पत्थर दिल : वीरेन्द्र बहादुर सिंह
पत्थर दिल
वीरेन्द्र बहादुर सिंह । मैंने मोबाइल में समय देखा, छह बजने में पांच मिनट बाकी थे। सुधा को अब तक आ जाना चाहिए था। वह समय की बहुत पाबंद थी। मेरी नजर दरवाजे पर ही टिकी थी। लगभग डेढ़, पौने दो साल से यही क्रम चला आ रहा था। इसका क्या परिणाम होगा, यह मैं भी नहीं जानता था। फिर भी मैं सावधान रहता था। क्योंकि जो भी हो रहा था, वह कतई उचित नहीं था। यह जानते हुए भी मैं खुद को रोक नहीं पा रहा था। माना कि वह मुझ पर मुग्ध थी, पर शायद मैं कतई नहीं था। मेरा हराभरा, भरापूरा संसार था। सुंदर, सुशील, घरगृहस्थ पत्नी, दो बच्चे, प्रतिष्ठित, रौबदाब वाली नौकरी़ ़ ़ पंद्रह साल के वैवाहिक जीवन में कभी किसी तरह की कोई किचकिच नहीं। यह अलग बात है कि कभी पल, दो पल के लिए किसी बात पर तूतू मैंमैं हो गई हो। बाकी हमारा खुशहाल परिवार था। फिर भी अंदर से व्यावहारिक गृहस्थ चेता रहा था कि अभी समय है, यहीं रुक जाओ, वापस लौट आओ।
परंतु सुधा के साथ हमारे जो संबंध थे, वे इतने छिछोरे नहीं थे कि एक झटके में तोड़े जा सकें या अलग हुआ जा सके। सब से बड़ी बात सह थी कि हम ने कभी मर्यादा लांघने की कोशिश नहीं की थी। हमारे रिश्ते पूरी तरह स्वस्थ और समझदारी भरे थे। कुछ हद तक मेरे बातचीत करने के लहजे और कलात्मक स्वभाव की वजह से वह मेरी ओर आकर्षित हुई थी। इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं था। आपसे दस साल छोटी युवती आपसे जबरदस्त रूप से प्रभावित हो और आप संन्सासी जैसा व्यवहार करें, यह कैसे संभव हो सकता है। मैंने भी खुद को काबू में रखने की कोशिश की थी, पर मेरी यह कोशिश बनावटी थी, क्योंकि शायद मैं उससे दूर नहीं रह सकता था। कोशिश की ही वजह से आकर्षण घटने के बजाय बढ़ता ही जा रहा था। लगता था कि यह छूटेगा नहीं। उसकी नौसिखिया लेखकों जैसी लिखी कहानियों को मैं अस्वीकृत कर देता, वह शरमाती और निखालिस हंसी हंस देती। फटी आंखों से देखा करती मेरे सामने। अपनी कहानी अपने ही हाथों से फाड़ कर कहती, ‘‘दूसरी लिख कर लाउंगी।’’ कह कर चली जाती। हमारे बीच किताबों का लेन देन होने लगा था। उसकी दी गई किताबें ज्यादातर मेरी पढ़ी होती थीं। कुछ मुझे पढ़ने जैसी नहीं लगती थीं। मैं उन्हें वापस कर देता था।
वह मेरे अहं को झकझोरती रहती थी। शायद मैं उसे हैरान करने वाली युक्तियों से ठंडक पहुंचाता रहता था। क्योंकि पुरुष जो था। हमारे संबंध यानी रिश्ते भले ही चर्चा में नहीं थे, पर ख््राुसुरफुसुर तो होने ही लगी थीं। यहां एक बात स्पस्ट कर दूं कि हमारे बीच किसी भी तरह का शारीरिक संबंध नहीं था। इस तरह के रिश्ते के बारे में हमने कभी सोचा भी नहीं था। सुधा से इस तरह की मैंने कभी अपेक्षा भी नहीं की थी, न ही मेरा कोई इरादा था। उससे मेरा रिश्ता मानसिक स्तर का था। जिस तरह लोगों के बीच समान स्तर का होता है, उसी तरह मेरा और उसका बौद्विक रिश्ता था। ऐसा शायद समाज के डर से था। पर मैं उससे रिश्ता तोड़ने से घबरा रहा था। हमारा समाज स्त्रीपुरुष की दोस्ती को स्वस्थ नजरें से नहीं देखता। यही सत्य भी है। पर ये रिश्ते स्थूल थे। धरातल के थे। यह मान लेना चाहिए। कम से कम मेरे और सुधा के बीच निखालसता थी। उसके मन में मेरे प्रति जो आदर था, उसे मैं सस्ते में नहीं ले सकता था। इस बात में मुझे जरा भी विश्वास नहीं था। कल शाम को उसका फोन आया, ‘‘सर, कल शाम को छह बजे मिल सकते हैं?’’
मना करने का मन था, इसलिए मैंने पूछा, ‘‘ऐसा क्या काम है,’’
‘‘काम हो तभी मिल सकते हैं क्या सर?’’
‘‘ऐसा तो नहीं है, पर ़ ़ ़ओके मिलते हैं, बस।’’ कह कर मैंने फोन रख दिया।
मेरे फोन रखते ही पत्नी ने पूछा, ‘‘कौन था?’’ मैं कुछ जवाब दूं, उस के पहले ही बोली, ‘‘सुधाा ही होगी?’’
‘‘हां, मिलना चाहती है।’’
‘‘तुम नहीं मिलना चाहते?’’ बेधड़क सवाल। पत्नी के इस सवाल का जवाब ‘हां’ या ‘न’ में नहीं दिया जा सकता था।
मैंने कहा, ‘‘डरता हूं सुरेखा। वह भी मेरी तरह लेखक बनना चाहती हैे। स्त्रीपुरुष का भेद किए बगैर मुझे उसकी मदद करनी चाहिए, पर ़ ़ ़’’
‘‘वह स्त्री है और सुंदर भी, इसीलिए तुम उदार बन रहे हो न? अगर ऐसा है तो घमंडी कहलाओगे।’’ कह कर पत्नी हंस पड़ी। दसवीं पास गांव की पत्नी का अलग ही रूप।
मैंने उससे पूछा, ‘‘क्या करूं?’’
‘‘मिलने के लिए तो कह चुके हो, अब पूछ रहे हो?’’
‘‘मैं उस अर्थ में नहीं पूछ रहा। मैं पूछ रहा हूं कि उसके साथ के रिश्ते को कैसे रोकूं सुरेखा। मुझे मेरी नहीं, उसकी चिंता है। उसकी अभी नईनई शादी हुई है। वह मुझ पर मुग्ध है। उसकी यह मुग्धता उसके दांपत्य में आग लगा सकती है। आई एम रियली कनफ्रयूज सुरेखा। वह बहुत ही प्यार करने वाली है।’’
स्पष्ट हो जाओ। सख्ती से कह दो, तुम्हें फोन न करे। जितना हो सके, उतना दूर रहो उससे।’’ पत्नी की सलाह व्यावहारिक थी। मेरे भीतर का व्यवहारकुशल आदमी सहमत था। पर वह बवाली मन? वह नहीं चाहता था। उसे इस बात में बिलकुल विश्वास नहीं था। उसका सोचना था, जो तुम्हें निखालसता से चाहे, तुम्हारा आदर करे, तुम्हारी दोस्ती के बदले गर्व महसूस करे, उसका अपमान, उसकी उपेक्षा ठीक नहीं। इस तरह के आदमी की फिक्र तो सामान्य आदमी भी करता है, तुम तो लेखक हो, लेखक तो समाज से ऊपर उठकर सोचता है। उस रात नींद नहीे आई। पूरी रात करवट बदलता रहा। दिन में आफिस के समय बेध्यान हो जाता। पौने छह बजे डायरेक्टर से अनुमति लेकर कॉफी हाउस के लिए निकल पड़ा। कॉफी हाउस नजदीक ही था, मैं गाड़ी से पांच मिनट में पहुंच गया। छह बजने में पांच मिनट बाकी थे, मैंने दो कप कॉफी का आर्डर कर दिया।
‘अभी तक आई क्यों नहीं?’ मैंने घबरा कर मोबाइल देखा। मुझे वहां आए करीब दस मिनट हो गए थे। कोई मुश्किल तो नहीं आ गई। आजकल के पतियों को कुछ कहा नहीं जा सकता। जबरदस्त नजर रखते हैं पत्नियों पर। मोबाइल पर रिसीविंग और डायल्स नंबर चेक करते हैं। व्हाट्सएप और फेसबुक पर फ्रेंडलिस्ट के साथ मैंसेजर चेक करते हैं। कोई गलत संदेश तो नहीं भेज रहा। मैंने माथे का पसीना पोंछा, दरवाजे की तरफ देखा। खिड़की की तरफ ताका तो शाम की गुलाबी धूप खिड़की से छंटने लगी थी। मैंने स्वस्थ होकर बैठने की कोशिश की। आने जाने वाले असहजता भांप सकते थे। आखिर छह बज कर दस मिनट पर सुधा आई। ब्लैक टीशर्ट और गाढ़ी नीली जींस में वह काफी आकर्षक लग रही थी। मैंने मन को लताड़ा, ‘तू तो कहता है कि शारीरिक आकर्षण नहीं है, मानसिक दोस्ती है, तो फिर ़ ़ ़’
‘‘सॉरी सर, आई एम लेट।’’
‘‘बैठो, मैंने कॉफी का आर्डर कर दिया है।’’
‘‘थैंक्स सर, सब ठीक तो है न?’’
‘‘पर ज्यादा समय तक नहीं रहेगा।’’
वातावरण भारी हो उठा। इतना कह कर मैं चुप हो गया था। वह भी चुप थी। थोड़ी देर बाद उसने ही चुप्पी तोड़ी, ‘‘मैं आपको परेशान करती हूं न? सॉरी सर, न चाहते हुए भी मैंने आपको फोन किया। बात यह है कि एक सप्ताह के लिए मैं बाहर घूमने जा रही हूं, इसलिए सोचा कि सर को ़़ ़ ़’’
‘‘कहां जा रही हो?’’
‘‘जी गुजरात, द्वारिकाधीश।’’
‘‘पति के साथ जा रही हो, साथ में और कौन कौन जा रहा है?’’ मैंने पूछा। इसी के साथ मैंने लंबी सांस छोड़ी। बेयरा दो कप कॉफी रख गया था। एक कप अपनी ओर खिसका कर दूसरा कप उसकी ओर खिसका दिया। उसे कॉफी ठंडी कर के पीने की आदत थी। मैंने अपना कप उठा कर मुंह से लगाया। कप टेबल पर रखते हुए कहा, ‘‘इंज्वाय करने का टाइम है, करो।’’
‘‘ईर्ष्या हो रही है क्या? मैं तो वही करना चाहती हूं, जो आपको अच्छा लगे। पर पास रहती हूं तो भी आपको अच्छा नहीं लगता और दूर जा रही हूं तो भी आपको अच्छा नहीं लग रहा। आखिर मैं करूे तो क्या करूं, मर जाऊं?’’
‘‘कॉफी अच्छी है।’’ कह कर मैंने चुस्की ली। वह वैसी ही बैठी रही। कॉफी ठंडा करना ही उसका काम था। मैं अपनी कॉफी पी गया। कप टेबल पर रख कर उसकी ओर देखा। पत्नी की याद आ गई। मन में आया कि कह दूं कि यह हमारी अंतिम मुलाकात है। अब हम आगे से नहीं मिलेंगे। तुम अपने परिवार में मन लगाओ, मैं अपने परिवार के साथ खुश सुखी हूं। तुम भी अपने परिवार के साथ खुश और सुखी रहो। तुम्हारे साथ फाग गाने की अब हमारी उम्र नहीं रही। तुम मेरी आंखों के नीचे गड्ढ़े देख सकती हो। फैलते रेगिस्तान जैसा मेरा सिर। अब इसकी विशालता पर गर्व महसूस नहीं किया जा सकता। मेरी कदरूपता का ढि़ंढोरा पीटता मेरा यह पेट ़ ़ ़ ये सब तो ठीक है, पर मैं एक जिम्मेदार व्यक्ति हूं सुधा।
‘‘कुछ मंगाना है गुजरात से? नमकीन, किताबें या कुछ और?’’
