Wed. Aug 5th, 2020

मधेश सही राजनीतिक नेतृत्व की प्रतीक्षा में : प्रा.डॉ. महेन्द्र नारायण मिश्र

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प्रा.डॉ. महेन्द्र नारायण मिश्र
प्रा.डॉ. महेन्द्र नारायण मिश्र जन–प्रशासन एवं व्यवस्थापनविद्

प्रधानमन्त्री ओली जी मेरे विद्यार्थी

महोत्तरी जिला स्थित पिपरा गांव का मिश्र परिवार एक समृद्ध और प्रसिद्ध परिवार है । एक समय ऐसा भी रहा कि सिर्फ जिला के भीतर ही नहीं, पूरे देश (राजनीतिक वृत्त) में मिश्र परिवार के बारे में चर्चा होती थी । उसी परिवार के एक सदस्य हैं– प्रा.डॉ. महेन्द्र नारायण मिश्र । आप जनप्रशासन विषय में गिनेचुने प्राध्यापक एवं विज्ञों में से एक हैं । आप के द्वारा शिक्षित–दीक्षित हजारों विद्यार्थी आज देश के विभिन्न क्षेत्रों में उच्च पद पर कार्यरत हैं । आप का जन्म सन् १९३८ दिसम्बर २० को महोत्तरी जिला स्थित पिपरा गांवपालिका में हुआ है । आप के पिता जी का नाम सत्यनारायण मिश्र और माता जी का नाम सावित्री देवी है । जनप्रशासनविद् एवं व्यवस्थापनविद् के रूप में परिचित आप राजनीतिक विषयवस्तु के भी जानकार हैं । प्राध्यापन के अलावा प्रशासन पुनर्संरचना के लिए भी आपका विशेष योगदान है । प्रस्तुत है– हिमालिनी ‘जीवन–सन्दर्भ’ कॉलम में प्रा.डॉ. महेन्द्रनारायण मिश्र जी की जीवनी–

पारिवारिक पृष्७भूमि

मध्यम वर्गीय परिवार में मेरा जन्म हुआ । शुरू में मेरे पूर्वज ठेकेदारी करते थे । राणा शासन आने से पहले की बात है,उस समय तराई में जो जितना जमीन जोत सकता था, वह सब उसी को मिलता था । जमीन की जोत के अनुुसार ‘पोत’ अर्थात् ‘कर’ देना पड़ता था । उस समय कर के रूप में नगद नहीं, अन्न दिया जाता था । उसी नियम के अनुसार मेरे पूर्वजों ने खेतीपाती की, जिससे जीवन गुजारा हो जाता था । बाद में राणा शासन आया । तत्कालीन राणा शासकों से हमारे पूर्वजों ने कहा कि कम से ५ सालों के लिए जमीन की ठेकेदारी देनी होगी, तब भी हम लोग ‘कर’ दे पाएंगे । उस समय महोत्तरी और धनुषा एक ही जिला था । पूर्व में कमला नदी से लेकर पश्चिम में बागमती नदी तक की जिम्मेदारी राणाओं ने हमारे पूर्वज कोशली मिश्रजी को दिया था । जीवन गुजारा के लिए पिता जी भी खेती–पाती ही करते थे । जमीन थीं, अन्नपात भी था । लेकिन नगद (पैसा) नहीं था, जिसका अभाव हम लोगों को हरदम रहता था । धीरे–धीरे जमीनदारी खतम हो रही थी । भाई लोगों के साथ बटवारा होने के बाद आज मेरे पास सिर्फ ढाई बीघा जमीन है ।

प्रारम्भिक शिक्षा गांव से ही
पिता जी के दो सुपुत्र में से मैं बड़ा भाई हूँ । आज पिपरा में जो पंचायती भवन है, वहीं हमारे चचेरे भाई जमुना प्रसाद मिश्रजी ने एक प्राथमिक स्कूल निर्माण किया था । स्कूल निर्माण के खातिर जब भाई बड़ा हाकिम के पास स्वीकृति के लिए पहुँचे और कहा– ‘मैं अपने गांव में एक ‘एम.ई.’ (मीडिल ईंग्लिस) स्कूल खोलना चाहता हूँ । बड़ा हाकिम ने ठान लिया कि ‘एम.ए.’ का स्कूल खुल रहा है ।

उसके बाद बड़ाहाकिम ने कहा– ‘एम.ए. का क्लास काठमांडू में भी नहीं है, आप लोग गांव में इसतरह स्कूल नहीं खोल सकते ।’ उसके बाद निर्माणाधीन स्कूल भवन में आग लगा दी गई । बाद में वास्तविकता जानने पर स्कूल खुल गया । मेरी प्राथमिक पढ़ाई वहीं से शुरू हुई थी । स्कूल का नाम था– अयोध्या मीडिल स्कूल । आज का ‘रामनारायण अयोध्या माध्यमिक विद्यालय’ वही स्कूल है ।

मैंने कक्षा ७ तक की पढ़ाई उसी स्कूल से की । उसके बाद पिता जी ने मुझे और मेरे चचेरे भाई बज्रनन्दन मिश्र को मधुबनी स्थित ‘वाट्सन एज’ स्कूल में भर्ती कर दिया । नेपाल में मैंने ७ कक्षा तक ही पढ़ा था, लेकिन उधर मुझे कक्षा ८ को छोड़कर कक्षा ९ में भर्ती किया गया । मेरी अंग्रेजी अच्छी होने के कारण यह सब हो रहा था । यहीं से मैंने म्याट्रिकुलेसन किया ।

