Sat. Aug 15th, 2020

सरकार राजनीतिक फायदे के लिए भारत से विवाद की स्थिति बना रही है : डॉ. श्वेता दीप्ति

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बदहाली से बेहाल जनता को नए नक्शे का नजराना]

डॉ. श्वेता दीप्ति, काठमांडू | विश्व कोविड १९ की मार से जूझ रहा है । हालात ऐसे हैं कि इस महामारी ने लाखों को लील लिया है । गिरती अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, भुखमरी, आत्महत्या से पूरा विश्व लड़ रहा है । इस बीच नेपाल भी इस महामारी से अछूता नहीं है । सौ का आँकड़ा हजार में बदल चुका है । विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो यह सिर्फ शुरुआत है, हालात इससे भी बदतर होने वाले हैं । देश की दशा ऐसी है कि कोविड के नाम पर भी भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है । प्रधानमंत्री को कोविड से मरने वालों पर भी शक है, उनका मानना है कि सभी मरने वाले कोरोना मरीज नहीं हैं । अब यहाँ प्रधामंत्री सही हैं या जाँच प्रक्रिया यह कहा नहीं जा सकता क्योंकि जाँच मशीन भी सवालों के घेरे में ही है । सरकार जनता के प्रश्नों का जवाब देना नहीं चाह रही । लाखों नेपाली नागरिक विदेशों में फसे हुए हैं । जिनके पास पैसे हैं, वो निजी कम्पनियों को उनकी मुँहमाँगी कीमत चुका कर वापस आ रहे हैं । क्वरन्टाइन की बदहाली सर्वविदित है । बिना जाँच लोगों को घर भेजा जा रहा है । जाँच की मशीन काम नहीं कर रही है । व्यवसायी अपनी व्यवसाय को सुचारु करने की माँग के साथ सड़कों पर हैं । दूसरी ओर एमसीसी को लेकर सरकार के खिलाफ विरोध की हवा जोरों पर है । और इन सबसे परे एक और भयावह सच्चाई यह है कि आने वाले कल में जो नेपाली नागरिक विदेशों में मजदूरी कर के जीवनयापन कर रहे थे, उनके वापस आने की प्रबल सम्भावना है, ऐसे में उनके लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं है । एक नजर में यही आज के नेपाल की वर्तमान स्थिति है ।

इन सबके बीच जो सरकार ने नेपाली जनता को एक नजराना दिया है वो है नया नक्शा । जो नेपाली जनता को मिल तो गया लेकिन क्या ऊपर दिए गए सभी समस्याओं का हल इससे मिल जाएगा ? क्या उस नजराने के पीछे आम जनता की पीड़ा और सरकार की असफलता छिप जाएगी ? क्या कारपेट के करोड़ के बजट के पीछे पीसीआर की माँग खत्म हो जाएगी ? खैर ये तो वो सच्चाई है जिसपर फिलहाल राष्ट्रवाद का गहरा रंग चढ़ा हुआ है ।

नेपाली संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा में देश के नए राजनीतिक नक्शे और नए प्रतीक चिन्ह को अपनाने के लिए संविधान संशोधन करने के प्रस्ताव पर आम सहमति बन गई है । इस आलेख के प्रकाशन तक शायद यह कानून भी बन जाए । प्रतिनिधि सभा में इस पर बहस हुई और संविधान में संशोधन के प्रस्ताव को मंजÞूरी मिल गई ।

हालांकि इस बारे में संसद में अभी और बहस होनी है और संविधान संशोधन के औपचारिक मसौदे पर वोटिंग होगी । प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार ने इस सिलसिले में प्रतिनिधि सभा के समक्ष नए राजनीतिक नक्शे और एक नए राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह को मान्यता देने का प्रस्ताव रखा था । नए नक्शे में नेपाल ने अब आधिकारिक रूप से १८१६ में हुई सुगौली संधि के तहत लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नेपाली क्षेत्र के रूप में दिखलाया है । एक ओर जहां सदन में नए मानचित्र और प्रतीक को लेकर बहस हुई, वहीं नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञावली ने इस मुद्दे पर भारत के रुख को लेकर चिंता जाहिर की । दक्षिणी नेपाल में सुस्ता जहां दो नदियां सीमा बनाती हैं और लिपुलेख(लिम्पियाधुरा को लेकर भारत और नेपाल के बीच गतिरोध है । विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञावली का मानना है कि नेपाल ने इस मुद्दे को कूटनीतिक तरीकÞे से सुलझाने की कोशिश की लेकिन भारत ने इसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी । उन्होंने कहा, “हम थोड़े सदमे में हैं क्योंकि सीमा विवाद को बातचीत से सुलझाने के हमारे प्रस्ताव का कोई जवाब नहीं मिला ।

