मैं ही सेठ-साहूकारों का गल्ला, मेरे बिना हर कोई ‘निठल्ला’ : राजीव मणि
हे माली
हे माली !
तुम कैसे हो जो
तुम्हें नहीं कोई चाह
दिनभर बगीया में जुतते हो
पर भरते नहीं आह
युग बदला, लोग बदले
पर तुम रह जाते प्यासा
तुम्हारे बगीया के पुष्पों की
अब बड़ी-बड़ी अभिलाषा
हर डाली से कांटे तुम चुनो
दूसरों के गहने तुम बुनो
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों में
तुम्हारे पुष्प इठलाते
हाय ! तुम रह जाते प्यासे
हे माली !
तुम खुद को पहचानो
सिर्फ कर्तव्य नहीं
अधिकार भी जानो
आखिर कबतक यूं सहोगे
अपने मन की नहीं कहोगे
तुम्हारे चमन के पुष्प अब
सुरबाला ले जाती
तुम जीते या मरते हो
क्या कभी पूछने आती ?
फिर भी बोलो क्यों डरते हो
खुद ही खुद से क्यों लड़ते हो
ऐसा कर तो मर जाओगे
भला किसका कर जाओगे
अब मत रखो किसी से झूठी आशा
उठो, पूर्ण करो अभिलाषा।
मैं नोट हूं
मैं ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश
मैं ही हूं गणेश
मैं ही दुर्गा, लक्ष्मी, काली
मैं ही कलकत्ते वाली
मैं ही काया, मैं ही माया
मैं ही मान-सम्मान
मैं ही लोकतंत्र का वोट हूं
हां, मैं नोट हूं।
मैं ही कलयुग का
सम्मान और प्यार
हूं बच्चों का दुलार
मुझसे ही आकर्षक है लैला
मेरे बिना हर मजनूं कसैला
मैं ही हूं छप्पन ‘भोग’
मेरे बिना हर ‘इच्छा’ रोग
मैं ही लोकतंत्र का खोट हूं
हां, मैं नोट हूं।
मैं ही महलों की शान
मैं ही हर पगड़ी की आन
मैं ही बाजार का रक्तचाप
मैं ही कोठे पर तबले की थाप
मैं ही सेठ-साहूकारों का गल्ला
मेरे बिना हर कोई ‘निठल्ला’
मैं ही लोकतंत्र पर चोट हूं
हां, मैं नोट हूं।
अलगाववादी, आतंकवादी, नक्सलवादी के
हाथों में हूं तो विनाश
किसान, वैज्ञानिक, उद्योगपति के
हाथों में हूं तो विकास
मैं ही शेयर बाजार का लाल-हरा निशान
मेरे बिना आत्महत्या कर रहा किसान
मैं ही अमीरों के शरीर पर
टंगा गरमी का कोट हूं
हां, मैं नोट हूं।

संस्थापक/प्रबंध संपादक
नये पल्लव प्रकाशन, पटना


