडिया ने अपने पोर्टल से ये साक्षात्कार को हटा दिया, शायद वो भी सरकार से डर गया था।इसी बीच रेडियो फ्रांस इंटरनेशनल ने एक खबर छापी कि एक आदमी ने वुहान शहर के बीचोबीच एक पोस्टर लगवा दिया, जिसमें लेखिका की तस्वीर के साथ लिखा था…चीन को बदनाम करने की वजह से लेखिका को शर्म से या तो संन्यास ले लेना चाहिए या खुदकुशी कर लेनी चाहिए और अगर ऐसा नहीं होता है तो मैं खुद हीं फेंग फेंग को मार दूंगा।
जब से किताब के प्रकाशन की खबर फैली है रोज फेंग फेंग के पास धमकी भरे फोन आ रहें हैं।चीन के सरकारी अखबार में भी फेंग फेंग की कडी आलोचना की गई है।बहुत से बडे अखबारों के संपादकों ने लेखिका के खिलाफ लेख लिखें हैं जो चीन के सामंती मानसिकता को प्रर्दशित करते हैं।
चीन में अभिव्यक्ति की स्वत्रंत्रता पर सरकार का कडा पहरा है।आपको चीन की राजधानी बीजिंग के थियामिन चौक पर 03/04 जून 1989 में लोकतंत्र के समर्थन में बडा विरोध प्रर्दशन की घटना तो याद हीं होगी।उन दिनों चीन के छात्रों और मजदूरों ने वहाँ लोकतंत्र बहाली के लिए एक आंदोलन चलाया था, जिसको हवा चीन की ताकतवर कम्युनिस्ट पार्टी के लोकतंत्र समर्थक व लिबरल सुधारक हू याओबैंग ने दी थी।मई 1989 में उनकी अचानक मौत हो जाती है जो संदिग्ध मानी गई थी।लोगों के आग्रह के बावजूद मौत की निष्पक्ष जांच नहीं कराई गई।छात्रों में बेहद उबाल था।30 मई को छात्रों ने लोकतंत्र की मूर्ति थियामिन चौक पर स्थापित कर दी।सरकार की चेतावनी के बाद भी ये मूर्ति लगाई गई थी।थियामिन चौक पर तब दस लाख छात्र और लोकतंत्र समर्थक लोग इकट्ठा हो गए थे।इतनी बड़ी भीड को देखकर 02 जून 1989 की देर रात चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने देर रात मार्शल लाँ लागू कर दिया।तभी ये तय हो गया था कि सरकार प्रर्दशनकारियों पर कडा प्रहार करेगी।03 जून को सेना ने थियामिन चौक को चारों तरफ से घेर लिया और लोकतंत्र समर्थकों को चेतावनी दी जाने लगी कि वे अपने घरों को चलें जाएं, नहीं तो उन्हें जबरन हटा दिया जाएगा।थियामिन चौक से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया को पूरी तरह से हटा दिया गया और 04 जून 1989 को सेना ने कार्रवाई शुरू की।छात्रों पर टैंक चढा दिया गया, अंधाधुंध फायरिंग की गई।एक अनुमान के मुताबिक तकरीबन दस हजार लोकतंत्र समर्थक छात्र उस आंदोलन में मारे गए थे।
पश्चिमी देशों ने इसका बहुत विरोध किया मगर चीन ने एक बार भी उस विषय पर अपनी जुबान नहीं खोली।कोई भी नेता, अधिकारी या नागरिक इस विषय पर बात करना नहीं चाहता है।थियामिन चौक नरसंहार के तीस साल बीतने के बाद सिंगापुर में व्यापार और सुरक्षा से जुडे एक क्षेत्रीय मंच पर जब चीन के रक्षा मंत्री से थियामिन चौक से संबंधित सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा,”तीस साल बाद हर किसी को थियामिन की चिंता है।इन तीस सालों में वामपंथी पार्टी के शासन के दौरान चीन बहुत से बदलाव से गुजरा है।क्या आपको लगता है कि चार जून की घटना को संभालने में सरकार गलत थी।उस घटना के लिए वो एक निष्कर्ष था।यह एक राजनीतिक उथल पुथल थी,जिसे केंद्र सरकार को सुलझाने की जरूरत थी।सरकार ने अशांति को रोकने के लिए निर्णायक कदम उठाया, यह सही नीति थी।”
चीन के किसी बडे नेता ने घटना के तीस साल बाद अपना मुँह खोला मगर उन्होंने सरकार का हीं पक्ष लिया।चीन में सरकार के खिलाफ कुछ भी बोलना या लिखना गुनाह है।आपको 2015 की उस घटना की याद दिला दें जब हांगकांग में चीन के पाँच प्रकाशक एकाएक गायब हो गए।गायब होने वाले सभी लोगों ने अभिव्यक्ति की स्वत्रंतता पर काफी कुछ बोला और लिखा था।सभी जानते हैं कि उनके गायब होने के पीछे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी है मगर वहाँ बोलेगा कौन?जो आवाज उठाएगा उसका वही अंजाम होगा जो इन पाँचों का हुआ है।
चीन सरकार का रूख भांपकर फेंग फेंग काफी डरी हुई हैं।वो अपने देश का इतिहास अच्छी तरह से जानती हैं।कम्युनिस्ट सरकार अपने विरोधियों को निपटाने के लिए किसी भी स्तर पर जा सकती ये तो सभी जानते हैं।किताब के प्रकाशन के बाद चीन की हकीकत सारी दुनिया के सामने आ जाएगी, इस वजह से चीन अपनी लेखिका से बेहद नाराज है।

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लेखक परिधि समाचार दैनिक के संपादक हैं

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