Mon. Jun 15th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें himalini-sahitya

पानी (कविता) : वसन्त लोहनी

 

पनियां

सावन में पानी गिरे तो
तकलीफें आपको होती है
आपकी शिकायतें बढती
बाहर निकल न पाते
और कोसते रहते हैं सबको

सागर से निकला मेघ
हिमगिरी होकर अलकापुरी तक
यौजन यात्रा के बाद
जब थक जाता है
सदा अस्थिर बादल
संतुलन खोने के लिए
अब स्थिर बन जाता
प्रश्न यक्ष का नहीं है यह
न यक्ष का दूत बन सकता बादल
थका हुआ बादल जब टूट जाता
तभी तो धरा भीग जाएगी
भीगी हुई धारा देखकर
किसान आल्हादित हो जाएंगे

यह भी पढें   रक्तपात, अंधकार और प्रशासनिक उदासीनता: गिलगित-बाल्टिस्तान और पीओके में गहराता संकट : अनिल तिवारी

अगर पानी अब ना आए तो
किसान क्या बोएंगे
बनिया कहां से अनाज उठाएंगे
आप और हम क्या खाएंगे
जो मिट्टी के साथ खेलते हैं
उन्हें पता है धरा का स्पर्श
वह जो सब मिलकर बोएंगे
प्रादुर्भाव होता है अलौकिक ध्वनि
महसूस होता है कुछ न कुछ
तभी तो स्वस्फूर्त गीत निकला
रोमांस का प्रवाह बनकर
भीगा हुआ बदन
भीगी हुई मिट्टी
और बोएं हुए हाथ
इसी लय मे बंधे संगीत से
सृष्टि जीवित हैं
आप और हम जीवित हैं
अगर पानी न आए तो
आप और हम कहां रहेंगे ?

यह भी पढें   अमेरिका और ईरान शांति समझौते के करीब : शहबाज शरीफ
वसन्त लोहनी, काठमाण्डू

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *