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राम बनना चाहते सारे, त्याग कोई करता नहीं : ज्योति अग्रवाल

 

दौर है मन्दी का, खर्चा कम कर लेंगे

दौर है मन्दी का, खर्चा कम कर लेंगे।
चादर है जितनी, पाँव उतनी पसार लेंगे।।
धोखादारी करके, रुपैयाँ एक कमाना नहीं।
मेहनत की खाएंगे, ठगी धंधा चलाना नहीं।।
हवा शुद्ध चाहिए गर, मन के मैल धोने होंगे।
सृष्टि को बचाना है तो, पेडों से मंजर भरने होंगे।।

पुर्णिमा का चाँद देख्ना है तो, अमावस का अंधेरा सहना पडेगा।
करम ही कुछ ऐसे किए है, कण कण हमको तपना पडेगा।।
शिकायत करने से, हल कोई निकलेगा नहीं।
स्नेह से ना सींचेगें पौधा, पुष्प उसमे पनपेगा नहीं।।
कर्ज है धरती मां का, चुकता हमको करना होगा।
जहर भरी हवा मे हमने, अब खुश्बु से भरना होगा।।

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धरती में ही आता भूकम्प, पाप इधर ही बढा है।
आसमान में आता भूकम्प, क्या किसी ने सुना है।।
हल्के हो जाए तन मन से, गुस्सा लालच छोडकर।
बोझ धरती पे कम करे पाप का, सज्जन रास्ता पकडकर।।
मुस्कुराती राहें चाहिए तो, फूल पौधों को हँसाना होगा।
खफा प्रकृति को मना लेंगे, कोरोना को फिर हारना होगा।।

राम बनने चाहते सारे, त्याग कोई करता नहीं।
धर्म का जो रास्ता पकडे, उससे बडा कोई दाता नहीं।।
होता नही सबके नसीब मे ,पेट भर खाना।
भुल कर भी जूठा न जाए, अनाज का एक भी दाना।।
धरती बचाने के लिए, दानव को मानव बनना होगा।
पछता रहे है सारे, शिव को ये जहर भी पिना होगा।।

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ज्योती अग्रवाल,
लेखक,
काठमाडौं, नेपाल।

 

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