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विभेद ही विद्रोह को जन्म देता है : प्रहलाद गिरी

 

 

Pralad Giri
प्रहलाद गिरी, प्रदेश सांसद् (प्रदेश नं. २)

हिमालिनी, अंक अक्टूबर 2020 | प्रहलाद गिरी, आज के दिन प्रदेश नं. २ के निर्वाचित सांसद् एवं जनता समाजवादी पार्टी के केन्द्रीय सदस्य हैं । लेकिन आप को पर्सा क्षेत्र नं. ३(ख) निर्वाचित जनप्रतिनिधि एवं एक राजनीतिक कहना ही पर्याप्त नहीं हैं । आप के साथ जो राजनीतिक अनुभव, ऐतिहासिक, पृष्ठभूमि एवं संघर्ष है, उससे स्पष्ट होता है आप एक विद्रोही योद्धा भी हैं । आप का जन्म वि.सं. २००७ साल पर्सा जिला स्थित जगरनाथपुर गांवपालिका–६ माधवपुर में हुआ है । आप के पिता जी का नाम स्व. ललन गिरी और माता जी का नाम कैलाशदेवी गिरी है । प्रस्तुत है– हिमालिनी जीवन–सन्दर्भ में आप की संघर्षपूर्ण जीवन–गाथा–

प्रस्तुतिः लिलानाथ गौतम

धार्मिक स्वभाव का बचपन

मध्यम वर्गीय जमीनदार परिवार में मेरा जन्म हुआ है । मेरे पिता जी और दादा जी जमीनदार थे । पिता जी के कार्यकाल में ही हम लोग धीरे–धीरे आर्थिक रूप में कमजोर पड़ गए । लेकिन अधिक कमजोर नहीं थे, अपनी खेतीबारी से जीवन सहज चलता था । मेरे पिता जी ने ३ शादी की थी, सभी (मां) से मिलाकर हम लोग १० भाई हैं । अपनी मां की तरफ से हम लोग ४ भाई हैं, उसमें मैं दूसरे नम्बर का हूँ ।
मेरा बचपन रोचक और दिलचस्प नहीं है । गांव पिछड़ा हुआ था, उस समय समाज के सभी लोगों में शिक्षा–दीक्षा की पहुँच नहीं होती थी । लेकिन मध्यम वर्गीय जमीनदारी पृष्ठभूमि के होने के कारण मुझे वह अवसर मिल गया । गांव के अन्य बच्चों तरह मैं भी पला–बढ़ा । बचपन में मैं धार्मिक स्वभाव का था । अभी आकर सोचता हूं कि अगर कम्युनिष्ट लोगों से मेरी निकटता नहीं रहती और राजनीति में प्रवेश नहीं किया होता तो संभवतः आज आप लोग मुझे धार्मिक गुरु के रूप में जानते होते, मैं धार्मिक प्रवचन दे रहा होता । अगर धार्मिक गुरु ही बन गया होता तो मैं अनुमान करता हूं कि हिन्दू धर्म में जो परम्परागत विकृतियां है, उसके विरुद्ध प्रवचन देता ।
हां, बचपन में दैनिक स्नान करना, पूजापाठ करना मेरी आदत थी । विशेषतः मैं हनुमान–चालीसा का पाठ करता था । माता–पिता जी भी धार्मिक प्रवृत्ति के ही थे । मेरे इसतरह के चरित्र को देखकर वे लोग खुश होते थे । यहां तक कि आध्यात्मिक अभ्यास के लिए मैं ६ साल तक शाकाहारी भी रहा । संभवतः मैं उस समय १२–१३ साल का था ।

कम्युनिष्६ के प्रति आकर्षण
सामान्यतः आजकल के आम बच्चे मारपीट, चोरी, छेड़खानी जैसे गतिविधियों में संलग्न होते हैं । लेकिन मुझ में ऐसी आदत नहीं थी । यहां तक कि किसी लड़की के सामने सर उठाकर भी मैं बात नहीं कर सकता था । जब कैंपस जीवन शुरु हो गया, तब जाकर कम्युनिष्ट राजनीति करनेवालों के सम्पर्क में आ गया और उन लोगों का प्रभाव मुझ पर पड़ा । एक प्रकार से उन लोगों के नारे और राजनीतिक दर्शन के प्रति आकर्षित हो गया ।

कम्युनिष्ट लोग नेपाल की गरीबी और इसका कारण बताते थे । माओ से–तुंग, लेनिन जैसे कम्युनिष्ट नेता द्वारा लिखित किताब पढ़ने को मिल जाता था । अध्ययन करने के बाद मुझे भी लगा कि चीन और भारत जैसे विशाल देश के बीच में नेपाल है, तो यह देश आर्थिक रूप में समृद्ध होना चाहिए । नेपाल के पिछड़ापन के लिए मैंने यहां की शासन व्यवस्था को कारण मान लिया । इसमें आमूल परिवर्तन के लिए मैंने कम्युनिष्ट पार्टी को ही उपर्युक्त विकल्प ठाना और कम्युनिष्ट राजनीति से जुड़ गया ।

शैक्षिक और राजनीतिक यात्रा
प्रारम्भिक शिक्षा अपने गांव के प्राथमिक स्कूल से शुरु हुई । स्कूल जीवन में मैं पढ़नेवाले विद्यार्थियों में से एक था । कक्षा ५ तक मैंने गांव के ही स्कूल (बाद में उसका नाम नेपाल राष्ट्रीय प्राथमिक विद्यालय रखा गया), में पढ़ा । उसके बाद मैं पद्मोदय स्कूल में गया, जहां मैंने कक्षा ७ तक अध्ययन किया । उसके बाद बिहार (भारत) पश्चिम चम्पारण स्थित मामा–घर चला गया । भारत से ११ कक्षा उत्तीर्ण होने के बाद मैं पुनः वीरगंज स्थित ठाकुरराम बहुमुखी कैंपस में भर्ती हो गया । यहां आने के बाद मैं पढ़ाई से अधिक राजनीति में सक्रिय रहा । यह वि.सं. २०२६–२०२७ साल की बात है ।

उस समय नेपाली कांग्रेस निकट संबंद्ध नेपाल विद्यार्थी संघ (नेविसंघ) और कम्युनिष्ट पार्टी संबंद्ध अखिल के बीच घम्सा–घम्सी होना आम बात होती थी । झापा आन्दोलन से पहले नेपाल की वामपन्थी आन्दोलन में भारत का सीपीआईएमएल अर्थात् चारु मजुमदार का प्रभाव पड़ा । उस का नारा था– बुर्जुवा संगठनों का बहिष्कार करो । मजदूर, किसान और विद्यार्थी संगठन का निर्माण भी उसी समय तेजी से हो रहा था । विद्यार्थियों के बीच स्ववियु चुनाव की बात हो रही थी । लेकिन हम लोगों का समर्थन नहीं था । साथ में विद्यार्थियों का एकीकृत विधान भी नहीं था, हर कालेज का अपना–अपना विधान था ।

ठाकुरराम कैंपस के विधान अनुसार यहां सभापति के उम्मीदवार वही हो सकते थे, जो बीए प्रथम वर्ष में अध्ययनरत विद्यार्थी हों । हम लोग आईए के विद्यार्थी थे । संभवतः कम्युनिष्ट पार्टी से बीए में अध्ययनरत विद्यार्थी ना होने के कारण ही नेविसंघ में आवद्ध एक विद्यार्थी (बाबुलाल कोहर) से हम लोगों ने कहा कि आप ही हमारी ओर से उम्मीदवार हैं, हम लोगों की ओर से आप को चुनाव में उम्मीदवारी देना होगा ।
लेकिन इसमें नेविसंघ ने आपत्ति प्रकट की । उन लोगों का कहना था कि बाबुलाल हमारे उम्मीदवार हैं, हम लोग कहते थे– यह तो हमारे उम्मीदवार हैं । इसी झगड़ा के कारण उस साल चुनाव नहीं हो पाया । जगतमोहन अधिकारीजी प्रिन्सिलपल थे, हमारे झगड़ा को देखकर उन्होंने कहा– हमारा विधान ही ठीक नहीं है, आप लोग विधान चेन्ज कीजिए । विधान परिवर्तन कर चुनाव करना है या पुराने ही विधान को यथावत रखना है ? इसी विषय को लेकर चुनाव हो गया । कांग्रेस पक्षधर विद्यार्थीगण पुराने ही विधान के पक्ष में थे और हम लोग परिवर्तन के पक्ष में । चुनाव हम लोगों ने जीत लिया । लेकिन विद्यार्थी संगठनों का चुनाव होने से पहिले ही मैंने कैंपस छोड़ दिया । उसके बाद फिर मैं महाराजगंज (भारत) स्थित मेडिकल इन्स्च्यिूट में जाकर भर्ती हो गया । २ साल अध्ययन करने के बाद मैं नेपाल वापस हो गया और नौकरी करना शुरु किया ।