अगर भारत और चीन अपने मसले सुलझा सकते हैं, तो ऐसा कोई कारण नहीं है कि नेपाल और भारत ऐसा ना कर सकें । हमें उम्मीद है कि बहुप्रतीक्षित बातचीत जल्दी ही हो पाएगी ।” वहीं भारत का कहना है कि उन्होंने काठमांडू को सूचित कर दिया है कि सीमा विवाद को लेकर कोई भी बात कोविड १९ महामारी के खÞत्म हो जाने के बाद ही संभव होगी । किन्तु जहाँ तक सवाल यह है कि अगर भारत चीन के साथ इस वक्त अपने विवाद को निबटा सकता है तो नेपाल के साथ क्यों नहीं ? इस मसले का सीधा सा जवाब तो यही है कि भारत और चीन के विवादित सीमा पर जो तनाव और युद्ध का माहोल था तथा जिस तरह चीन अपनी सेना को लगातार भारतीय सीमा की ओर बढा रहा था उस स्थिति में इस विवाद का हल तत्काल करना आवश्यक था जिसे भारत ने इस महामारी के दौर में प्राथमिकता दी और गम्भीरता से इस का समाधान करने के लिए अग्रसर है । यह सभी जान रहे हैं कि वैश्विक महामारी के इस वातावरण में भी चीन लगातार अपनी सैन्य शक्ति बढ़ा रहा है और हर ओर से अपना वर्चस्व कायम करने की फिराक में है । ऐसे में सिर्फ भारत ही नहीं विश्व के अनेक देश चीन की ओर से चिन्ताग्रस्त हैं ।

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ऐसे में भारत के लिए आवश्यक था कि वो सीमा पर चीन से युद्ध या वार्ता दोनों के लिए तैयार है । वैसे जानकारों का मानना तो यह भी है कि आज भले ही चीन पीछे हटने का दिखावा कर रहा हो परन्तु वह कभी भी अपना कोई मौका हाथ से नहीं जाने देगा । इसी परिप्रेक्ष्य में अगर नेपाल की स्थिति देखें तो यह समझ सकते हैं कि भले ही नेपाल की सभी समस्याओं को पीछे रखकर प्रधानमंत्री ने लिपुलेक के मसले को हवा देकर राजनीति की हवा अपनी ओर कर ली हो परन्तु भारत इस मनोदशा में होगा कि यह समस्या उतनी गम्भीर नहीं है जिसे समय नहीं दिया जा सके और इसका समाधान न निकल सके । किन्तु अगर नेपाल इस मसले पर जल्दी निर्णय चाहता है और वह चीन का उदाहरण दे रहा है तो नेपाल को भी चीन की तरह अपनी सैन्यशक्ति के बल पर भारत पर दवाब बनाना होगा । किन्तु जहाँ तक नेपाल भारत के सम्बन्धों का इतिहास है वहाँ हम यह समझ सकते हैं कि ये दोनों ही देश आपसी तनाव के बावजूद भी युद्ध जैसी स्थिति तो बिल्कुल नहीं चाहेगा । क्योंकि चीन और भारत के रिश्ते से बिल्कुल अलग धरातल पर नेपाल और भारत का रिश्ता है और इस सच से विरोधों के बावजूद भी सत्तापक्ष इनकार नहीं कर सकते । भारत के साथ रिश्ता सिर्फ सीमा साझा करने का नहीं है बल्कि दोनों ही देश कई स्तर पर अपनी संस्कृति, परम्परा और पारिवारिक रिश्तों को साझा करता आया है ।

परन्तु जिस माहौल में नेपाल सरकार ने इस विषय को उठाया है उस पर सहज ही चीन का दखल विज्ञ मानते हैं । मई की शुरुआत में नेपाल में राजनीतिक संकट गहरा गया था और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से प्रधानमंत्री के.पी शर्मा ओली के इस्तीफे की मांग शुरू कर दी थी । कहा जाता है कि इस संकट से बचने के लिए ओली ने चीन से मदद मांगी थी, और उसी मदद की कीमत वह भारत के साथ सीमा विवाद खड़े करके चुका रहे हैं । चीनी राजदूत होउ यानिकी ने ओली की सरकार को बचाने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ कई बैठकें कीं और संकट को हल किया । इसके बदले में उसने चीन को निशाना बनाने वाले एक अंतरराष्ट्रीय आंदोलन के खिलाफ नेपाल का समर्थन भी मांगा था । अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत के साथ विवाद के पीछे नेपाल नहीं, बल्कि व्यक्तिगत रूप से ओली हैं । जानकारों का यह भी मानना है कि चीन यह जानता है कि भारत के रहते नेपाल में वह श्रीलंका या पाकिस्तान जैसी मनमानी नहीं कर सकता । इसलिए यह जरूरी है कि कम्युनिस्ट सरकार को माओवादी विचारधारा से जोड़कर, भारत के विरुद्ध खड़ा किया जा सके । इससे न केवल चीन को नेपाल में अपनी साख मजबूत करने में मदद मिलेगी, बल्कि नेपाल में रह रहे तेरह हजार से अधिक तिब्बती शरणार्थियों के लिए भी कदम उठाना आसान हो जाएगा । आश्चर्य की बात है कि वर्ष २०१५ में चीन ने भारत के साथ करार में कालापानी और लिपुलेख को भारत का हिस्सा माना था । चूंकि चीन चाहता है कि भारत–नेपाल संबंधों में दरार पड़े, लिहाजा वह नेपाल को अपनी ढाल बना रहा है ।

यहाँ की राजनीत में भारत विरोध राग के अपने ही फायदे हैं, क्योंकि चीन द्वारा नेपाल के माउंट एवरेस्ट को अपना बताने पर कोई विरोध या वक्तव्य जारी नहीं हुआ । ऐसे में यह कहना गलत नहीं है कि सरकार अपने राजनीतिक फायदे के लिए भारत के साथ विवाद की स्थिति बना रही है । हालांकि सरकार यह भूल रही है कि नेपाल–भारत के संबंध कोई नए नहीं हैं, बल्कि यह सदियों से चले आ रहे दो देशों के बीच अच्छे समन्वय और त्याग पर आधारित है । ओली सरकार सीमा विवाद जैसे मुद्दे के जरिये कुछ समय के लिए भले ही संबंधों को क्षति पहुंचाएं, परंतु भौगोलिक और सांस्कृतिक तौर से वह भारत को दूर नहीं रख सकती । देखा जाए तो विदेशी व्यापार के लिए नेपाल की भारत पर निर्भरता एक सत्य है और ऐसे में कोई भी विवाद दोनों ददेशों के लिए ही नुकसानदेह साबित होगा

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अगर पीछे मुड़कर इस मसले को देखें तो कुछ ऐसी तसवीर सामने नजर आती है । २०१५ में जब भारत और चीन में व्यापारिक समझौते हुए थे उस वक्त दोनों देशों के बीच लिपुलेक चर्चा में था पर नेपाल नहीं । २०१८ में इसी विषय पर विदेश मंत्री प्रदीप ग्यावली ने कहा था लिपुलेक त्रिदेशीय सीमा बिन्दु नहीं है । दार्चुला का कालापानी स्थित लिपुलेक नेपाल का है जिसपर भारत से विवाद है इसलिए उस स्थान को त्रिदेशीय सीमा बिन्दु नहीं माना जा सकता है । मन्त्री ज्ञवाली ने कहा था कि लिपुलेक त्रिदेशीय सीमा बिन्दु नहीं होने के कारण चीन और भारत के बीच उक्त स्थान का प्रयोग व्यापार करने के लिए सहमति पर नेपाल सरकार का विरोध यथावत् है । उन्होंने यह भी कहा था जब तक दो देशों के बीच इस विवाद को नहीं सुलझा लिया जाता तब तक हम त्रिदेशीय नही कह सकते हैं । अभी समग्र कालापानी क्षेत्र विवादित विषय है और नेपाल इसमें दावा रखता है । गौर कीजिए कि यहाँ दावा शब्द आया और जब तक यह दावा सिद्ध नहीं हो जाता तब तक वह क्षेत्र विवादित ही माना जाएगा ।

