Sat. May 2nd, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

“धर्म-निरपेक्ष गणतान्त्रिक कुर्सी”

 

डा. मनोज मुक्ति “विवेक”

दो पैर वाला मनुष्य जब चार पैर वाला कुर्सी पर बैठता है तो आनंद का अनुभव करता है और घोडा बेचकर सो जाता है। कुर्सी सिर्फ आराम करने के लिये नहीं बल्कि काम करने के लिये भी बनायी गयी है। मगर आज के दिन तक नेपाल की राजनीतिक कुर्सी सिर्फ सत्ता सुख और रमनचमन करते हुए स्वर्गीय आनंद प्राप्त करने तक ही सीमित  रह गयी है। सरकार से बाहर होने पर कभी सडक तो कभी सदन में तथाकथित आंदोलन करनेवाला भी जब सत्ता की कुर्सी पर पहुँचता है तो पहुँचते ही घोडा बेचकर सो जाता है। और अगर कभी आम जनता जगाना भी चाहे तो सिर्फ अर्धनिंद्रा में शासक के निगाहो से देखा जाता है। यह एक राजनीतिक संस्कार, परम्परा के जैसा बन गया है। लोकतंत्र/गणतन्त्र में लोकतान्त्रिक/गणतान्त्रिक सरकार का काम और कर्तव्य भूलकर कुर्सी पर बैठे बैठे आराम से झपकी लेते हुए सिर्फ और सिर्फ सरकार अपनी खोखली और कपोकल्पित उपलब्धियों की फेहरिस्त परोसने में अभ्यस्त रही है। जनता की आधारभूत आवश्यकता भी पुर्ति न कर पाने वाला लोकतान्त्रिक/गणतान्त्रिक सरकार बडे बडे भाषण से जनता तक राशन और राहत देना चाहता है। पर भाषण से गरीब का पेट खाली ही रह जाता है। कुर्सी के अत्याधिक राप-ताप से धृतराष्ट्र शासक वर्ग आम नागरिक के लिये जनमन के बाते न कर सिर्फ भाषण से गर्म खाना देना चाहता है। पर बेचारी जनता गर्म खाने से मुँह जलने के डर से दूर से ही सरकार की गतिविधियों पर पैनी नजर बनाये रखती  है। और सत्तासीनों महामहिमोंको लगता है जनता सो रही है, यह सोचकर मजे से भागबन्डा, कमीशनखोरी, भ्रष्टाचार, दुराचार, मौजमस्ती में ब्यस्त एवं अभ्यस्त रहती है ।
राजनीतिक असक्षमता के कारण जब भ्रष्टाचार, दुराचार, मौजमस्ती, सुख-सुविधा मे कमी हुई तो बि. सं. 2061/62 में नेपालियों को खोखले सपने बांटे गए, झूठा आश्वासन देतें हुए तत्कालीन सरकार और ब्यबस्था के खिलाफ नई नई कुर्सियों की ब्यबस्था और ब्यबस्थापन की गयी। लेकिन कुर्सी पर पहुँचते ही कुर्सी वापस दिलानेवाली आम जनता को भूलकर सत्ता के रमनचमन मे लीन हो गए। नेपाली जनता भुख, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा जैसी समस्या से जुझ रही है पर कुर्सीवालों को “समृद्ध नेपाल सुखी नेपाली” ही नजर आ रहा है। कर-आतंक, आर्थिक अराजकता और राज्य संरक्षित बहु-आयामिक GUNतन्त्र से जनता को सांस लेने मे भी तकलीफ हो रही है मगर कुर्सीवाला तो सिर्फ कुर्सी के आनंद में मगरुर है । वह अपनी आँखे भी तभी खोलता है जब कुर्सी खतरे मे होने का अहसास हो। अपने लिये तो कुर्सी ही सब कुछ है जैसी आशावादी सोच के साथ जीवन के अंतिम समय तक कुर्सी से फेविकल कि तरह चिपके रहने के प्रति सरकार दृढ संकल्पित है । आखिर कुर्सीवाला निराश क्यों बने ? सत्ता है तो स्वाद है।
