ज़िम्मेदारी की भट्टी में : कल्याण सिंह शेखावत
ज़िम्मेदारी की भट्टी में
कंधों पर अपनों के सपने,
दिल में गहरे दर्द छिपाए,
निकला मर्द कमाने।
कभी मातु का पूत लाडला
और दास जोरू का।
संतानों का बैंक अनोखा,
खोटी अर्थ व्यवस्था।।
नेक इरादे, सोच सयानी,
सबकी आस सजाने।
निकला मर्द कमाने।
कष्ट और दुविधा के धन से,
रहती भरी तिजोरी।
पर मुखड़े पे खुशी नाचती,
दुख सुख करें चिरोरी।।
उम्मीदों पर खरा उतरता,
करता नहीं बहाने।
निकला मर्द कमाने।
मोम नहीं, लोहे का है दिल,
जो कि नियति झुठलाता।
करे दिखावा ठीक ठाक है,
अश्रु आंख कब आता।।
कड़क ज़ुबां की नेह नीति को,
परिजन कब पहचाने।
निकला मर्द कमाने।
औरों को उजियारे बांटे,
ओढ़े घुप्प अंधेरे।
हिस्से का आराम न मांगा,
खटता सांझ सवेरे।।
मर्यादा का ढोंग दिखाकर,
ठगते लोग सयाने।
निकला मर्द कमाने।
ज़िम्मेदारी की भट्टी में,
अपना जीवन झोंका।
आंखों पर ममता की पट्टी,
सबने समझा पोंगा।।
रहा ढूंढता एक गोद को,
सिर रखकर सो जाने।
निकला मर्द कमाने।

@कल्याण सिंह शेखावत


