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जग में फैला घनघोर तिमिर, रहा न धरा पर स्वच्छ समीर : अंशु झा

 

करने दो विश्राम जरा

करने दो विश्राम जरा,

अपने शीतल छांव में,

फिर से उठ संघर्ष करे,

आ जाए स्फूर्ति जन मेंं ।

जग में फैला घनघोर तिमिर,

रहा न धरा पर स्वच्छ समीर,

चारों तरफ विष फैल रहा,

धू धू कर सब जल रहा,

हार रहा है जग से मानव,

अपनी आनी बानी में,

करने दो विश्राम जरा ।

खुद से बोया बीज बबूल का,

तो कहां मिलेगा आम,

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स्वयम् को बचाने हेतु,

अब करना होगा संग्राम,

पुनः न करेंगे ऐसी गलती,

ले रहे संकल्प मन में,

करने दो विश्राम जरा ।

जब एक धरा पर एक ही सूरज,

दे रहा सबको प्रकाश,

तो हे मानव ! क्यों करते हो तुम,

प्रकृति विरुद्ध दुष्प्रयास ?

मिल रहा उसी का परिणाम,

हर एक जीवन में,

करने दो विश्राम जरा ।

रित गई प्रकृति की ममता की आंचल,

तेरे छीना—झपटी से,

लहु—लुहान है उसकी छाती,

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तेरे दुष्ट प्रवृति से,

सुधर जाओ हे कपटी मानव !

उसकी इस चेतावनी से,

करने दो विश्राम जरा,

अपने शीतल छांव में ।

अंशु झा, काठमांडू।

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