भारत और चीन के बीच हुए व्यापारिक समझौते जिसमें लिपुलेक के प्रयोग की बात थी उसपर नेपाल ने अपना विरोध जताया था । मजे की बात तो यह है कि उस वक्त भी सामाजिक संजाल में गालियाँ सिर्फ भारत को मिली थी । जबकि इसमें चीन की बराबर की भागीदारी थी क्योंकि उस समझौते में वह भी शामिल था । कालापानी और लिपुलेक पर अगर नेपाल दावा रखता है तो उसकी अनुपस्थिति में इस पर चर्चा का कोई औचित्य नहीं रह जाता है । गौरतलब यह है कि यह विषय फिर ठंडा हो गया । उसके बाद जब भारत ने कश्मीर मसले के बाद अपना नया नक्शा जारी किया तो एक बार फिर इसी मुद्दे ने सर उठाया और नेपाल ने फिर इसका पुरजोर विरोध किया । नेपाल का यह कहना था कि विवादित जमीन को, भारत को एकतरफा निर्णय करते हुए नक्शे में शामिल नहीं करना चाहिए । तो क्या आज जो नया नक्शा नेपाल ने पास किया है वह इसी बात का जवाब है ? इतने सालों से बन रही सड़क का संज्ञान हमारे प्रधानमंत्री जी को नहीं हुआ और अचानक जब सड़क का उद्घाटन होता है तो दो दिनों के अन्दर नक्शा तैयार हो जाता है । इस परिस्थितियों को देखते हुए भारत का इशारा चीन की तरफ है कि यह सब चीन की शह पर हो रहा है । क्योंकि यह सड़क २००२ से निर्माणाधीन थी । इस सड़क के बनने से जहाँ मानसरोवर की यात्रा सहज हुई है वहीं भारत के लिए सामरिक दृष्टि से भी यह काफी महत्तव रखती है । ऐसे में स्वाभाविक है कि चीन को यह बात गँवारा नहीं होगी क्योंकि भारत और चीन के कई सीमा पर विवाद जारी है । चीन की विस्तारवादी नीति से भी पूरा विश्व वाकिफ है । नेपाल पर चीन के बढते प्रभाव पर भी कोई शक नहीं है । कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री की कुर्सी जब खतरे में थी तो चीनी राजदूत की जो भूमिका नेपाल की राजनीति में रही और जिसकी वजह से प्रधानमंत्री की कुर्सी बची उसे इस परिप्रेक्ष्य में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है । खैर यह अनदेखा पहलू है जिस पर कयास ही लगाए जा सकते हैं ।

जहाँ तक सवाल लिपुलेक और कालापानी का है तो जो बातें सबसे पहले समझ में आती है वो यह कि कालापानी एक तरह से डोकलाम की तरह है, जहां तीन देशों के बॉर्डर हैं । डोकलाम में भारत, भूटान और चीन हैं । वहीं कालापानी में भारत, नेपाल और चीन । ऐसे में भारत के लिए सैन्य नजरिये से यह ट्रायजंक्शन बहुत महत्वपूर्ण है । उस क्षेत्र में सबसे ऊंची जगह है ये । १९६२ युद्ध के दौरान भारतीय सेना यहां पर थी । डिफेंस एक्सपर्ट बताते हैं कि इस क्षेत्र में चीन ने भी बहुत हमले नहीं किए थे क्योंकि भारतीय सेना यहां मजबूत स्थिति में थी । इस युद्ध के बाद जब भारत ने वहां अपनी पोस्ट बनाई, तो नेपाल का कोई विरोध नहीं था । ये अलग बात है कि उस वक्त भारत और नेपाल के संबंध भी अब जैसे तनावपूर्ण नहीं थे । भारत का डर ये है कि अगर वो इस पोस्ट को छोड़ता है, तो हो सकता है चीन वहां धमक जाए और इस स्थिति में भारत को सिर्फ नुकसान हासिल होगा । इन्हीं बातों के मद्देनजर भारत इस पोस्ट को छोड़ना नहीं चाहता है । सामरिक दृष्टिकोण से यह क्षेत्र भारत के लिए अत्यन्त महत्तवपूर्ण है और भारत इसे अपना हिस्सा मानता है । वैसे इन विवादों के बीच चीन ने यह कह कर अपना पल्ला झाड़ लिया है कि यह भारत और नेपाल का मामला है और इसमें एकपक्षीय निर्णय से दोनों देशों को बचना चाहिए ।

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भौगोलिक दृष्टिकोण से निर्जन एवं दुर्गम क्षेत्र का सही ढंग से सीमांकन न होने के कारण यह क्षेत्र हमेशा से विवादित रहा है । भारत और नेपाल के सर्वे अधिकारी कई सालों की साझा कोशिशों के बावजूद अभी तक कोई सर्वमान्य नक्शा नहीं बना पाए । दोनों देश के बीच सीमांकन आयोग का भी गठन हुआ था जो कि निष्क्रीय है ।