स्वास्थ्य क्षेत्र में नौकरी
वि.सं. २०३० साल की बात है । स्वास्थ्य विभाग अन्तर्गत अहेब (कर्मचारी) के रूप मैंने नौकरी शुरु की, अस्थाई कर्मचारी के रूप में मुझे सुनसरी जिला भेज दिया गया । वहां एक साल रहने के बाद मैं पुनः अपने जिला (पर्सा) आया और निचुटा हेल्थपोस्ट में रहकर काम किया । उस समय मैं ठाकुरराम कैंपस का भी विद्यार्थी था । नेकपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व प्रधानमन्त्री माधव कुमार नेपाल भी ठाकुराम कैंपस के ही विद्यार्थी थे । मैं और नेपाल जी दोस्त थे । नेपाल जी कामर्स के विद्यार्थी थे और मैं आर्टस् का । देश में तत्कालीन पंचायती शासन के विरुद्ध आन्दोलन हो रहा था, जिसका प्रभाव मुझ पर पड़ा । मैं वामपन्थी आन्दोलन के प्रति प्रभावित हो रहा था । परिणामतः मैं वामपन्थी विद्यार्थी संगठनों में आबद्ध हो कर आन्दोलन में शामिल हो गया । वि.सं. २०३२ साल में हम लोगों के विरुद्ध राजकाज (राज्य विरुद्ध गतिविधि करने का आरोप) मुद्दा लग गया ।

जेल जीवन की कुछ घटनाएं
तत्कालीन अंचलाधीश कार्यालय से हम लोगों को राजकाज मुद्दा लगाया था । उस समय मेरे साथ केदार न्यौपाने, पवनकुमार मुडभरी, विष्णुदेव यादव जैसे ७–८ नेता जेल में थे । उसी समय चितवन से गिरफ्तार अमिक शेरचन समूह के ७–८ नेता भी हमारे जेल में ही आ गए । वे लोग मशाल समूह के थे, हम लोग झापा आन्दोलन के लाइनवाले थे । स्पष्ट रूप में हम लोग दो समूहों में विभाजित वापपन्थी थे । तब भी आपस में वैमनस्यता नहीं थी । लेकिन चितवन से ही आनेवाले समूह में एक व्यक्ति थे– रेशम बिरही ।

अमिक शेरचन समूह के लोग कहते थे कि बिरही ‘सीआईडी’ है, इन्होंने हमलोगों को गिरफ्तार करवाया है । उसके साथ हम लोगों को ज्यादा लेना–देना तो नहीं था, लेकिन सीआईडी अर्थात् पंचायत की ओर परिचालित जासूस का आरोप होने से कुछ सतर्क भी थे । एक दिन अमिक शेरचन के ही समूह ने बिरही के साथ मारपीट किया, हम लोगों ने कोई भी हस्तक्षेप नहीं किया ।

उस घटना के कुछ दिनों के बाद जेल के भीतर रहे कांग्रेस समर्थक दो समूह के बीच मारपीट शुरु हो गई । कांग्रेस के प्रति आस्थावान और कम्युनिष्ट के प्रति आस्थावान दो समूह के लिए अलग–अलग रुम की व्यवस्था थी । हो–हल्ला होने के कारण हम लोग देखने के लिए चले गए, लेकिन हस्तक्षेप नहीं किया । समान उद्देश्य प्राप्ति के लिए एक ही पार्टी से आबद्ध जो नेता कष्टकर जेल जीवन बिता रहे हैं, तब भी आपस में मारपीट कर रहे हैं । इसतरह के झगड़ा को देखकर हम लोगों ने मूल्यांकन किया– यह कांग्रेसी चरित्र है, ऐसे लोग क्या देश बनाएंगे ? शाम का समय था । ऐसी ही चर्चा–परिचर्चा करते हुए हम लोग सो गए ।

इसी तरह हमारे बीच में निजगढ़ स्थायी निवासी नारायण पराजुली नाम के एक व्यक्ति थे, उनका भौतिक शरीर अब इस दुनियां में नहीं है । लेकिन राजनीतिक जीवन को याद करता हूं तो उनकी भी याद आ जाती है । क्योकि उन्होंने ही हम लागों के विरुद्ध प्रशासन में उजुरी देकर गिरफ्तार करवाया था । मजे की बात तो यह है कि हमलोगों के जेल में रहते वक्त भी पराजुली हमारे साथ मित्र बनकर भेट करने के लिए आते थे । हम लोग जानते थे कि पंचायत की ओर नियुक्त जनसंपर्क अधिकारी पराजुली को सूचना प्राप्ति के लिए हमारे पास भेजते हैं ।
इसी बीच में जेल में रहे साथियों के बीच सलाह हो रही थी कि हम लोग जेल तोड़कर भाग चलते हैं । लेकिन आपसी विश्वास और आत्म–विश्वास मजबूत नहीं हो पाया । तब भी सलाह के अनुसार पवनकुमार मुडभरी जी को हम लोगों ने जेल से भगा दिया । इसके लिए हम लोगों ने पराजुली को ही यूज किया । जेलर परमानन्द खरेल (स्व.) भी थोड़ा उदार चरित्र के थे । जब पराजुली हम लोगों से मिलने के लिए आते थे, हम लोग बाहर निकलते थे । उसी समय जेलर खरेल की नजर से छिपाकर हम लोगों ने मुडभरी जी को जेल के दिवार से बाहर भेज दिया था । जब बाद में मुडभरी जी जेल में नहीं दिखाई दिए तो हंगामा हो गया ।

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हम लोगों का मूल्यांकन रहा– पराजुली पंचायत का भत्ता खाकर बाहर घूम रहा है, क्यों इसको इसतरह घूमने दें ? यही मानसिकता के साथ हम लोगों ने जेलर से कहा– ‘पराजुली हरदम यहां आते हैं, फुसुर–फुसुर करते हैं । हम लोगों को लगता है कि मुडभरी को जेल से भगानेवाले पराजुली ही हैं । ’

मदिरा में मस्त जेलर कैदी भागने के कारण तनाव में पड़ गया था । उसने भी कहा– ‘हां मुझे भी यही आशंका है, पराजुली ने ही मुडभरी को भगाया है ।’ उसके बाद तत्काल पुलिस परिचालित की गई, पराजुली को गिरफ्तार कर लाया गया और हम लोगों के साथ ही रखा गया । लगभग ३ महीना हम लोग साथ–साथ जेल में रहे ।

कर्मचारी, डाक्टरी और विद्रोही भूमिका में
जेल जाने के बाद मेरी नौकरी चली गई थी । लगभग १ साल से भी अधिक समय मैं जेल में रहा । वि.सं. २०३४ साल के आसपास मैं जेल से निकल गया । कोई अपने ही आदमी थे, उनके सहयोग से मैं पोखरा चला गया, वहां पंचायत विकास प्रशिक्षण केन्द्र था । जहां विभिन्न विषयों में तालीम दिया जाता था । वि.सं. २०३५ साल आश्विन महीने की बात है । मुझे उसी प्रशिक्षण केन्द्र में नौकरी मिल गई । स्वास्थ्य प्रशिक्षक कर्मचारी के रूप में मुझे भर्ती मिली थी ।

मेरी पृष्ठभूमि वामपन्थी आन्दोलन से जुड़ी हुई थी, इसीलिए कम्युनिष्ट आन्दोलन से जुड़े हुए विभिन्न व्यक्ति मेरे साथ मिलने के लिए आते थे । आज के दिन नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी के उपाध्यक्ष रहे वामदेव गौतम, नेता खगराज अधिकारी, सोमनाथ प्यासी जैसे नेताओं से मेरी मुलाकात होती रहती थी । मैं नौकरी भी करता था और भूमिगत रूप में पार्टी के लिए काम भी करता था । अर्थात् सरकार की दृष्टिकोण एवं मुझे जाननेवाले अधिकांश लोगों के लिए मैं एक सरकारी कर्मचारी था, लेकिन राजनीतिक दृष्टिकोण से मैं एक विद्रोही था, जो तत्कालीन सरकार एवं सत्ता के विरुद्ध काम करता था ।

पोखरा में रहते वक्त मैंने तत्कालीन नेकपा माले से संगठित सदस्यता प्राप्त की । इसी बीच में वि.सं. २०३६ साल का जनमत संग्रह भी हुआ था । वि.सं. २०३९ साल में मेरी नौकरी पुनः चली गई । फाल्गुन महीना था, मैं घर लौट आया । उसी समय मेरे पिता जी को लिभर का कैंसर हो गया । वि.सं. २०४० साल बैशाख महीना में पिता जी स्वर्गबास हो गए । उसके १ महीना ५ दिनों के बाद माता जी का भी स्वर्गबास हो गया । यह मेरे लिए एक बहुत ही दुखद घटना रही । वैदिक परम्परा अनुसार मृत्यु संस्कार खतम होने के बाद मैं नेपालगंज चला गया, जहां (कोहलपुर में) मैंने एक क्लिनिक खोल लिया, जो एक प्रकार से कई लोगों के लिए डाक्टरी भी थी । अर्थात् लोग डॉक्टर समझकर मेरे पास आते थे । लेकिन मैं डाक्टर नहीं था, इसीलिए मैंने उतना ही उपचार किया, जितना मैं सहज रुप में कर सकता था । अगर जटिल केस आता था तो मैं अस्पताल में जाने के लिए सिफारिश कर देता था ।

पुनः जिला वापस
सिर्फ एक साल मैंने क्लिनिक संचालन किया । क्लिनिक संचालन के साथ–साथ मैं भूमिगत रूप में पार्टी के लिए भी काम करता था । एक साल बाद क्लिनिक बंद कर मैं पुनः अपने ही जिला–पर्सा) वापस हो गया । जिला वापस होने के बाद मैं तत्कालीन नेकपा माले जिला कमिटी में आबद्ध रहकर राजनीति में क्रियाशील रहा । इसीबीच में वि.सं. २०४६ साल का जनआन्दोलन शुरु होने लगा । हम लोग पंचायती व्यवस्था के विरुद्ध खुलकर आन्दोलन में सहभागी होने लगे । हमारे घर बोर्डर से करीब में ही है । इसीलिए कई बार सुरक्षित रहने के लिए हम लोग भारत की ओर चले जाते थे । हमारे सारा नाता–गोता और ससुराली उधर (भारत) ही है । इसीलिए आश्रय देनेवाले बहुत सारे होते थे और आज भी हैं ।

