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इस बार लॉकडाउन में पड़ा वट सावित्री व्रत, महिलाएं ऐसे कर सकती है पूजन

 

लॉकडाउन में वट सावित्री व्रत : आचार्य राधाकान्त शास्त्री

कोरोना महामारी के कारण लॉकडाउन जारी है
इसी बीच कल 22 मई शुक्रवार को सनातनी आस्था का एक महान पर्व ज्येष्ठ अमावस्या भी है। इस दिन किए जाने वाले व्रत विधान में सुहागिन स्त्रियां बरगद वृक्ष की पूजा कर पति व परिवार की समृद्धि और सुरक्षा की मनोकामना मांगती हैं। कच्चे-पक्के दोनों ही भोजन का प्रसाद वट वृक्ष को अर्पित कर पूजन किया जाता है.

पति की दीर्घायु के लिए किया जाने वाला यह व्रत इस बार 22 मई शुक्रवार को है. कोरोना काल में होने वाली इस पूजा को लेकर व्रतियों में कुछ संशय भी है।
*लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के बीच इस व्रत को कैसे पूरा करें अगर बहुत से लोग वट वृक्ष के पास जमा हो जाएंगे तो इससे भीड़ होने के कारण सोशल डिस्टेंसिंग का उल्लंघन हो सकता है।*

*ऐसी स्थिति में वट वृक्ष की एक टहनी घर में लाकर गमले या भूमि में स्थापित करें, उसकी भी पूजा व परिक्रमा का फल वृक्ष की पूजा के बराबर ही मिलता है।*
*सत्यवान-सावित्री की स्मृति में करते हैं पूजन*
*पौराणिक कथा के अनुसार, इस दिन ही सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प और श्रद्धा से यमराज द्वारा अपने मृत पति सत्यवान के प्राण वापस पाए थे।*
*महिलाएं भी इसी संकल्प के साथ अपने पति की आयु और प्राण रक्षा के लिए व्रत रखकर पूरे विधि विधान से पूजा करती हैं. मान्यता है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश और सावित्री भी वट वृक्ष में ही रहते हैं. लम्बी आयु , शक्ति और धार्मिक महत्व को ध्यान रखकर इस वृक्ष की पूजा की जाती है. बरगद के वृक्ष की आयु खुद भी बहुत लंबी होती है।मान्यता है कि इस वृक्ष को खुद देवताओं ने अमृत से सींचा था. इसीलिए आरोग्य और स्वस्थ जीवन शैली का बरगद सबसे सुंदर प्रतीक है।*

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*बरगद के पेड़ की पूजा त्रिदेव के रूप में ही की जाती है. अगर आप बरगद के पेड़ के पास पूजा करने नहीं जा सकते हैं तो आप अपने घर में ही त्रिदेव की पूजा करें. साथ ही अपने पूजा स्थल पर तुलसी का एक पौधा भी रख लें । अगर उपलब्ध हो तो आप कहीं से बरगद पेड़ की एक टहनी तोड़ कर मंगवा लें और गमले में लगाकर उसकी पारंपरिक तरीके से पूजा करें। पूजा की शुरुआत गणेश और माता गौरी से करें. इसके बाद वट वृक्ष की पूजा शुरू करें।*

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सुहागिन स्त्री को करें दान
पूजा में जल, मौली, रोली, कच्चा सूत, भिगोया हुआ चना, फूल तथा धूप का प्रयोग करें. फिर भीगा चना, कुछ धन और वस्त्र अपनी सास को देकर उनका आशीर्वाद लें ।
इस व्रत में सावित्री-सत्यवान की पुण्य कथा का श्रवण जरूर किया जाता है. यह कथा पूजा करते समय दूसरों को भी सुनाएं।

इसके साथ ही किसी ब्राह्मणी या निर्धन सौभाग्यवती स्त्री को सुहाग की सामग्री का दान करें. पूजा के उपरांत पंखें और शीतल जल का दान भी किया जाता है।

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पंखे और जल का भी दान
वैशाख से लेकर ज्येष्ठ मास तक जलदान की सुंदर परंपरा रही है. यह दोनों ही अत्यंत गर्म महीने हैं।
इस दौरान जल पूर्ण रूप से अमृत हो जाता है. वैशाख में प्याऊ बैठाई जाती है, ताकि किसी को भी पानी की कमी न हो।
इसी तरह बरगद की पूजा के बाद हाथ के बने पंखे का दान किया जाता है ताकि शीतलता बनी रहे. प्यासे को जल पिलाना अलिखित पुण्य है, खुद में एक पूजा है।
वट सावित्री पूजन की हार्दिक शुभकामना, आप सपरिवार की समस्त प्रसन्नता बनी रहे, आचार्य राधाकान्त शास्त्री,

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