म्याट्रिकुलेशन के बाद मधुबनी में ही स्थित आरके कॉलेज से मैंने आईए पास किया । आगे की पढ़ाई के लिए मुझे मुजफ्फरपुर जाना पड़ा । वहां जाकर बिहार युनिवर्सिटी मातहत रहे लंगटसिंह कॉलेज में भर्ती हो गया । मैं अंग्रेजी में ऑनर्स करना चाहता था । लेकिन कुछ मित्रों ने सलाह दी कि आप जिस विषय में अच्छा कर सकते हैं, उसी में ऑनर्स करें, नहीं तो जिन्दगी भर नहीं कर पाएंगे । उन लोगों की सलाह के अनुसार ही मैंने राजनीति शास्त्र में सन् १९५९ में बीए ऑनर्स किया । उस समय ‘जन–प्रशासन’ नाम का अलग विषय नहीं था । राजनीति–शास्त्र के भीतर ही जनप्रशासन संबंधी एक विषय पढ़ना पड़ता था ।

भद्रकाली मिश्र और रामनारायण मिश्र मेरे पारिवारिक सदस्य हैं । वे लोग राजनीति में सक्रिय थे । बड़े भाई रामनारायण मिश्र तत्कालीन वीपी कोइराला के मन्त्रिमण्डल में थे । उनके ही सहयोग से मुझे एम.ए पढ़ने के लिए मासिक १ सौ ५० रूपया सरकारी स्कॉलरशिप मिला । उस वक्त रामनारायण जी ने कहा था कि आप एम.ए पास कर के आइए, मैं आप को अमेरिका भेज देता हूं । लेकिन बीच में ही (सन् १९६० दिसम्बर १५) राजा महेन्द्र ने सत्ता अपने हाथ में लिया । सभी नेता जेल चले गए । रामनारायण भी जेल में ही थे । ऐसी अवस्था में मैंने सोचा की अब मैं पढ़ाई छोड़ देता हूं । फिर बाद में विभिन्न लोगों की सलाह के अनुसार मैंने पढ़ाई को निरन्तरता दी और एम.ए पास होकर नेपाल वापस आ गया ।

प्राध्यापन क्षेत्र में प्रवेश
जब मैं बिहार युनिभर्सिटी से एम.ए पास कर के आया, तो पैसे का अभाव महसूस हो रहा था । आज जो धनुषा जिला है, उसके पूर्वी दिशा में एक धबौली गांव है । वहां तीन स्कूल को मिलाकार एक नया हाईस्कूल निर्माण हुआ था । उसका हेडमास्टर मुझे ही बनाया गया, यही से मैं शिक्षण पेशा में आबद्ध हो गया । उस समय मेरी मासिक पारिश्रमिक १८० रूपया थी, शिक्षा प्रेमी गांव के लोगों से मिलकर यह रकम उठाया जाता था ।

चाचा मथुरा प्रसाद मिश्र जी के घर के सामने एक पान की दुकान थी । कभी–कभार मैं वहां जाता था । एक दिन वही पान की दुकान में गांव के ही ईश्वरनारायण पाण्डे मिल गए । उनके हाथ में गोरखापत्र था । जहां झापा स्थित भद्रपुर कॉलेज में शिक्षक–आवश्यकता संबंधी सूचना थी । सूचना को फॉलो करते हुए भारतीय भूमि होकर मैं भद्रपुर पहुँच गया । वहां जाकर मैंने राजनीति–शास्त्र के शिक्षक के रूप में काम करना शुरू किया । यह वि.सं. वि.सं. २०२३ साल फाुगन १ गते की बात है । मेरे साथ–साथ उस वक्त रामस्वार्थ झा, मोहनराज शर्मा, घनश्याम खनाल, लीला शर्मा भी नियुक्त किए गए थे । वि.सं. २०३० साल तक (७ वर्ष) मैं वहां रहा । उस वक्त मेरी मासिक पारिश्रमिक ६ सौ ७५ रूपए थी ।

मैं भद्रपुर कॉलेज में ही था । उसी समय चितवन स्थित रामपुर में एक सम्मेलन आयोजन हुआ । उस सम्मेलन में त्रिभुवन विश्वविद्यालय से आबद्ध राजनीतिशास्त्र और समाजशास्त्र के शिक्षक एवं प्राध्यापक सहभागी थे, जहां डॉ. हर्कबहादुर गुरुङ भी थे । वहीं मेरी मुलाकात डॉ. प्रचण्ड प्रधान से हुई । उन्होंने ही मुझे काठमांडू आने के लिए जोर दिया । उनका कहना था कि काठमांडू में जनप्रशासन विषय में बैचलर लेबल का क्लास संचालन होने जा रहा है, अब आप को भद्रपुर में कोई काम नहीं है, आप की आवश्यकता काठमांडू में है । उस समय जन–प्रशासन संबंधी विषय की पढ़ाई शंकरदेव कैंपस में होती थी । उनके सुझाव अनुसार मैं काठमांडू आया । मेरे आने के बाद जनप्रशासन अध्ययन के लिए एक अलग ही घर किराए पर लिया गया और जन–प्रशासन कैंपस शुरू हो गया । उसमें मुझे प्रथम कैंपस प्रमुख के रूप में नियुक्ति मिली ।

जबरन जनकपुर ६«ान्सफर
पब्लिक एडमिनिट्रेसन (जन–प्रशासन) संबंधी विषय पढ़ने के लिए मुझे फिलिपिन्स जाने का अवसर मिला । डॉ. प्रचण्ड प्रधान त्रिवि में डीन थे, उन्होंने ही मुझे स्कॉलरशिप दिलाया था । सन् १९७४ की नवम्बर में मैं फिलिपिन्स चला गया और जन प्रशासन में मास्टर डिग्री (एमपीए) कर नेपाल वापस हो गया । फिलिपिन्स से वापस होने के बाद मेरी पहली नियुक्ति पुनः जन–प्रशासन कैंपस में हो गई ।
उसी समय पूरे देश में विद्यार्थियों का आन्दोलन हुआ था । पाकिस्तान में ‘भुट्टो हटाओ’ कहकर एक राजनीतिक तूफान आया था, उस का प्रभाव नेपाल में भी पड़ रहा था । विद्यार्थी  प्रजातन्त्र मांगते हुए सड़क आन्दोलन में उतर आए थे । दो साल से मैं जनप्रशासन कैंपस डिल्ली बाजार में कार्यरत था । उप–कुलपति थे– जगतमोहन अधिकारी । उन्होंने एक दिन मिलने के लिए बुलाया और कहा– ‘आप को रारा बहुमुखी कैंपस जनकपुरधाम में कैंपस प्रमुख होकर जाना पड़ेगा ।’ लेकिन मैंने शुरू में उनका प्रस्ताव अस्वीकार किया । क्योंकि मैं अपने ही गांव के नजदीक नहीं जाना चाहता था । मुझे लगता था कि सभी अपने ही आदमी होंगे, जिसके चलते प्रशासन चलाने में मुश्किल होगी ।  लेकिन अधिकारी जी ने धमकीपूर्ण भाषा में कहा कि अगर मैं जनकपुर नहीं जाऊंगा तो मुझे धनकुटा भेज दिया जाएगा । मैं अपनी जिद पर ज्यादा दिन नहीं टिक पाया । मुझे जनकपुरधाम जाना पड़ा ।

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उस वक्त विद्यार्थी आन्दोलन जारी था । जब मैं कैंपस प्रमुख के कार्यकक्ष में पहुँचा तो मैंने देखा कि वहां एक खुकुरी पड़ी हुई है, जिसमें खून भी लगा है । ऐसी स्थिति में मैं वहां पहुँचा था । जैसे–तैसे परिस्थिति को सम्हाल लिया । रारा बहुमुखी कैंपस में मैंने ४ वर्षीय अपना कार्यकाल पूरा किया । उसके बाद मैं पुनः काठमांडू आना चाहता था, प्रयास भी जारी था ।
उसी वक्त रामचन्द्रबहादुर सिंह भाइस–चान्सलर हो गए । उन्होंने ही मुझे काठमांडू आने के लिए कहा । मैं पुनः जन–प्रशासन कैंपस काठमांडू आ गया । लेकिन कैंपस प्रमुख नहीं बन पाया । मेरे जनकपुर जाने के बाद चुडाराज उप्रेती जी कैंपस प्रमुख बन गए थे । रामचन्द्र बहादुर सिंह दरबार से करीब थे । लगभग एक साल के बाद एक दिन उन्होंने मुझे बुलाया और कहा– ‘आप को जनकपुर से बुलाकर मैंने बहुत बड़ी गलती की, आप को पुनः कैंपस–चीफ बनकर जनकपुर ही जाना होगा ।’ मैंने पुनः वहां जाने से इन्कार किया । अन्ततः उन्होंने फिर कहा कि मुझे जनप्रशासन (काठमांडू) में ही कैंपस प्रमुख बनना होगा । लेकिन उप्रेती जी कैंपस प्रमुख थे । जिसके चलते इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए मुझे मुश्किल हो रहा था । अन्ततः उन्होंने फिर कहा– ‘स्कॉलरशिप देकर डिग्री करने के लिए उप्रेती जी को दिल्ली भेज रहा हूं, उस जगह आप को ही रहना होगा ।’ तब जाकर इस प्रस्ताव को मैंने स्वीकार किया और पुनः मैं जन–प्रशासन कैंपस में प्रमुख बन गया ।

प्रधानमन्त्री ओली जी मेरे विद्यार्थी
हजार से अधिक मेरे विद्यार्थी आज उच्च पदों पर कार्यरत हैं । मेरे प्राध्यापन पेशा की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है, जिसको देखकर मुझे गर्व महसूस होता है । आज देश के प्रधानमन्त्री केपी शर्मा ओली हैं । जिस वक्त मैं भद्रपुर कॉलेज में पढ़ाता था, उस वक्त ओली जी कभी–कभार मेरे क्लास में आते थे । मुझे अच्छी तरह याद है कि आई.ए. के क्लास में मैंने उनको देखा है । कम्युनिष्ट नेता सीपी मैनाली और आरके मैनाली भी मेरे विद्यार्थी हैं । लेकिन उस वक्त इन तीनों की राजनीतिक पृष्ठभूमि के बारे में मुझे पता नहीं था । तीनों एकदम शान्त और अनुशासित विद्यार्थी थे । लेकिन कभी–कभार ही क्लास में आते थे । एक दिन मैंने प्रिन्सिपल रामेश्वर प्रसाद अधिकारी से पूछा– ‘सर, सीपी और आरके मैनाली को मैं क्लास में नहीं देख रहा हूँ ।’ उन्होंने मुझे इस विषय में चुप रहने के लिए कहा । बाद में पता चला कि वे लोग कम्युनिष्ट राजनीति से आबद्ध हैं और हिंसात्मक गतिविधि कर रहे हैं ।