पर्सा और कम्युनिष्६ पार्६ी निर्माण का आधार
वि.सं. २०४७ साल में बहुदलीय व्यवस्था लागू हो गई, पार्टी भूमिगत से खुला राजनीति में आया । उसी समय कम्युनिष्ट पृष्ठभूमि के नेकपा माले और तत्कालीन माक्र्सवादी पार्टी को मिला कर नेकपा एमाले नामक नयां पार्टी गठन हो गया । पार्टी एकीकरण होने के बाद आयोजित प्रथम अधिवेशन से मैं नेकपा एमाले पर्सा जिला के लिए निर्वाचित सचिव बन गया । उस समय जिला के लिए सचिव ही प्रथम व्यक्ति होता था । वि.सं. २०४८ साल में सम्पन्न संदीय चुनाव में मैंने पार्टी की ओर से पर्सा निर्वाचन क्षेत्र नं. ३ से उम्मीदवारी दी, लेकिन बाद में बाम तालमेल के कारण पार्टी निर्णय से ही मुझे वापस होना पड़ा ।

फिर वि.सं. २०४९ साल में स्थानीय चुनाव हो गया । उसमें मैं उप–सभापति का उम्मीदवार था । कांग्रेस के विरुद्ध हम लोगों ने राप्रपा से चुनावी तालमेल किया था । लेकिन कांग्रेसी धांधली के सामने हम लोगों को पराजित होना पड़ा । वि.सं. २०५१ साल में सम्पन्न संसदीय मध्यावधि चुनाव में मैंने भी उम्मीदवारी दी, उसमें मैं तीसरे नम्बर पर रहा । उसके बाद मैंने अपने निर्वाचन क्षेत्र में केन्द्रीत रहकर काम करना शुरु किया ।

वि.सं. २०४७ साल में बहुदल आने के बाद सारे पुँजीपति लोग कांग्रेसी हो गए, जो कांग्रेसी नहीं हो सके, वे लोग राप्रपा हो गए । हम लोग ठहरे– कम्युनिष्ट । कमजोर और निचले तह में रहनेवाले लोगों को समेटकर हम लोगों को पार्टी निर्माण करना था । इसके लिए कड़ी मेहनत की जरुरत थी, मैंने किया भी । यूं कहें तो पर्सा जिला में नेकपा अर्थात् कम्युनिष्ट का जो जनाधार हैं, उसमें महत्वपूर्ण योगदान करनेवालों में से मैं भी हूं ।

उदाहरण के लिए वि.सं. २०५४ की चुनाव को ले सकते हैं । उस चुनाव पहले पर्सा निर्वाचन क्षेत्र नं. ३ में कांग्रेस प्रथम, राप्रपा द्वितीय और एमाले तीसरे स्थान पर था । लेकिन चुनाव में नेकपा एमाले प्रथम स्थान में आ गई । २८ गांवपालिकाओं में से हम लोगों ने १२ गांवपालिका में जीत हासिल की, कांग्रेस ८ में सीमित हो गई, राप्रपा को एक प्रकार से गायब होना पड़ा । वि.सं. २०५६ साल में फिर संसदीय चुनाव हो गया । उसमें भी मैं पर्सा–३ से उम्मीदवार रहा । पर्सा–१ में नेपाली कांग्रेस की ओर से कृष्णप्रसाद भट्टराई उम्मीदवार बन कर आए थे । कांग्रेस ने बताया था कि भट्टराई जी भावी प्रधानमन्त्री के उम्मीदवार हैं । इसीलिए पर्सा जिला में ऐसे प्रमुख जिला अधिकारी और पुलिस प्रमुख आ गए, जो कांग्रेस को चुनाव जिताने के लिए प्रतिबद्ध थे । उसका प्रभाव पूरा पर्सा जिला में पड़ गया । मैं ईमानदार रूप में प्रजातान्त्रिक अभ्यास में विश्वास रखता था । लेकिन चुनाव प्रजातान्त्रिक मूल्य–मान्यता से नहीं हो पाया । अगर उस समय ईमानदार प्रजातान्त्रिक अभ्यास किया होता तो मैं दावे के साथ कहता हूं कि पर्सा के तीन निर्वाचन क्षेत्र से एमाले के उम्मीदवार जीत जाते थे । लेकिन प्रशासन और कांग्रेसीजनों की धाँधली से ऐसा नहीं हो पाया । मुझे भी पराजित होना पड़ा । लेकिन आज जनता जग चुकी है, अब नेकपा और कांग्रेस जैसे बेइमान कम्युनिष्ट से विश्वास टूटता जा रहा है ।

पार्टी जिम्मेदारी से बाहर
वि.सं. २०५१ साल में सम्पन्न चुनाव के बाद नेकपा एमाले नेतृत्व में सरकार बन गया । उसके बाद मैं पार्टी की जिम्मेदारी से बाहर निकल गया । अर्थात् पार्टी निर्णय अनुसार ही मैं हेटौडा सिमेन्ट कारखाना में बोर्ड आफ डाइरेक्टर बन गया । लगभग ७ महीना मैं वहां बोर्ड आफ डाइरेक्टर रहा । सरकार चेन्ज होते ही मुझे इस्तीफा देना पड़ा ।

वि.सं. २०५४ साल में ही मैं वीरगंज चीन कारखाना में भी बोर्ड आफ डाइरेक्टर के मेम्बर बन गया था । यहां की एक घटना स्मरणीय है । भ्रष्टाचार संबंधी एक मुद्दा आया था । रकम ज्यादा नहीं थी, कुछ हजार में था । लेकिन किसान के साथ जुड़ा हुआ मुद्दा था । किसान गन्ने का उत्पादन करते हैं, मिल को लाकर देते हैं और अपना पेमेन्ट लेकर जाते हैं । लेकिन मिल में लेखा–शाखा में रहनेवाले कर्मचारी उन लोगों के ऊपर घोटाला करते थे । ऐसी ही एक घटना सुनने में आयी । बताया गया कि किसान को जो रकम मिलना चाहिए, वह नहीं मिल रहा है और उस रकम को खानेवाले व्यक्ति लेखा शाखा के कर्मचारी हैं ।

कर्मचारी और किसान का नाम आज भूल गया हूं । लेकिन मैंने ही उस कर्मचारी को कारवाही के लिए प्रस्ताव किया । मील प्रशासन और कर्मचारी युनियन की ओर से भारी दबाव था कि कर्मचारी के ऊपर कोई भी कारवाही नहीं की जाए । अन्ततः हम लोग जीत गए और भ्रष्टाचार में संलग्न कर्मचारी पर कारवाही की गई । आज तो इसतरह का भ्रष्टाचार करोड़ो में होता है, तब भी कारवाही नहीं होती । खैर ! इसतरह पार्टी की औपचारिक जिम्मेदारी से बाहर रहते हुए भी मैं पार्टी काम में भी सक्रिय रहता था ।

एमाले के प्रति वितृष्णा
माओवादी जनआन्दोलन शुरु हो चुका था । नेपाल की राजनीति दिन–प्रति–दिन संकटपूर्ण परिस्थिति से गुजर रही थी । वि.सं. २०५८ साल में दरबार हत्याकाण्ड हो गई, धीरे–धीरे तत्कालीन राजा ज्ञानेन्द्र शाह ने सत्ता अपने हाथ में लिया । तत्कालीन नेपाली कांग्रेस और नेकपा एमाले सहित ७ राजनीतिक दल सड़क संघर्ष में उतर गए । संघर्ष के दौरान ही नेकपा एमाले ने राजदरबार घेरो कार्यक्रम आयोजन किया । यह वि.सं. २०६१ साल की बात है । आन्दोलन में सहभागी होने के लिए मैं भी वीरगंज से सार्वजनिक बस में यात्रा कर काठमांडू आया । लेकिन रास्ते (नागढुंगा) में ही मैं बेहोश हो गया । बाद में पता चला कि मुझे हृदयघात (हार्टहट्याक) हो गया था । डाक्टरों की सलाह अनुसार कुछ दिनआराम किया । उसके बाद मैंने पार्टी में प्रस्ताव रखा कि मेरे उपचार के लिए पार्टी से फन्ड (रकम) मिलना चाहिए । मैं पार्टी के पूर्णकालीन कार्यकर्ता था, प्रथम पर्सा जिला अध्यक्ष (तत्कालीन सचिव) भी था । माधव नेपाल, वामदेव गौतम, केपीशर्मा ओली जैसे नेताओं से व्यक्तिगत संबंध सुमधुर था । मुझे लगा कि मैंने अपना सम्पूर्ण जीवन पार्टी को समर्पित किया है तो पार्टी की ओर से उपचार खर्च तो मिलना ही चाहिए ।

