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white dove flying on clear blue sky

डॉ मुक्त, नई दिल्ली । मानव जीवन का प्रमुख प्रयोजन है– शांति प्राप्त करना, जिसके लिए वह आजीवन प्रयासरत रहता है । शांति बाह्य परिस्थितियों की गुलाम नहीं है, बल्कि इसका संबंध तो हमारे अंतर्मन व मनःस्थिति से होता है । जब हम स्व में स्थित हो जाते हैं, तो बाह्य परिस्थितियों का हम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और हम सत्, चित्, आनंद अर्थात् अलौकिक आनंद को प्राप्त कर सकते हैं । दूसरे शब्दों में मानव हृदय में दैवीय गुणों–शक्तियों का विकास होता है और वह निंदा, राग–द्वेष, स्व–पर, आत्मश्लाघा आदि दुष्प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर लेता है । आत्म–प्रशंसा करना व सुनना संसार में सबसे बड़ा दोष है, जिसका कोई निदान नहीं । यह मायाजाल युग–युगांतर से निरंतर चला आ रहा है और वह ययाति जैसे तपस्वियों को भी अर्श से फर्श पर गिरा देता है ।

ययाति घोर तपस्या के पश्चात् स्वर्ग पहुंचे, क्योंकि उन्हें ब्रह्मलोक में विचरण करने का वरदान प्राप्त थास जो देवताओं की ईर्ष्या का कारण बना । एक दिन इंद्र ने ययाति की प्रशंसा की तथा उस द्वारा किए गये जप–तप के बारे में जानना चाहा । ययाति आत्म–प्रशंसा सुन फूले नहीं समाए और अपने मुख से अपनी प्रशंसा करने लगे । इंद्र ने ययाति को आसन से उतर जाने को कहा, क्योंकि उसने ऋषियों, गंधर्वों, देवताओं व मनुष्यों की तपस्या का तिरस्कार किया और वे स्वर्ग से नीचे गिर गए । परंतु उसके अनुनय–विनय पर इन्द्र ने उसे सत्पुरुषों की संगति में रहने की अनुमति प्रदान कर दी ।

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सो, आत्मप्रशंसा से बचने का उपाय है मौन, जो प्रारंभ में तो कष्टसाध्य प्रतीत होता है । परंतु धीरे–धीरे श्वास व शब्द को साधने से हृदय की चंचलता समाप्त हो जाती है और चित्त शांत हो जाता है । आती–जाती श्वास को देखने पर मन स्थिर होने लगता है और मानव को उसमें आनंद आने लगता है । यह वह दिव्य भाव है, जिससे चंचल मन की समस्त वृत्तियों पर अंकुश लग जाता है । मानव अपना समय निरर्थक संवाद व तेरी–मेरी अर्थात् पर–निंदा में समय नष्ट नहीं करता । मौन की स्थिति में मानव आत्मावलोकन करता है तथा वह संबंध–सरोकारों से ऊपर उठ जाता है । इस स्थिति में अपेक्षा–उपेक्षा के भाव का भी शमन हो जाता है । जब व्यक्ति को किसी से अपेक्षा अथवा उम्मीद ही नहीं रहती, फिर विवाद कैसा ? उम्मीद सब दुखों की जननी है । जब मानव इससे ऊपर उठ जाता है, तो भाव–लहरियां शांत हो जाती हैं संशय व अनिर्णय की स्थिति पर विराम लग जाता है । परिणामतः मानसिक द्वंद्व को विश्राम प्राप्त होता है और दैवीय गुणों स्नेह, करूणा, सहानुभूति, त्याग आदि के भाव जाग्रत होते हैं । उसे संसार में हम सभी के तथा सब हमारे नजÞर आते हैं तथा ‘सर्वेभवन्तु सुखीनाम्’ का भाव जाग्रत होता है ।

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मानव हरि चरणों में सर्वस्व समर्पित कर मीरा की भांति ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूजो न कोय’ अनुभव कर सुकÞून पाता है । इस स्थिति में सभी भाव–लहरियों को अपनी मंजिÞल प्राप्त हो जाती है तथा अहं का विगलन हो जाता हो, जो सभी दोषों की जड़ है । अहं हमारे अंतर्मन में सर्वश्रेष्ठता का भाव उत्पन्न करता है, जो आत्म–प्रशंसा का जनक है । अपने गुणों के बखान करने के असाध्य रोग से वह चाह कर भी मुक्ति नहीं प्राप्त कर सकता । वह न तो दूसरे की अहमियत स्वीकारता है न ही उसके द्वारा प्रेषित सार्थक सुझावों की ओर ध्यान देता है । सो वह गलत राहों पर चल निकलता है । यदि कोई उसके हित की बात भी करता है, तो वह उसे शत्रु–सम भासता है और वह उसका निरादर कर संतोष पाता है । उसके शत्रुओं की संख्या में निरंतर इजÞापÞmा होता जाता है ।

एक लम्बे अंतराल के पश्चात् जब उसका शरीर क्षीण हो जाता है और वह एकांत की त्रासदी झेलता हुआ तंग आ जाता है, तो उसे अपने घर व परिवारजनों की स्मृति आती है । वह लौटना चाहता है, अपनों के मध्य’ परंतु उसके हाथ निराशा ही लगती है और उसे प्रायश्चित करने के अतिरिक्त अन्य विकल्प नजÞर नहीं आता । वह सांसारिक ऊहापोह व मायाजाल से निजÞात पाना चाहता हैस चैन की सांस लेना चाहता है, परंतु यह उसके लिए संभव नहीं होता । उसे लगता है, वह व्यर्थ ही धन कमाने हित उचित–अनुचित राहों पर चलता रहा, जिसकी अब किसी को दरकÞार नहीं । वह न पहले शांत था, न ही उसे अब सुकÞून प्राप्त होता है । वह शांति पाने का हर संभव प्रयास करता रहा, परंतु अतीत की स्मृतियां गÞाहे–बेगÞाहे उसके हृदय को उद्वेलित–विचलित करती रहती हैं । वह चाह कर भी इनके शिकंजे से मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता । अंत में इस जहान से रुख्स्त होने से पहले वह सबको इस तथ्य से अवगत कराता है कि सुख–शांति अपनों के साथ है । सो संबंधों की अहमियत स्वीकारो ‘आत्मप्रशंसा की भूल–भुलैया में फंस कर अपना अनमोल जीवन नष्ट न करो । सच्चे दोस्त संजीवनी की तरह होते हैं, उनकी तलाश करो । वे हर आकस्मिक आपदा व विषम परिस्थिति में आपकी अनुपस्थिति में भी आपकी ढाल बन कर खड़े रहते हैं ।

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