कुछ ही साल पहले आर्मी हेडक्वाटर में एक सेमिनार आयोजित था । पूर्व प्रधानसेनापति रुक्मांगत कटुवाल ने कार्यक्रम का आयोजन किया था । मुझे भी आमन्त्रित  किया गया । मेरी सीट प्रथम पंक्ति में थी । कार्यक्रम में सीपी मैनाली भी आए । शिक्षक और विद्यार्थी का संबंध टूटने के वर्षों बाद प्रथम बार उनके साथ मेरी भेट हुई थी । उन्होंने पहचान लिया । सम–सामयिक राजनीति के अलावा उस समय की घटना के बारे में चर्चा हुई । अन्य विद्यार्थियों के साथ इसतरह भेट–वार्ता नहीं हुई है ।

आज मेरा ही विद्यार्थी देश के प्रधानमन्त्री हैं । उस समय मैं उनको एक असल विद्यार्थी के रूप में जानता था । मुझे लगता है कि नेपाल के प्रजातान्त्रिक इतिहास में सबसे शक्तिशाली प्रधानमन्त्री आज वही हैं । दो–तिहाई बहुमत से निर्मित सरकार को नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं । अगर वह चाहे तो नेपाल में बहुत कुछ परिवर्तन ला सकते हैं । आज की आवश्यकता भ्रष्टाचार और नीतिहीनता से ग्रसित प्रशासन और समाज को परिवर्तन करना है । हमारी आर्थिक दुरावस्था के पीछे भ्रष्टाचार ही प्रमुख कारण है ।

भ्रष्टाचार को खतम कर देश को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी प्रधानमन्त्री के कंधे पर है । लेकिन समाचारों में आ रहा है कि वह अधिनायकवादी शासन का अभ्यास करने लगे हैं । कभी–कभार तो मुझे भी ऐसी ही आशंका होती है । जिस वक्त मदन भण्डारी कम्युनिष्ट पार्टी में नेतृत्व प्रदान कर रहे थे, केपीजी उसी पार्टी में कार्यकर्ता थे । भण्डारी ने अपनी पार्टी के लिए एक राजनीतिक दर्शन बनाया– जनता का बहुदलीय जनवाद । जिसको हम लोग ‘जबज’ के रूप में जानते हैं । लेकिन आज सत्ता के अभ्यास को देखते हैं तो लगता है कि अब बीच का ‘ब’ हट गया है, ‘जनता की जनवाद’ का अभ्यास होने लगा है ।

वर्तमान संविधान के प्रति भी असंतुष्टियां काफी हैं । असंतुष्टि को संबोधन कर संविधान को सर्वस्वीकार्य बनाना चाहिए, लेकिन अनदेखा हो रहा है । मैं तो कहता हूं कि जिसतरह संविधान को जारी किया गया, उसकी प्रक्रिया ही गलत थी । जिसके चलते आज भी संविधान का विरोध हो रहा है । संविधान जारी करने के लिए अन्तरिम संविधान में जो प्रावधान है, अगर उसका पालन किया गया होता तो आज इस तरह का विरोध नहीं होता ।

नेपाल में आज तक जितना भी संविधान निर्माण हुआ है, उसका ‘सडेन डेथ’ हुआ है । देश की दीर्घकालीन हित सोचकर संविधान निर्माण नहीं हो पाया । विशेषतः आज संघीयता, राज्य पुनःसंरचना जैसे विषयों को लेकर यहां विरोधाभास दिखाई दे रहा है । संविधान का सबसे ज्यादा विरोध करनेवाले नेता मधेशवादी पार्टी के हैं । लेकिन विडम्बना तो यह है कि संघीयता का मूल मर्म उन लोगों को भी पता नहीं है । हां, मधेश के साथ कुछ अन्याय जरूर हुआ है । लेकिन हमारे यहां जो भौगोलिक बनावट और परिस्थितियां है, उसको देखकर राज्य पुनर्संरचना होनी चाहिए । सीमांकन और पहचान ही सब–कुछ नहीं है ।

हां, राजनीतिक रूप में यहां विद्वेष और भेदभाव है । हाल ही में नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (नेकपा) के अध्यक्ष एवं पूर्व प्रधानमन्त्री पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड ने रेशम चौधरी के संबंध में जो विचार व्यक्त किया, उसी घटना को उदाहरण के रूप में लेकर मैं कुछ कहना चाहता हूं । प्रचण्ड जी ने कहा है कि रेशम चौधरी निर्दोष हैं, वह जल्द ही जेल से छूटनेवाले हैं ।

वि.सं. २०७२ साल भाद्र ७ गते टीकापुर में जो घटना हुई, वह एक राजनीतिक घटना है । उसी प्रकृति के घटना में संलग्न कई लोग आज सत्ता में हैं, लेकिन जननिर्वाचित सांसद् चौधरी जेल में । दूसरी बात उस घटना में जो भी मारे गए, उन लोगों की शरीर में गोली लगी है । अध्ययन प्रतिवेदन कहता है कि आन्दोलन में शामिल थारु आन्दोलनकारी घरेलु हथियार लेकर आए थे । वे लोग घरेलु हथियार लेकर आए थे तो मरनेवालों के ऊपर गोली किसने चलायी ? इस तरह का विरोधाभास और विभेद जारी रहेगा तो विद्रोह निश्चित है ।

सही राजनीतिक नेतृत्व की आवश्यकता

वैसे तो पूरा देश सही राजनीतिक नेतृत्व की तलाश में है । यहां तराई–मधेश के नाम से भी राजनीति होती है । मेरा मूल घर भी तराई–मधेश में ही है । इसीलिए कहता हूं कि मधेशी जनता को आज तक सही राजनीतिक नेतृत्व प्राप्त नहीं हुआ है । हां, गजेन्द्रनारायण सिंह, महेन्द्र नारायण निधि जैसे कुछ नेता तो थे, लेकिन वे आज नहीं है । आज मधेश के नाम से राजनीति करनेवाले लोग पार्टी को ‘ पब्लिक लिमिटेड कंपनी’ के रूप में चलाते हैं । उदाहरण के लिए राजपा को ही ले सकते हैं, जिस में ६–६ लोग पार्टी अध्यक्ष हैं । पब्लिक लिमिटेड कंपनी में भी ऐसा नहीं होता । अगर राजनीति करनेवाले हर व्यक्ति का उद्देश्य मन्त्री बनना होता है तो वहां देश और जनता की आवश्यकता गौण बन जाती है ।

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वर्तमान सरकार एक नारा लेकर आई है– समृद्ध नेपाल, सुखी नेपाली । नारा तो अच्छा है । लेकिन क्या यह संभव है ? मुझे तो लगता है कि जैसे भी हो, मन्त्री पद को प्रमुख उद्देश्य बनाकर राजनीति करनेवालों से यह सम्भव नहीं है, वह किसी भी पार्टी में क्यों ना हो, पहाड़ में हो या तराई में । विशेषतः मधेश में सही नेतृत्व का अभाव है ।

विभेद की अनुभूति
आज बात होती है कि राजाओं का शासनकाल हो या प्रजातान्त्रिक व्यवस्था, सभी शासनकाल में मधेशियों के ऊपर विभेद किया गया है । लेकिन मुझे लगता है कि पंचायती व्यवस्था से अधिक विभेद उसके बाद हुआ है । जिसका शिकार मैं भी बन गया । वि.सं. २०४६ साल के जनआन्दोलन के बाद मुझे कैंपस प्रमुख से हटा दिया गया । मैं एक ‘मधेशी’ था । मधेशी होकर काठमांडू में कैंपस प्रमुख बन कर रहना वहां के लोगों को नहीं भा रहा था । इसीलिए मेरे ऊपर ‘राजावादी’ होने का आरोप लग गया । वास्तव में मैं राजावादी नहीं था, प्रजातन्त्र के लिए ही वकालत करता था । हां, मैं आज के लोगों के तरह गणतन्त्रवादी होकर वकालात नहीं करता था । लेकिन मेरा दृष्टिकोण था कि अगर राजा प्रजातन्त्र देते हैं तो उनको बने रहने से कोई भी दिक्कत नहीं है । अर्थात् प्रजातन्त्र मेरी शर्त थी । मेरी इस बात को समझनेवाले कोई भी नहीं हुए । और खुद को प्रजातन्त्रवादी कहलानेवालों ने ही मुझे राजावादी होने का आरोप लगाकर कैंपस प्रमुख से हटा दिया ।

उसी समय त्रिभुवन विश्वविद्यालय के उप–कुलपति बने थे– बिसी(बासुदेवचन्द्र) मल्ल । उनके व्यक्तित्व का मूल्यांकन उच्च रूप में होता था । लेकिन मेरे विषय में उनको एक गलत फहमी थी । उनको लगता था कि उन्होंने मुझे पढ़ाया है । मेरी सारी पढ़ाई भारत में हुई थी । त्रिवि में मैं पढ़ा ही नहीं है । तब भी कई बार उन्होंने मुझसे कहा कि उन्होंने मुझे त्रिवि में पढ़ाया है । उनकी यह गलत फहमी को मैंने हटाना नहीं चाहा ।
कुछ दोस्तों ने सल्लाह दिया कि आप को कैंपस प्रमुख से हटाया गया है, आप एक बार मल्ल जी से मिलेंगे तो ठीक रहेगा । प्रेमराज पन्त जी ने मुझे विशेष जोर देकर ऐसी सलाह दी थी । उनकी सलाह के अनुसार मैं मल्ल जी से मिलने के लिए गया और पूछा– ‘अगर आप कहते तो मैं खुद हट जाता, क्यों मेरे ऊपर राजावादी होने का आरोप लगाना पड़ा ?’ उनकी ओर से तत्काल सकारात्मक जबाव नहीं मिला । लेकिन बाद में मैं विभागीय प्रमुख भी बन गया, जो कैंपस प्रमुख से ऊपर का पद था । इसी तरह पब्लिक एडमिनिट्रेशन एसोसिएसन ऑफ नेपाल (पान) का अध्यक्ष भी मैं बन गया । पान में मैंने दो कार्यकाल नेतृत्व प्रदान किया ।

बालुवाटार में एनसीएचई नामक एक कॉलेज था । त्रिभुवन विश्वविद्यालय से रिटार्यर्ड होने के बाद उस कॉलेज में भी प्रशासनिक विज्ञ के रूप में रहा हूँ । ‘त्रिभुवन विश्वविद्यालय पुनरावेदन आयोग’ में रह कर भी काम किया ।

राजा महेन्द्र की तास या हमारी क्षमता !
पीएचडी करने के लिए जो मौका मिला, उस में हम लोग तीन आदमी थे । एक खुद मैं, दूसरे थे– डॉ. कृष्णचन्द्र मिश्र और तीसरे व्यक्ति थे– डॉ. वीरेन्द्र मिश्र । उस समय इस बात को लेकर काठमांडू में तहलका मच गया, क्योंकि हम लोग एक ही परिवार के थे । बहुत लोग कह रहे थे कि एक ही परिवार के सदस्यों को इसतरह स्कॉलरशिप कैसे मिल सकता है ? लोगों का कहना था कि राजा महेन्द्र का यह एक ‘तास’ है, पंचायती व्यवस्था को समर्थक बढ़ाने के लिए । कभी–कभार मुझे भी ऐसा ही लगता है । लेकिन हमारी क्षमता भी थी, तीनों भाई पढ़ाई में अब्बल थे, स्कॉलरशिप के लिए योग्य थे ।

पुतली सडक में भद्रकाली मिश्र जी का घर था, हम लोग उसी घर में रहते थे । पीएचडी के लिए शुरू में मैं इलाहाबाद गय ा। लेकिन वहां कुछ दिक्कत महसूस हुई । मेरे गाईड एमजी गुप्ता के साथ मेरा झगड़ा हो गया । मैं बिना पीएचडी ही वापस हो गया । बाद में फिर त्रिभुवन विश्वविद्यालय की ओर से मुझे स्कॉलरशिप मिला । इसका सदुपयोग करते हुए मैं चण्डीगढ़ स्थित पंजाब युनिवर्सिटी जाकर पीएचडी किया । नेपाल में स्थानीय लिडरशीप विकास संबंधी टॉपिक्स को लेकर मैंने पीएचडी किया था ।

एक सज्जन व्यक्ति राजा वीरेन्द्र
जिस वक्त मैं भद्रपुर कॉलेज में था, उस समय युवराज थे– वीरेन्द्र वीरविक्रम शाह । एक बार खबर मिली कि वह इलाम भ्रमण के लिए आए हैं और भद्रपुर कॉलेज भी आ रहे हैं । उनके स्वागत के लिए हम लोग पंक्तिबद्ध हो कर खड़े हो गए थे । युवराज दीपेन्द्र नाम पूछते हुए आगे चल रहे थे, जो मेरे साथ भी हुआ । जब मैंने अपना नाम बताया तो उन्होंने मेरे घर के बारे में भी पूछा । स्थायी घर महोत्तरी बताने पर उन्होंने पूछा– ‘महोत्तरीबासी तो ‘काले’ होते हैं, लेकिन आप कैसे ‘गोरे’ हैं ?’ कोई नियतबस उन्होंने ऐसा नहीं कहा था, सिर्फ उनकी जिज्ञासा और मानसिकता थी । पहाड़ में रहनेवालों की यही मानसिकता आज भी है कि तराई में रहनेवाले हर व्यक्ति ‘काला’ होता है ।
वि.सं. २०२८ साल में राजा महेन्द्र के देहावासन होने के बाद युवराज वीरेन्द्र राजा हो गए, वह बहुत ही सज्जन व्यक्ति थे । वैसे तो उनके साथ मेरी भेट बहुत कम समय के लिए हुई है । राजा के जन्मदिन पर राजदरबार में विशेष कार्यक्रम आयोजन होता था । उसमें विभिन्न क्षेत्रों से बड़े–बड़े लोगों को बुलाया जाता था । बुलाहट होने पर मैं भी कभी–कभार वहां पहुँच गया हूँ । इसी दौरान भेटघाट हो जाती थी । जिस वक्त मैं राजदरबार में पहुँचता था, तत्कालीन युवराज दीपेन्द्र और उनके छोटे भाई निराजन को भी देखने को मिलता था । मेरे खयाल से दीपेन्द्र १०–११ साल के थे, वह स्वतन्त्रपूर्वक खेल रहे थे, लेकिन निराजन अपने पिता के आगे–पीछे कर रहे थे । जिस वातावरण को मैं वहां देखता था, उसे देखकर लगता था कि हमारे राज–परिवार बहुत ही साधारण है, आम आदमी की तरह जीते है । लेकिन वि.सं. २०५८ साल जेष्ठ १९ गते राजदरबार के भीतर एक भयानक हादसा हो गया । जो मेरे जीवन के लिए सबसे दुःखद और आश्चर्यचकित घटना है । राजा वीरेन्द्र के सभी पारिवारिक सदस्य मारे गए । इसतरह क्यों शाह वंश का नाश किया गया और शाह वंश को नाश करनेवाले कौन थे ? यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है ।

‘बृहत्तर जनकपुर विकास’ मेरा ही कन्सेप्६

मैं त्रिभुवन विश्वविद्यालय में सह–प्राध्यापक था । वि.सं. २०४८ साल में संपन्न चुनाव में धनुषा–महोत्तरी क्षेत्र से निर्वाचित होनेवाले सभी नेता नेपाली कांग्रेस से आबंद्ध थे । कांग्रेस नेता महेन्द्रनारायण निधि के नेतृत्व में जनकपुरधाम के विकास संबंधी विषयों को लेकर एक दिन मीटिङ आयोजन किया गया । उस मीटिङ में मुझेनहीं बुलाया गया था । लेकिन सांसद् हरिशंकर मिश्र मेरे भतीजे थे । उनसे मैंने पूछा– ‘हम हू चलू !’ उन्होंने कहा– ‘आऊ !’ इसतरह मैं जबरजस्त उस मीटिङ में घुस गया ।

विचार–विमर्श चल रहा था । जनकपुर का विकास कैसे कर सकते हैं ? इस विषय को लेकर सांसद् लोग अपनी–अपनी धारणा व्यक्त कर रहे थे । इसी क्रम में मैंने कहा कि सिर्फ जनकपुर का विकास करने से कुछ नहीं होगा, ‘बृहत्तर जनकपुर का विकास’ नाम देकर हम लोगों को आगे आना चाहिए । मेरे कहने का मतलब तथा कि सिर्फ जानकी मन्दिर आसपास का विकास नहीं, उसको केन्द्रबिन्दु में रखकर कम से कम ५ कोश आसपास क्षेत्र को समेटकर विकास संबंधी परियोजना तैयार करना होगा । उसका नाम भी मैंने ही रख दिया– बृहत्तर जनकपुर क्षेत्र । मेरे सुझाव के अनुसार ही ‘बृहत्तर जनकपुर विकास समिति’ बनी । ऐन निर्माण होने के बाद उसको ‘बृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद्’ नामकरण किया गया । वि.सं. २०५३ साल में मुझे ही परिषद् का कार्यकारी निर्देशक बना दिया गया ।

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कार्यकारी निर्देशक बनने के लिए तत्कालीन सामान्य प्रशासन मन्त्री महेश्वरप्रसाद सिंह जी ने प्रस्ताव किया था । मैंने कहा कि मैं मन्त्री के निर्णय से नहीं जाऊंगा, अगर मुझे परिषद् में कार्यकारी निर्देशक बनना है तो मन्त्रिपरिषद् से निर्णय होना चाहिए । बाद में मन्त्रिपरिषद् से निर्णय किया गया और ४ वर्षीय कार्यकाल के लिए मैं परिषद् में चला गया । लेकिन परिस्थिति के कारण सवा ५ साल तक रहना पड़ा । टीचिङ–प्रोफेशन में रहते वक्त ही मैं परिषद् में कार्यकारी निर्देशक बन गया था । परिषद् से वापस होने के बाद मैं प्राध्यापक बन गया ।

लोकसेवा में मेरी भूमिका
यह भी वि.सं. २०४६ साल के जनआन्दोलन सफल होने के बाद की घटना है । लोकसेवा आयोग का पाठ्यक्रम परिवर्तन के लिए बहस होने लगी । उस समय लोकसेवा आयोग में संस्कृत पढ़नेवालों का वर्चस्व था, यहां आचार्य और शास्त्री ही थे । साइन्स एवं मेडिकल संबंधी विषयों में ग्रेजुएट करनेवालों को यहां अवसर नहीं मिलता था । इसी पृष्ठभूमि में पाठ्यक्रय परिवर्तन के लिए मैं भी एक आमन्त्रित सदस्य के रूप में आयोग में रहा, जो मेरे लिए एक सुनहरा अवसर है ।

वि.सं. २०१७ साल के आसपास महोत्तरी जिला के बड़ाहाकिम थे– बद्रीविक्रम थापा । बड़ाहाकिम को लोग राजा के प्रतिनिधि के रूप में जानते हैं । लेकिन थापा जी आन्तरिक रूप से प्रजातन्त्रवादी थे, उनकी मान्यता थी कि प्रजातन्त्र से ही देश को आगे बढ़ाया जा सकता है । एक दिन थापा जी ने मुझसे पूछा कि आप पाठ्यक्रम परिवर्तन कैसे करना चाहते हैं ? मैंने जबाव दिया– ‘नेपाल को विश्व जगत में आगे बढ़ाना है तो नये–नये कर्मचारी की आवश्यकता है, जो आधुनिकता से परिचित हो । क्योंकि उस समय विभिन्न देशों में राजदूतावास खुल रहा है, उसके लिए अंग्रेजी भाषा में दक्ष जनशक्ति की आवश्यकता है । विज्ञान तथा प्रविधि संबंधी जानकार कर्मचारी भी आवश्यक हैं, सिर्फ संस्कृत से अब काम चलनेवाला नहीं है ।’ इसी मानसिकता के अनुसार मैंने लोकसेवा आयोग में अपनी भूमिका का निर्वाह किया ।

एक ही सरकारी पद
मैं त्रिभुवन विश्वविद्यालय का कर्मचारी हूं । विश्वविद्यालय के कर्मचारी रहनेवाले कई लोग वहां से रिटायर्ड होने के बाद अन्य सरकारी पद धारण करते हैं । मुझे एक ही पद मिला, जो महत्वपूर्ण था, लेकिन मेरी कार्ययोजना लागू नहीं हो पायी ।
वि.सं. २०६४ साल की बात है । प्रथम संविधानसभा चुनाव सम्पन्न होने के बाद पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड प्रधानमन्त्री बन गए । पम्फा भुसाल सामान्य प्रशासन मन्त्री थीं । दशहरा का समय था । मैं अपने ही गांव पिपरा में था । सचिव दीपेन्द्रविक्रम थापा ने मुझे फोन किया । फोन में उन्होंने कहा– ‘कुछ देर के बाद आप को सामान्य प्रशासन मन्त्री भुसाल जी का फोन आनेवाला है और एक पद का ऑफर कर रहे हैं । प्लीज इन्कार मत कीजिएगा ।’ इतना कहकर उन्होंने फोन रख दिया । बाद में मन्त्री जी का फोन आया । मैंने एक घंटा समय मांग कर निर्णय दिया कि मैं आप के द्वारा ऑफर किए गए पद को स्वीकार करता हूं ।