धर्म-निरपेक्षता और गणतन्त्र जैसे खोखले उपलब्धि के नाम पर आम जनता को बहला फुसलाकर सडक पे उतारने वाला जब कुर्सी पे पहुँचे तो खुद को ही भगवान होने का संदेश देने लगे है। धर्म और धर्मग्रन्थों को झूठा और बकवास करार दिया गया है, इतिहास परम्परा संस्कार संस्कृति उत्तरदायित्व को विकास और अग्रगमन के बाधक के रुप में चित्रण किया गया है। उनके लिये तो सत्य केबल कुर्सी ही है ।  अल्पज्ञान को ब्रम्हज्ञान बताकर झूठा प्रचार करना ही मुल कर्म बनाया गया है। धर्म, संस्कृति, वेद और पुराण को काल्पनिक बतलाने वालों को अपनी गैरराजनीतिक आचरण, क्रियाकलाप और निरंकुश शैली बिलकुल नये शैक्षिक कार्यक्रम की तरह लगता है। जनता के सुख तथा भलाई के लिये कुछ ना देखने वाला कमजोर नेत्र और पके आम की तरह जीर्ण शरीर पुराना नहीं लगता है। और खून की नदी बहाकर कहते है, दो चार आम टपकने से कोइ फर्क नहीं पडता है। अगर वो कुर्सी के लिये सडक गर्म करे तो जनआंदोलन कहलाता है। मगर जनता स्वतःस्फूर्त तरीका से उनके बिरोध मे मानव दीवार बनाए तो मक्खी का झुन्ड दिखता है।
भागवत गीता के अनुसार मनुष्य को निरन्तर सत्यकर्म करना चाहिये। सुखदुःख , लाभ-हानि, डर भय, नाफा-नुकसान, जय और पराजय जैसी बातों पर ध्यान न देकर केबल सत्य के लिये हमेशा संघर्षरत रहना चाहिए । अन्त में जीत सत्य की ही होती है। सत्य की जीत ही देश, समाज और मानव को पुनर्जीवन प्रदान करता है। लोकतान्त्रिक/गणतान्त्रिक नेपाल का राजनीति असत्य और भ्रम के दलदल मे डूबता दिख रहा है। कुर्सी के लालच में देश का गौरबमय इतिहास खत्म कर और बिभुतियों का शालिक तोडकर नयाँ विध्वंसकारी ब्यबस्था की नीव डाली गयी है। पर गणतन्त्र का लड्डु अब लोहे का लड्डु बनकर रह गया है। जिसे अब जनता ना निगल पा रही है और ना चबा पा रही है। परन्तु लोकतंत्र के कमाउनिस्ट और फासिस्ट से हमेशा के लिये देश को छुटकारा दिलाने का काम सिर्फ और सिर्फ नेपाली जनता पे निर्भर है। सत्ता स्वार्थ के लिये कभी लडाकु बने आम नेपाली को अब देश के रक्षा के लिये असली लडाकु बनकर दिखाना होगा। हमेशा बेतुकी ब्यबस्था और अवसरवादी के लिये टायर जलाने बाले आम जनता को अब घर से बाहर निकलना ही होगा।  देश इतिहास के सबसे असहज और गम्भीर स्थिति में है। आसानी से दो वक्त की रोटि पाने की लालच मे बहुत कुकर्म हुआ। अब सत्यकर्म करनेका समय है। जनताको कभी ना पल्ट्कर देखनेवाला कुर्सी पे आसीन कचरा को साफ करनेके लिये भगवान, ईश्वर और देश का शपथ लेतें हुए एकजुट होना ही समय, देश और जनता की प्रमुख मांग है। नेपाल प्यारा है माननेवालो जय नेपाल और जय नेपाली कहते हुए आगे बढना ही इस समय का सत्यकर्म है।
“धर्म-निरपेक्ष संघीय लूटतान्त्रिक GUNतन्त्र” की उल्टी गिनती सुरु काराना हि होगा ! “धर्म-निरपेक्ष गणतान्त्रिक कुर्सी के खेल को सदा के लिए पशुपति आर्य-घाट मे विसर्जन कराना ही होगा ।”
ये लेखक के स्वतंत्र विचार हैं ।
डा. मनोज मुक्ति “विवेक”
(डा. मनोज कुमार झा)
राष्ट्रिय अध्यक्ष
जनतान्त्रिक तराई मुक्ति मोर्चा

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *