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बिन बेटी सब सून ! : प्रियंका सौरभ

 

बेटी दिवस विशेष

जीवन में आनंद का, बेटी मंतर मूल !
इसे गर्भ में मारकर, कर ना देना भूल !!

बेटी कम मत आंकिये, गहरे इसके अर्थ !
कहीं लगे बेटी बिना, तुझे सृष्टि व्यर्थ !!

बेटी होती प्रेम की, सागर सदा अथाह !
मूरत होती मात की, इसको मिले पनाह !!

छोटी-मोटी बात को, कभी न देती तूल !
हर रिश्ते को मानती, बेटी करें न भूल !!

बेटी माँ का रूप है, मन ज्यों कोमल फूल !
कोख पली को मारकर, चुनों न खुद ही शूल !!

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बेटी घर की लाज है, आँगन शीतल छाँव !
चलकर आती द्वारपर, लक्ष्मी इसके पाँव !!

बेटी चढ़े पहाड़ पर, गूंजे नभ में नाम !
करती हैं जो बेटियाँ, बड़े बड़े सब काम !!

बेटी से परिवार में, पैदा हो सम-भाव !
पहले कलियाँ ही बचें, अगर फूल का चाव !!

बिन बेटी तू था कहाँ, इतना तो ले सोच !
यही वंश की बेल है, इसको तो मत नोच !!

हर घर बेटी राखिये, बिन बेटी सब सून !
बिन बेटी सुधरे नहीं, घर, रिश्ते, कानून !!

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बेटे को सब कुछ दिय,खुलकर बरसे फूल !
लेकिन बेटी को दिए,बस नियमों के शूल !!

सुरसा जैसी हो गई,बस बेटे की चाह !
बिन खंजर के मारती,बेटी को अब आह !!

झूठे नारो से भरा,झूठा सकल समाज!
बेटी मन से मांगता,कौन यहाँ पर आज!!

बेटी मन से मांगिये,जुड़ जाये जज्बात !
हर आँगन में देखना,सुधरेगा अनुपात !!

झूठे योजन है सभी ,झूठे है अभियान !
दिल में जब तक ना जगे,बेटी का अरमान !!

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अब तो सहना छोड़ दो,परम्परा का दंश!
बेटी से भी मानिये, चलता कुल का वंश!

बेटी कोमल फूल सी,है जाड़े की धूप!
तेरे आँगन को खिले ,बदल-बदलकर रूप !!

सुबह-शाम के जाप में,जब आये भगवान !
बेटी घर में मांगकर,रखना उनका मान !!

प्रियंका सौरभ 
रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

✍ —-प्रियंका सौरभ

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