सिर्फ कुछ यादें और कशिश, वो थी हमारी अपनी दहलीज : लालिमा
पराया घरौंदा
सिर्फ कुछ यादें और कशिश
वो थी हमारी अपनी दहलीज
जहां गुजरे बचपन और जवानी
वह जिंदगी की शुरुआत थी अपनी।
सोंधी महक,उस घर की माटी में
मेरे मन को अब भी छू जाती है
उस आंगन में तो हम बहनों की
यादों में बिखरी होली की रंगत है।
हसीन खुशबू की हरी-भरी बगिया
मेरे ख्वाबों में अब भी आती है,
बिछड़ी हुई वह प्यारी सखियां
यादों के साए में घिरती है।
सोचती हूं जब गुमसुम अकेली
पलकें बोझिल हो जाती है मेरी
वो आजादी जैसे खो गई हो कहीं
पर, प्यारा घरौंदा मेरा पराया है वहीं।


