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प्रधानमंत्री ओली वार्ता के सबसे बड़ा बाधक, भारत ने वार्ता की पेशकश की थी : मुरली मनोहर तिवारी (सीपू)

 

मुरली मनोहर तिवारी (सीपू), २०७७ जेठ ३१ गते, शनिवार | नेपाल की संसद ने शनिवार (13 जून) को देश के राजनीतिक नक्शे को संशोधित करने से संबंधित महत्वपूर्ण विधेयक को पास कर दिया। निचले सदन से पारित होने के बाद अब विधेयक को नेशनल असेंबली में भेजा जाएगा, जहां उसे एक बार फिर इसी प्रक्रिया से होकर गुजरना होगा। नेशनल असेंबली से विधेयक के पारित होने के बाद इसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा, जिसके बाद इसे संविधान में शामिल किया जाएगा।

इसके साथ ही भारत से चल रहे सीमा विवाद को लेकर दोनों देशों के बीच उसने बातचीत की उम्मीद को लगभग खत्म कर दिया है। अब देखना होगा कि भारत का अगला कदम क्या होता है ? भारतीय विदेश मन्त्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने वक्तव्य जारी करते हुए कहा कि लिम्पियाधुरा, महाकाली और लिपुलेक क्षेत्र को नेपाल द्वारा अपना कहने के दावे ऐतिहासिक तथ्य और प्रमाण पर आधारित नहीं है । उन्होंने कहा कि सीमा विवाद को वार्ता द्वारा समस्या के समाधान खोजने की हमारी समझदारी का उल्लंघन किया गया है ।’

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गौरतलब है कि नेपाल को इस नए नक्शे को संविधान संशोधन करके पारित करवाने की जरूरत क्या थी ? इसके लिए कूटनीतिक प्रयास क्यों नहीं हुए ? भारत भी कूटनीतिक संवाद पर चुप क्यों है ? प्रधानमंत्री ओली को भारत से संविधान संशोधन नहीं करके वार्ता द्वारा समाधान करने की सलाह मिली थी, फिर भी संशोधन क्यों करना पड़ा ? पीएम ओली को बताया गया था, कि संविधान संशोधन बिल भारत के साथ राजनयिक संचार के द्वार को बंद कर देगा, फिर भी संशोधन क्यों करना पड़ा ?

संसद में सांसदों के सवालों के जवाब में, विदेश मंत्री प्रदीप कुमार ग्यावली ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था कि भारत चीन के साथ बातचीत कर रहा था, लेकिन वार्ता के लिए नेपाल के प्रस्ताव की अनदेखी कर रहा था। क्या वास्तव में भारत ने वार्ता के लिए बैठने का पेशकश नहीं किया ? क्या वास्तव में भारत ने नेपाल के अनुरोध को ठुकरा दिया जिसका दावा विदेश मंत्री प्रदीप कुमार ग्यावली कर रहे है ?

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काठमांडू में एक शीर्ष विदेश मंत्रालय के सूत्र ने बताया कि यह सही नहीं है, सूत्र ने कहा कि भारत ने विदेश सचिव स्तर के फोन कॉल की स्पष्ट पेशकश की थी, सीमा के मुद्दे पर चर्चा करने के लिए दो विदेश सचिवों के बीच एक वीडियो सम्मेलन और उसके बाद नेपाल के विदेश सचिव की भारत यात्रा कर सिमा विवाद सुलझाने का पेशकश किया था। नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने पुष्टि की, कि विदेश मंत्री ग्यावली और प्रधान मंत्री ओली को संविधान संशोधन बिल के पेश होने से पहले ही यह प्रस्ताव किया गया था।

विदेश मंत्री ग्यावली ने कहा भी था की सीमा मुद्दे पर बातचीत के लिए नेपाल के अनुरोधों को भारत ने स्वीकार कर लिया है। नेपाल के विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने पुष्टि की कि प्रधानमंत्री ओली भारत की पेशकश से निराश थे। उन कारणों के लिए जो सबसे अच्छी तरह से ज्ञात हैं, वह न तो रोकने के लिए तैयार थे और न ही संविधान संशोधन पर एक कदम पीछे ले जाने के लिए तैयार थे, वास्तव में वे खुद वार्ता के पक्ष में नहीं थे। बावजूद इसके की संविधान संशोधन को भारत द्वारा एक अपरिवर्तनीय कदम के रूप में देखा जाएगा, जो भविष्य की किसी भी वार्ता के परिणाम को पूर्व निर्धारित और बाधित करेगा।

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कुछ वार्ताकारों के अनुसार, प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली द्वारा नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर अपने पद पर बने रहने के लिए संवैधानिक संशोधन का इस्तेमाल किया गया, जो मई की शुरुआत में अत्यधिक अस्थिर था जब उन पर प्रधानमंत्री का पद खाली करने का असहनीय दबाव था। अपनी निजी बैठकों में, प्रधान मंत्री ओली ने कथित तौर पर अवगत कराया कि वे भारत और नेपाल के बीच, लोगों के बीच, संबंधों पर पड़ने वाले प्रभाव के बावजूद संशोधन को आगे बढ़ाएंगे। इसी कारण पीएम ओली ने कूटनीतिक संवाद की उस पेशकश को नजरअंदाज कर दिया और संविधान में संशोधन के साथ आगे बढ़ गए।श्रोत- हिंदुस्तान टाइम्स

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