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क्या एक मजदूर अपने बेटे के मजदूर बनने की कामना करता है ???

 

*—1 मई….मजदूर दिवस—*

देश में मजदूरों की स्थिति इतनी दर्दनाक है के आज “मजदूर दिवस” की शुभकानाए देने की हिम्मत नही हो रही है । “मजदूर दिवस ” विकसित और अमीर देशों से शुरू हुई परम्परा है जहाँ मजदूर का दैनिक वेतन सम्मानजनक जीवन शैली के लिए पर्याप्त होता है । इंजीनियर-दिवस की एक इंजीनियर को , शिक्षक-दिवस की शिक्षक को हम दिल खोल बधाई दे पाते है क्योंकि हमें मालूम है इस पेशे से समाज में सम्मानजनक जीवन जीने के पर्याप्त साधन उपलब्ध हो पाते है । अमेरिका जैसे सम्पन्न देशों में मजदूरों का वेतन इस स्थिति तक पहुँचता है कि वो खुद की कार , मकान का वहन करने में सक्षम है । जहाँ एक मजदूर की भी सामाजिक प्रतिष्ठा इतनी होती है कि वो अपने वरिष्ठ से हाथ मिलाकर उन्हें प्रथम नाम से पुकार कर सम्बोधित करता है । मजदूर-दिवस का उत्सव उन देशों में अपनी अस्मिता को अक्षुण्ण बनाए हुए है ।

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क्या हम अपने देश में आशा रखते है कि एक मजदूर को आप उसके मजदूर होने पर बधाई दे सके । मजदरों को मिलने वाली मजदूरी परिवार के लिए दो वक़्त का भोजन जुगाड़ करने भी अपर्याप्त है । हम उस घटना के लिए ही बधाई दे सकते है जिस घटना का दुहराव हमें आनंदित करे । क्या एक मजदूर अपने बेटे के मजदूर बनने की कामना करता है ??? हम मजदूर दिवस की बधाई तब ही दे सकते है जबकि उन्हें इतना भुगतान किया जाए कि वे अपने परिवार का खर्च संतोषजनक ढंग से उठा पाए । आज मजदूर-दिवस पर ईश्वर से प्रार्थना है कि हमारे सुदूर ग्रामीण इलाको में , ईट भट्टो में , शहरी क्षेत्रों की फैक्ट्री , भवन निर्माण आदि जगहों पर हज़ारो की तादाद में बंधुवा मज़दूरी करते उनके जीवन को इस गुलामी से मुक्ति मिले । महज़ कागजों में निर्धारित न्यूनतम मजदूरी का आधा भी न प्राप्त करने वाले “मजदूर ” जीवन की बुनियादी सुविधाओं से कोसो दूर है । देश निर्माण करने वाले इन मेहनतकश वर्ग से ठेकेदारों द्वारा नारकीय परिस्थियों में काम लिया जाता है ।

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कुछ उद्योग जैसे चूड़ी निर्माण , काँच व्यवसाय , फटाका और प्लास्टिक उद्योग तो परम्परागत रूप से “बाल मजदूरों” के शोषण द्वारा ही चलायें जा रहे है । समय से पहले ही बूढ़े ,बीमार और काल कवलित हो जाते है । साधनहीन ,अभावग्रस्त , गरीबी का पर्याय बन चुके “श्रमवीरो” को उनकी इस दशा पर बधाई नही सिर्फ नमन है । मजदूर संगठनो का शीर्ष नैतृत्व मजदूर हितों पे कार्य करने से ज्यादा राजनैतिक दलों की कठपुतली बन अपना स्वार्थ सिद्ध करता रह जाता है । सर पर भारी बोझ लिए सड़क निर्माण कार्यों , फैक्ट्री , भवन निर्माण क्षेत्रों में हड्डी तोड़ मेहनत करके भी जिंदगी से जूझते इन निस्तेज , थके , लाचार , कमज़ोर चेहरों को देख मन अपराधबोध से भर जाता है । ईश्वर देश में जल्द ही बंधुवा और बाल मजदूरी की परम्परा समूल नष्ट कर समाज की सबसे महत्वपूर्ण जमीनी कड़ी को सम्मान दिला सच्चे अर्थो में “मज़दूर दिवस” को सार्थक करे ।

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“हम मजदूर है मजदूरी कर पेट पालते है,
सबके जीवन में अनगिनत खुशियाँ लाते है।
पर आप तो साहब हमारी नींव पर खड़े होकर,
हम मजदूरों को ही लात मारते हैं”।

रीमा मिश्रा”नव्या”

रीमा मिश्रा “नव्या”
आसनसोल(पश्चिम बंगाल)

 

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