सिमट कर अपने सूनेपन में : लक्ष्मण नेवटिया
बूढ़ा आम का पेड़
अब मोजराता नहीं है ,
बूढ़ा आम का पेड़ ,
बगीचे के बीच खड़ा तो है,
पर किसी को सुहाता नहीं है,
बूढ़ा आम का पेड़।
माली ने खाए हैं इसके मीठे आम
पर अब पैसों के लालच में सोचकर करने काम तमाम
लकड़हारे को बुला
अपने दिल की बात बताई
लकड़हारे ने साफ़ कह दी
हरेभरे वृक्ष को काटने की मनाही,
माली क्यों इतना स्वार्थी हो गया है
कुछ समझ नहीं पाता है
बूढ़ा आम का पेड़।
कल तक वही तो उठाता था
माली के घर के खर्च का भार,
उसके ही पत्तों से बनती थी
घर की ही नहीं पूरे मुहल्ले के
हर घर की बन्दनवार ।
जब माली बच्चा था
उसकी ही छाँव में तो पला था ,
जब हुआ जवान
विवाह के फेरों की अग्नि के साथ
वो ही तो जला था
बनता था वर्षभर का
उसकी ही खट्टी केरियों से घर में अचार।
पक्षियों के घोंसलों का वही था आधार,
पर अब,जब उसको सहारे की ज़रुरत है
एकाएक बदला देख मालीका व्यवहार
क्यों ऐसा हो गया है आदमी
दीर्घश्वास छोड़ कुंठित हो,
सिमट कर अपने सूनेपन में-
कट मर जाना चाहता है
भिंचा-भिंचा सा,घुटा-घुटा सा
बूढ़ा आम का पेड़।

विराटनगर -९
– लक्ष्मण नेवटिया·, बिराटनगर


