22 अगस्त शनिवार को गणेश चतुर्थी : आचार्य राधाकान्त शास्त्री,
22 अगस्त शनिवार को गणेश चतुर्थी:-
शुभ मूहू्र्त, महत्व, पूजा विधि एवं व्रत कथा :-
इस वर्ष गणेश चतुर्थी व्रत 22 अगस्त शनिवार को सुबह से अपने सम्पूर्ण दिन अपने सुविधा के अनुसार गणेश जन्मोत्सव मनाया जाएगा ।
गणेश चतुर्थी पर भगवान श्री गणेश की स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 9 बजे से दोपहर 2 बजे तक है,
एवं सायं 4 बजे से रात्रि 8 बजे तक गणेश स्थापना एवं पूजन का शुभ मुहूर्त है ।
गणेश चतुर्थी का व्रत भाद्रपद मास शुक्ल पक्ष के चौथ के दिन मनाई जाती है । और गणेश चतुर्थी पर गणेश स्थापना कर 11 वें दिन गणेश विसर्जन किया जाता है । भगवान गणेश को विघ्नहर्ता के रूप में पूजा जाता है। गणेश जी बुद्धि के देवता भी है।
इस दिन लोग गणेश प्रतिमा को बड़े ही धूमधाम से अपने घर लाते हैं और उनका पूजन करते हैं । आराकाशा के अध्ययन ग्रंथो के अनुसार,
22 अगस्त शनिवार को,
गणेश चतुर्थी सम्पूर्ण दिन एवं रात्रि 11:35 तक गणेश स्थापना एवं पूजन किया जा सकता है।
गणेश चतुर्थी का महत्व :-
आराकाशा के अध्ययन ग्रंथो के अनुसार,
गणेश जी को मोदक और लड्डूओं का भोग लगाया जाता है और अपने मंगल की कामना की जाती है। दस दिनों के बाद गणेश जी की प्रतिमा का बड़े ही धूम धाम से विसर्जन कर दिया जाता है और उनसे प्रार्थना की जाती है कि जिस प्रकार वह इस साल उनके घर मे पधारे हैं उसी प्रकार अगले साल भी वह बड़ी धूमधाम से उनके घर में पधारें और उन्हें अपना आर्शीवाद दें।
आराकाशा के अध्ययन ग्रंथों के अनुसार गणेश चतुर्थी की पूजा विधि :-
1. गणेश चतुर्थी के दिन साधक को प्रातः स्नान करने के बाद सोने, तांबे, मिट्टी की गणेश प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।
2, पवित्र आसन अथवा एक नए कलश की स्थापना कर उसके उपर वस्त्र बांधकर उसके ऊपर गणेश जी को विराजमान करें।
3. गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को सिंदूर व दूर्वा अर्पित करके 21 या 108 या 1008 लडडुओं का भोग लगाएं। इनमें से 11 लड्डू गणेश जी को अर्पित करके शेष लड्डू गरीबों या ब्राह्मणों को बाँट दें।
4. सांयकाल के समय गणेश जी का विशेष पूजन करना चाहिए। पुनः गणेश चतुर्थी की कथा, व स्तोत्र का का पाठ करें, तथा
*इस दिन सायं काल व रात्रि में चंद्र दर्शन न करें।*
5. इस दिन गणेश जी के सिद्धिविनायक रूप की पूजा व व्रत किया जाता है।
गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्र-दर्शन वर्ज्य होता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चन्द्र के दर्शन करने से मिथ्या दोष अथवा मिथ्या कलंक लगता है जिसकी वजह से दर्शनार्थी को चोरी का झूठा आरोप सहना पड़ता है।
आराकाशा के अध्ययन ग्रंथो के अनुसार इस दिन के चन्द्र दर्शन के कारण
भगवान कृष्ण पर स्यमन्तक नाम की कीमती मणि चोरी करने का झूठा आरोप लगा था। झूठे आरोप में लिप्त भगवान कृष्ण की स्थिति देख के, नारद ऋषि ने उन्हें बताया कि भगवान कृष्ण ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चन्द्रमा को देखा था जिसकी वजह से उन्हें मिथ्या दोष का श्राप लगा है।
आराकाशा के अध्ययन ग्रंथो के अनुसार,
नारद ऋषि ने भगवान कृष्ण को आगे बतलाते हुए कहा कि भगवान गणेश ने चन्द्र देव को श्राप दिया था कि जो व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चन्द्र के दर्शन करेगा वह मिथ्या दोष से अभिशापित हो जायेगा और समाज में चोरी के झूठे आरोप से कलंकित हो जायेगा। नारद ऋषि के परामर्श पर भगवान कृष्ण ने मिथ्या दोष से मुक्ति के लिये गणेश चतुर्थी के व्रत को किया और मिथ्या दोष से मुक्त हो गये।
अगर गलती से किसी को इस दिन चन्द्र दर्शन हो जाये तो श्री मद्भागवत के इस कथा के श्रवण मात्र से भी चन्द्र दर्शन के दोष दूर हो जाते हैं ।
आराकाशा के अध्ययन ग्रंथो के अनुसार,
अगर भूल से गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्रमा के दर्शन हो जायें तो मिथ्या दोष से बचाव के लिये निम्नलिखित मन्त्र का जप करना चाहिये –
सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मारोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥
वैसे प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा अर्चना करने से आपके सभी संकट दूर हो जाते हैं। इसे इसे संकट हारा चतुर्थी भी कहते हैं। चूंकि यह चतुर्थी हर माह मनाई जाती है, इस लिए भगवान गणेश के कई रूपों की पूजा होती है। शुक्ल पक्ष में आने वाली चतुर्थी को विनायक चतुर्थी भी कहते हैं। इसे संकट हारा, अंगारकी चतुर्थी और गणेश चतुर्थी आदि के नाम से भी जाना जाता है। यदि यह चतुर्थी कृष्ण पक्ष के मंगलवार को पड़ती है तो इसे अंगारकी संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। इस दिन गणेश के भक्त उपवास रखते हैं।
आराकाशा के अध्ययन ग्रंथो के अनुसार,
भगवान गणेश को बल, बुद्धि और विवेक का देवता माना जाता है। यह अपने भक्तों के सभी विघ्न हर लेते हैं। इसलिए इन्हें विघ्नहर्ता भी कहा जाता है।
संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा के अनुसार
यह भगवान गणेश का जन्मदिवस है और इस दिन को भारत के अलग-अलग हिस्सों में विभिन्न नामों धूमधाम से मनाया जाता है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत बहुत कठीन होता है। इस व्रत में केवल फलों का ही सेवन किया जा सकता है। इसके अलावा मूंगफली, साबूदाना आदि भी खाया जा सकता है।
इस व्रत में उपवास करने वाले व्यक्ति को सुबह नहा धोकर लाल रंग का कपड़ा पहनना चाहिए। पूजा में फल-फूल आदि चढ़ाएं और गणेश की अराधना करें। गणेश जी को मोदक का भोग अवश्य लगाएं। पूरे विधि विधान से पूजा करने के बाद गणेश मंत्र या ॐ गणेशाय नमः का जप करें।
आराकाशा ग्रंथों के अनुसार गणेश की पूजा और श्री गणेश अथर्वशीर्ष का नियमित पाठ या पुरश्चरण प्रयोग यदि पूरी श्रद्धा से की जाए तो सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। श्री गणपति के विशेष प्रसन्नता के लिए निम्न स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत लाभकारी होता है
श्री गणपति अथर्वशीर्ष।।
ॐ नमस्ते गणपतये।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि
त्वमेव केवलं कर्ताऽसि
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि
त्व साक्षादात्माऽसि नित्यम्।।1।।
ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि।।2।।
अव त्व मां। अव वक्तारं।
अव श्रोतारं। अव दातारं।
अव धातारं। अवानूचानमव शिष्यं।
अव पश्चातात। अव पुरस्तात।
अवोत्तरात्तात। अव दक्षिणात्तात्।
अवचोर्ध्वात्तात्।। अवाधरात्तात्।।
सर्वतो मां पाहि-पाहि समंतात्।।3।।
त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मय:।
त्वमानंदमसयस्त्वं ब्रह्ममय:।
त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽसि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि।।4।।
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभ:।
त्वं चत्वारिवाक्पदानि।।5।।
त्वं गुणत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:।
त्वं देहत्रयातीत:। त्वं कालत्रयातीत:।
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यं।
त्वं शक्तित्रयात्मक:।
त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं
रूद्रस्त्वं इंद्रस्त्वं अग्निस्त्वं
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं
ब्रह्मभूर्भुव:स्वरोम्।।6।।
गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं।
अनुस्वार: परतर:। अर्धेन्दुलसितं।
तारेण ऋद्धं। एतत्तव मनुस्वरूपं।
गकार: पूर्वरूपं। अकारो मध्यमरूपं।
अनुस्वारश्चान्त्यरूपं। बिन्दुरूत्तररूपं।
नाद: संधानं। सं हितासंधि:
सैषा गणेश विद्या। गणकऋषि:
निचृद्गायत्रीच्छंद:। गणपतिर्देवता।
ॐ गं गणपतये नम:।।7।।
एकदंताय विद्महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दंती प्रचोदयात।।8।।
एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैर्विभ्राणं मूषकध्वजम्।
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।
रक्तगंधाऽनुलिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्।।
भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।
आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृते पुरुषात्परम्।
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर:।।9।।
नमो व्रातपतये। नमो गणपतये।
नम: प्रमथपतये।
नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय।
विघ्ननाशिने शिवसुताय।
श्रीवरदमूर्तये नमो नम:।।10।।
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इस मंत्र का प्रतिदिन पाठ करना समस्त दोषों के निवारण का अचुक प्रयोग होता है,
श्री गणपति सदैव आपके साथ रहें , और सबकी सम्पूर्ण प्रसन्नता बनाये रखें
आचार्य राधाकान्त शास्त्री,
9934428775, 9798992284,