देश को संघीय संरचना में ले जाना था, नया प्रशासनिक ईकाई निर्माण करना था । इसीलिए नयी सरकार बनते ही ‘प्रशासन पुनर्संरचना आयोग’ बनाने की बात हुई । उसी के लिए मुझे मन्त्री जी का फोन आया था । आयोग के अध्यक्ष मन्त्री स्वयम् होते थे और मुझे उपाध्यक्ष बनाया गया । विषय–विज्ञ होने के नाते मुझे यह पद मिला था । मेरा कार्यकाल दो साल के लिए था । लेकिन बीच में ही प्रचण्ड जी के नेतृत्व में निर्मित सरकार गिर गयी । उसके बाद रवीन्द्र श्रेष्ठ जी सामान्य प्रशासन मन्त्री बन कर आए । मुझ पर आरोप लगाया गया कि यह तो माओवादी पार्टी के व्यक्ति हैं । इसी आरोप में मुझे हटाया गया । मुझे राजावादी होने का आरोप लगा, कांग्रेस होने का आरोप भी लगा और माओवादी होने का भी । लेकिन मैं तो एक ही हूँ, प्रजातान्त्रिक विचार से प्रेरित हूँ । लगता है कि राजनीति ऐसी घिनौना खेल है, अगर किसी को गिराना है तो उसको कोई भी ‘वादी’ होने का आरोप लग सकता है ।

तब भी मैंने अपनी विज्ञता के अनुसार आयोग में रहकर काम किया । मुझे लगता है कि प्रशासन पुनर्संरचना के लिए मैंने जो भी काम किया, उसतरह सूक्ष्म अध्ययन के साथ अभी तक किसी ने भी नहीं किया होगा । लेकिन मैं जो प्रतिवेदन तैयार कर रहा था, उसका कार्यान्वयन नहीं हो पाया । सरकार परिवर्तन होने के बाद पदाधिकारी भी परिवर्तन हो गए, उसके बाद दूसरा ही प्रतिवेदन बन गया ।

शादी की चर्चा
मैं १८ साल का था, आईए में पढ़ रहा था । मुजफ्फरपुर (भारत) स्थित एक राजनीतिक घराना में मेरी शादी हो गई । मेरी पत्नी का नाम मनोरमा है । वह उस समय के एमपी दिग्विजय नारायण सिंह की भतीजी थी । शादी से पूर्व मुझे पूछा गया था– ‘अगर कमाओंगे तो पैसा किस को दोगे ?’ शादी से पहले इस तरह का प्रश्न उस समय सामान्य था । मैंने जबाव में कहा था कि मैं पत्नी को दूंगा । आज की तुलना में उस समय कुछ ज्यादा ही ‘तिलक’ अर्थात् दहेज–प्रथा से समाज आक्रान्त था । तिलक लेना–देना आम बात थी । बावजूद इसके हमारे परिवार से दहेज की मांग नहीं की थी किन्तु मरे ससुरालवालों ने शादी धूमधाम से की थी जिसकी काफी चर्चा भी हुई थी । बचपन सुखद रहा । सन् १९६४ में जब मेरे पिता जी का देहान्त हो गया, सारी जिम्मेदारी मेरे सर पर आ गयी । उसके बाद ही जीवन की वास्तविकता अनुभूति होने लगी । उस समय मैं २४ साल का हो चुका था ।

आजकल
आज मैं पेन्सन होल्डर हूँ, उसी से मेरी जीविका चलती है । जीवन में प्राध्यापन के अलावा अन्य किसी भी क्षेत्र में मेरी खास रुचि नहीं रही । मेरे तीन बेटे और एक बेटी है । अभी मैं छोटे बेटे के साथ रहता हूँ । अपने गांव पिपरा (महोत्तरी) जाने का खूब मन करता है । लेकिन स्वास्थ्य संबंधी समस्या को लेकर पारिवारिक सदस्य मुझे वहां जाने के लिए मना करते हैं । इसमें मेरी ज्यादा शिकायत भी नहीं है । सामान्यतः मैं दिनभर घर में अकेले ही रहता हूँ । बेटा ऑफिस जाता है, पोता स्कूल । छुट्टी के दिन वे लोग घर में ही रहते हैं, इसीलिए दिन सहज ही कट जाता है । लेकिन अकेले रहते वक्त बहुत कठिनाई महसूस होती है ।
जीवन के प्रति खास शिकायत और पश्चाताप नहीं है । लेकिन अभी आकर स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहा हूं । आंख की रोशनी चली गई है, विस्मरण की समस्या भी दिखाई दे रही है । जब मेरी आंखें ठीक थी तो मैं किताब पढ़कर दिन काट लेता था । सिर्फ दिन काटने के लिए ही नहीं, ज्ञानार्जन के लिए भी मैंने बहुत सारी किताबें पढ़ी है । मेरे जीवन का धर्म ही किताब पढ़ना था । लेकिन आज तो किताब नहीं पढ़ सकता ।
जहाँ तक आध्यात्मिक दृष्टिकोण से धर्म की बात करते हैं तो मैं स्मरण करता हूं– परोपकारः पुण्याय पापाय परपीड़नम् । जिसका अर्थ है कि परोपकार करना पुण्य और दूसरे को पीड़ा देना पाप है । १८ पुराण का सार भी यही है । मैं इसी में विश्वास करता हूं, पूजापाठ नहीं करता । जब आंखें ठीक थी तो भागवत् गीता का पाठ करता था ।
मुझे लगता है कि मानव जीवन भगवान का दिया हुआ वरदान है । जब तक वह (भगवान) हमें यहां रखना चाहता है, तब तक ही हम लोग यहां रहेंगे । भगवान की अनुमति के बिना हम लोग एक क्षण भी नहीं जी सकते । इसीलिए अपने पास जो कुछ भी है, उसमें सन्तुष्ट होकर रहना चाहिए । असंतुष्टि ही सबसे बड़ा दुःख का कारण है ।

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