‘‘नहीं, कुछ नहीं मंगाना।’’
’’कोई ख्वाहिश, मन्नत?’’
‘‘कौन पूरी करेगा?’’
‘‘द्वारिकाधीश।’’ कहते हुए उसकी आंखें में सावित्री की श्रद्धा थी। मैं खिलखिलाकर हंस पड़ा। पर उसकी श्रद्धा की ज्योति जरा भी नहीं डगमगाई।
‘‘आपको हंसी आ रही है?’’ उसने एकदम शांति से पूछा। धैर्य खोए बिना। एकदम अलग रूप। उस समय उसकी आधुनिकता अदृश्य थी। मेरी नास्तिकता से वह अंजान नहीं थी। फिर भी उसका इस तरह कहना मुझे हंसने के लिए प्रेरित कर रहा था। इसमें कुछ अस्वाभाविक भी नहीं था। पढ़ीलिखी महिलाओं की इस तरह की इच्छााओं की मैं हंसी उड़ाता था।
‘‘बोलो, क्या चाहते हो?’’ वह अभी भी पहले की ही तरह गंभीर थी।
मुझे मजाक सूझा, मैंने कहा, ‘‘मांगूं?’’
उसने आंखों से ही ‘हां’ कहा।
‘‘सुधा, तुम मुझे पसंद नहीं या तुम्हारे प्रति आकर्षण नहीं, यह कह कर मैं खुद के साथ छल नहीं करूंगा। भगवान के प्रति मुझे जरा भी श्रद्धा नहीं है, पर तुम्हारी श्रद्धा की भी हंसी उड़ाने का मेरा कोई हक नहीं हैै। मुझे अब कोई लालसा नहीं है। मुझे जो मिला है, वह बहुत है। पत्नी, बच्चे, प्रतिष्ठा, पैसा औऱ ़ ़’’
‘‘औऱ ़ ़’’
‘‘तुम्हारी जैसी सहृदय मित्र आखिर और क्या चाहिए? मैं संतुष्ट हूं। बस, मुझे तुमसे एक वचन चाहिए।’’
‘‘क्या?’’
‘‘हमारे बीच यह निखालसता इसी तरह बनी रहे। हमारी इस विरल मित्रता के बीच शरीर कभी न आए। मित्रता की पवित्रता हम इसी तरह बनाए रखें। हमारे बीच नासमझी की दीवार न खड़ी हो। बोलो, यह संभव है?’’
मेरे इतना कहते कहते उसकी आंखें भर आईं। कॉफी का कप खिसका कर वह बोली, ‘‘मुझ पर विश्वास नहीं है सर। आपने मुझे बहुत सस्ती समझा। स्त्री हूं न, इसीलिए। पर चिंता मत कीजिए, मैं वचन देती हूं कि, ‘‘इसके बाद बची सारी कॉफी एक बार में पीकर बोली, ‘‘आप लेखक हैं, हैरानी हो रही है कि आप लेखक होकर भी कितने कठोर हैं। लेखक तो बहुत कोमल होता है। आप की तरह पत्थरदिल नहीं।’’
मैं सन्न रह गया। शायद अस्वस्थ भी। मैंने अपना हाथ छाती पर रख कर देखा, दिल धड़क रहा है या नहीं?

जेड 436ए, सेक्टर 12ए नोएडा,गौतम बु( नगर, पिन: 201301