भारत और नेपाल के बीच लगभग १७५१ किमी सीमा है जिसका निर्धारण ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच युद्ध की समाप्ति के बाद स्थाई शांति के लिए २ दिसम्बर १८१५ को हस्ताक्षरित सुगोली की संधि के द्वारा किया गया था । संधि को नेपाल के राजा ने ४ मार्च १९१६ को अनुमोदित किया था । संधि की शर्तों के अनुसार नेपाल ने तराई के विवादास्पद इलाके और काली नदी के पश्चिम में सतलज नदी के किनारे तक (आज के उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश) जीती हुई जमीन पर अपना दावा छोड़ दिया था । इस सधि में नेपाल के साथ सिक्किम तक की सीमाएं तय हैं जिसमें उत्तराखण्ड से लगी २६३ किमी लंंबी सीमा भी शामिल है । नेपाल कालापानी के उत्तर पश्चिम में १६ किलोमीटर दूर लिम्पियाधुरा से निकलने वाली कूटी यांग्ती (नदी) को उसकी लम्बाई एवं जलराशि के आधार पर काली नदी मानता है, जबकि भारतीय पक्ष कालापानी से निकलने वाली जलधारा को ही काली नदी मानता रहा है । इन दोनों जलधाराओं का गुंजी के निकट मनीला में संगम होता है और आगे चलकर यही काली नदी शारदा और काफी आगे मैदान में चलकर घाघरा कहलाती है । कूटी के अलावा काली नदी की स्रोत जल धाराओं में धौली, गोरी और सरयू भी शामिल हैं ।

सरयू पंचेश्वर में और गोरी नदी जौलजीवी में काली से मिलती है । सुगोली की संधि में काली नदी के पश्चिम वाला क्षेत्र भारत का और पूरब वाला नेपाल का माना गया है । जिस नदी को नेपाल में काली नही कहते हैं वह पश्चिम से पूरब की ओर बहती है । इसलिए नेपाल के दावे के अनुसार संधि में विभाजक दिशाएं पूरब–पश्चिम के बजाय उत्तर और दक्षिण मानी जानी चाहिए थीं । जबकि इस कूटी घाटी में नदी के दो किनारे उत्तर और दक्षिण दिशा की ओर हैं और घाटी के निचले आबादी वाले क्षेत्र में नदी के दोनों ओर भारत और नेपाल के गांव हैं । इधर भारत जिस नदी को काली मानता है वह उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है । इसलिए संधि के हिसाब से पूरब में नेपाल के दार्चुला जिले के छांगरू, दिलीगाड़, तिंकर और कौआ गांव है, जबकि पश्चिम में भारत के उत्तराखण्ड राज्य के पिथौरागढ़ जिले की गुंजी, नपलच्यू, रौंगकौंग, नाबी, कूटी, गब्र्यांग और बुदी ग्राम सभाएं हैं । वर्तमान में इस नदी के दोनों ओर भाटिया जनजाति के लोग बसे हुए हैं । एक ही संस्कृति और नृवंश के चलते दोनों ओर के ग्रामवासियों के आपस में वैवाहिक और आर्थिक संबंध हैं ।

यह दोनों देशों के नागरिकों की स्थिति है । जहाँ सीमान्तों के बीच कोई मतभेद नहीं है । परन्तु सवाल इस बात का जरूर है कि आखिर अचानक नेपाल सरकार ने अफरातफरी में यह निर्णय क्यों लिया ? जबकि नेपाल के विरोध पर भारत ने यह कहा था कि अन्तर्राष्ट्रीय वायुसेवा सुचारु होने के बाद इस विषय पर वार्ता होगी इसके लिए हम तैयार हैं ।
भारत ने नेपाल के इस नए नक्शे को मानने से इनकार कर दिया है । कल तक जो बातें वार्ता कर के सुलझाने की थी वो अब तनाव का रूप अख्तियार कर चुकी है । जाहिर है कि आने वाले समय में इसका स्वरूप और भी बदल सकता है । उम्मीद तो अब भी यही की जानी चाहिए कि इस मसले को शांतिपूर्ण तरीके से निपटाया जाए और कोई मध्यममार्ग अपना कर सदियों की मित्रता को कायम रखा जाय । क्योंकि पड़ोसी बदले नहीं जाते और ये दोनों देश विवादों के बावजूद कई स्तरों पर हमेशा साथ–साथ खड़े रहे हैं । वैसे विदेश मंत्री का यह कथन सही है कि बिना किसी आवेग और पूर्वागृह के इस समस्या के समाधान की जरुरत होगी । हिमालिनी अंक जून 2020

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