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यही मान्यता के साथ मैंने अपना प्रस्ताव रखा था । लेकिन मेरा प्रस्ताव स्वीकार्य नहीं हो सका । सत्ता राजा के हाथ में थी, लेकिन प्रतिगमन में आधा करेन्सन आया है कहते हुए एमाले भी सरकार में शामिल हो गई थी । ऐसे समय में सरकार की ओर से ही मुझे उपचार खर्च मिलनी चाहिए थी । लेकिन नहीं मिला । मैंने अपने व्यक्तिगत खर्च में ही उपचार किया । दशहरा का समय था । कुछ ही दिनों के बाद मैंने देखा कि मन्त्रिपरिषद् निर्णय से कुछ पार्टी कार्यकर्ताओं को ५० हजार से डेढ लाख तक दिया गया । इसतरह पैसा पानेवाले कांग्रेस और एमाले के कार्यकर्ता ही थे । दशहरा के नाम में दारु–मांस खाने के लिए, जुवा खेलने के लिए पैसा वितरण करनेवाली सरकार मेरी जीवन रक्षा के लिए कुछ नहीं कर पाया । यही से पहली बार मुझे एमाले और पार्टी के नेताओं के प्रति वितृष्णा शुरु होने लगी । मुझे यह भी लगा कि मधेशी होने के कारण मेरे साथ विभेद किया जा रहा है । मैंने देखा कि जो नेतागण वि.सं. २०४६ साल से पहले हमारे पैसा से नास्ता करते थे, उन लोगों का काठमांडू में महल बन चुका था । कम्युनिष्ट चरित्र और आदर्श उन लोगों में नहीं दिखाई दे रही थी । इसीलिए धीरे–धीरे मैं पार्टी से दूर होने लगा । कुछ साल तक राजनीति में निष्क्रिय रहा ।

अपने ही नेतृत्व में सशस्त्र समूह
वि.सं. २०६३–०६४ में मधेश आन्दोलन शुरु होने लगा, तब मैं उस आन्दोलन में सहभागी हो गया । उस समय मेरा विश्लेषण रहा कि खसवादी ब्राह्मण–क्षेत्री, जो शासक वर्ग है, यह मधेशी जनता के विरोधी हैं और मधेशी जनता को अधिकार सम्पन्न बनाना नहीं चाहते हैं । मुझे लगा कि यह लोग मधेशी को नेपाली स्वीकार नहीं कर रहे हैं । मेरी यही मानसिकता मुझे आन्दोलन की ओर खींच रही थी । उस समय मेरा संपर्क तत्कालीन आन्दोलन के नेतृत्वकर्ता उपेन्द्र यादव से लेकर भूमिगत समूह जनतान्त्रिक तराई मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष जयकृष्ण गोइत जी से भी हो रहा था ।

मैंने ठान लिया– यह नश्लीय युद्ध है, नश्लीय युद्ध निर्मम होता है । नश्लीय युद्ध में एक नश्ल के व्यक्ति शासक होते है और दूसरे नश्ल के व्यक्ति शासित । नेपाल में यही हो रहा है, अर्थात् पहाडी वर्ग शासक और मधेशी शासित । मुझे लगा कि वर्गीय उत्पीडन से अधिक खतरनाक नश्लीय उत्पीडन है, वर्गीय युद्ध से अधिक खतरनाक नश्लीय युद्ध है । वर्गीय युद्ध में एक ही जाति के लोग शासक और शासित होते हैं, यहां दमन होता भी है तो कुछ दयाभाव होती है । लेकिन नश्लीय युद्ध में निर्मम दमन और विभेद होता है, आपस में भावनात्मक लगाव नहीं रहता । अफ्रीका और श्रीलंका में जो नश्लीय युद्ध हुआ, वही इतिहास नेपाल में दुहराया तो नहीं जा रहा है ? मुझे इसकी चिन्ता होने लगी । जिस तरह मधेशियों के साथ दमन और विभेद हो रहा है, यह भी उसका ही संकेत मिल रहा था । यही विश्लेषण के साथ मैंने संघर्ष करने को ठान लिया ।

मैंने बहुत सारे कम्युनिष्ट दर्शन से जुड़े हुए पुस्तक अध्ययन किया है । यहां मुझे माओ से–तुङ का एक कथन याद आ रहा है– राजनीतिक सत्ता का जन्म बंदुक की नाल से होती है । मधेश आन्दोलन को भी मैंने इसीतरह मूल्यांकन किया और कहा– यह भी एक राजनीतिक लडाई है, मधेश और मधेशियों के साथ विभेद है तो बन्दूक उठाना ही पड़ेगा । इसीलिए मैं भूमिगत सशस्त्र समूह संचालन करनेवाले गोइत जी के पास चला गया । यह वि.सं. २०६३ फागुन महीने की बात है ।

गोइत जी का मूल उद्देश्य ‘स्वतन्त्र मधेश’ है । कुछ समय के बाद मुझे पता चला कि उद्देश्य अनुसार उनके पास कोई भी रणनीति, संगठन निर्माण और परिचालन की क्षमता नहीं है । मैंने पाया कि गोइत जी बहुत ही ‘कन्जरभेटिभ’ विचार के व्यक्ति हैं । इसीलिए मैंने उन का साथ छोड़ दिया और अपना ही एक अलग संगठन निर्माण किया । उसको आम लोग ‘जनतान्त्रिक तराई मुक्ति मोर्चा पवन समूह’ के नाम से जानते थे । उसका नेतृत्व मैंने ही किया था । अर्थात् उस समय का ‘पवन’ मैं ही था । अभियान के दौरान तत्कालीन राज्य–संयन्त्र के विरुद्ध कुछ एक्सन भी लिया गया । सबसे अधिक तो जनता को राजनीतिक चेतना से सूसुचित किया ।

