मैं तो मजदूर हूँ नसीब से अपने, मजबूर हूँ : विनोद निराश
मैं तो मजदूर हूँ : विनोद निराश
नसीब से अपने, मजबूर हूँ ,
मेहनत करता हूँ, मगरूर हूँ।
दिन रात पसीना, बहाता हूँ ,
नज़र में लोगो की, बेशऊर हूँ।
धरती पर भी मैं, सो लेता हूँ ,
थकान से शरीर की, चूर हूँ।
स्वाभिमान से सदा, जीता हूँ ,
मक्कारी बेईमानी से, दूर हूँ।
यूँ तो अभावो का, अभागा हूँ ,
मगर टूटी झोपडी का, नूर हूँ।
गर्मी, सर्दी, बरसात सहता हूँ ,
इसलिए मैं थोड़ा सा, बेनूर हूँ।
असंख्य तनावो से, मैं दबा हूँ ,
सरकारी फाइलों में, मशहूर हूँ।
गरीबी, लाचारी से, जूझ रहा हूँ ,
क्यूँकि मैं तो, निराश मजदूर हूँ।



