प्रधानमंत्री ओली भारत के वार्ता-प्रस्ताव को अनदेखा कर गए
शनिवार को, नेपाली संसद के निचले सदन ने “नेपाल के नए नक्शे” को अपडेट करते हुए संविधान संशोधन बिल पारित किया है। राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त करने से पहले यह बिल अब नेपाल के ऊपरी सदन में जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार, यह एक मात्र औपचारिकता है। नेपाल में, एक सवाल जो बुद्धिजीवियों, जनता, राजनेताओं के बीच उठाया जाता रहा है, वह यह है कि भारत कूटनीतिक बातचीत पर चुप क्यों है ? नेपाल की राजनीति को अगर पिछले परिदृश्य में देखें तो यह समझ में आता है कि प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली द्वारा नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर अपने पद पर बने रहने के लिए संवैधानिक संशोधन का इस्तेमाल किया गया है, जो मई की शुरुआत में अत्यधिक अस्थिर था, और उन पर प्रधानमंत्री का पद खाली करने का दवाब बनाया जा रहा था । इसी बीच ककालापानी और लिपुलेक की चर्चा शुरु हुई और माहेल बदल गया । इन सबके बीच ये जरुर सामने आता रहा कि भारत इस विषय पर चर्चा क्यों नहीं कर रहा जबकि वो चीन से सीमा विवाद पर वार्ता कर रहा है ।
विदेश मंत्री ज्ञवाली ने इस बात की चर्चा सदन में भी की । वास्तव में भारत ने वार्ता के लिए बैठने की पेशकश क्यों नहीं की है ? क्या वास्तव में इसने नेपाल के अनुरोध को ठुकरा दिया है किन्तु इसी बीच यह बात सामने आ रही है कि भारत ने विदेश सचिव स्तर के फोन कॉल की स्पष्ट पेशकश की थी; सीमा के मुद्दे पर चर्चा करने के लिए दो विदेश सचिवों के बीच एक वीडियो सम्मेलन और उसके बाद नेपाल के विदेश सचिव की भारत यात्रा। नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने पुष्टि की कि यह प्रस्ताव विदेश मंत्री ग्यावली और प्रधान मंत्री ओली के पास उपलब्ध था, संविधान संशोधन बिल के पेश होने से पहले ही यह प्रस्ताव किया गया था। विदेश मंत्री ग्यावली ने कहा कि सीमा मुद्दे पर बातचीत के लिए नेपाल के अनुरोधों को भारत ने स्वीकार कर लिया है। नेपाल के विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने पुष्टि की कि प्रधान मंत्री ओली भारत के प्रस्ताव को अनदेखा कर गए। क्योकि वो इस मौके को जाने नही देना चाहते थे जो उन्हें सत्ता में सुरक्षित कर रहा था । जबकि यह तय है कि संवैधानिक संशोधन को भारत द्वारा एक अपरिवर्तनीय कदम के रूप में देखा जा रहा है, जो भविष्य की किसी भी वार्ता के परिणाम को पूर्व निर्धारित करता है। हिंदुस्तान टाइम्स