उस समय पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड प्रधानमन्त्री और वामदेव गौतम जी गृहमन्त्री थे । एक दिन गृहमन्त्री गौतम ने हम लोगों की ओर संकेत करते हुए कहा– यह सब आपराधिक लोग हैं, हम लोग दमन से ही इन लोगों को ठीक कर देंगे । उनके इस कथन ने हम लोगों को आक्रोशित बना दिया । घोषित रूप में ही हम लोग सशस्त्र युद्ध में थे, इसीलिए तत्कालीन गृहमन्त्री की अभिव्यक्ति के विरुद्ध हम लोगों ने पर्सा, सर्लाही जैसे कुछ जिलों के प्रशासनिक क्षेत्र में हमला किया, हिंसात्मक घटना हो गई ।

यद्यपि व्यक्तिगत रूप में बामदेव गौतम से मेरा संबंध सुमधुर था । ५ साल तक मैं उनके साथ ही रहा हूं । यहां तक भूमिगत युद्ध के समय में ही माधव नेपाल और केपी ओली जी से मेरी वार्ता होती रहती थी । वे लोग कहते थे कि आप लोगों को शान्तिपूर्ण राजनीति में आना ही होगा । मैं अपना विचार और तर्क देता रहा । कुछ समय इसतरह चलता रहा ।

हमारी चाहत थी कि जिसतरह माओवादी ने नेपाल में १० साल तक सशस्त्र युद्ध किया, उसीतरह हम लोग भी सशस्त्र युद्ध करें । लेकिन तराई–मधेश में जो भूमि है, वह सशस्त्र युद्ध के लिए सहज नहीं है । यहां कोई भी पहाडी इलाका नहीं है, जहां हम लोग छिप कर रह सकते हैं । हथियार–बंद लडाई के लिए ‘बेश–एरिया’ होना चाहिए, ताकि राज्य का कोई भी संयन्त्र सहज रूप में पहुँच ना पाए । लेकिन यहां ऐसी कोई भी भूमि नहीं है । यहां तो एक घंटे में जिला आर–पार किया जा सकता है ।

पुनः शान्तिपूर्ण राजनीति में
कुछ समय के बाद मुझे लगा कि ‘स्वतन्त्र मधेश’ प्राप्ति के लिए हमारे पास कोई भी पूर्वाधार नहीं है, अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थिति भी हमारे पक्ष में होने की संभावना नहीं है । दो विशाल देश भारत और चीन के बीच एक छोटा–सा देश है– नेपाल । ऐसी पृष्ठभूमि में ‘स्वतन्त्र मधेश’ निर्माण के लिए सहज परिस्थिति नहीं है, मुझे ऐसा ही लगने लगा । दूसरी बात मधेश और मधेशी जनता के पक्ष में वकालत करनेवाला कोई भी संचार माध्यम नहीं था, ताकि हम लोग अपने नीति और सिद्धान्त जनता के समक्ष सही ढंग से प्रस्तुत कर सके । ऐसी अवस्था में रहना मुझे ठीक नहीं लगा । इसीलिए पुनः जनता के बीच में आने का निर्णय लिया ।

हां, मैंने ठान लिया कि ‘स्वतन्त्र मधेश’ एवं ‘अलग देश’ संभव नहीं है तो कम से समावेशी चरित्र के एक सशक्त और संघीय नेपाल निर्माण किया जाए । यही सोच के साथ हम लोगों ने तत्कालीन शान्ति मन्त्री पम्फा भुसाल के साथ वार्ता की और पुनः खुला राजनीति में यू–टर्न हो गया । उस समय हम लोगों ने वार्ता के लिए राज्य की ओर से प्रस्तुत सम्पूर्ण शर्त स्वीकार किया, लेकिन हमारे साथ राज्य की ओर से बेइमानी हो गई । शर्त के अनुसार उस समय सशस्त्र युद्ध में शामिल हमारे कार्यकर्ताओं को जेल से मुक्त करना चाहिए था । लेकिन अभी तक वे लोग जेल में ही हैं ।

काठमांडू के सत्ता में रहनेवाले कांग्रेस हो या नेकपा, इन लोगों की इसी चरित्र के कारण आम मधेशी जनता उनके ऊपर विश्वास नहीं करते । नेपाल में ऐसे कुछ समुदाय हैं, जो नेपाल की राज्यसत्ता कब्जा करते हैं और बांकी समुदाय के ऊपर विभेद करते हैं । हमारे जो कार्यकर्ता आज जेल में हैं, यह हमारे लिए एक घांव है, यह घांव कभी भी विकराल बन सकता है । अर्थात् मधेश में पुनः विद्रोह हो सकता है ।
शान्तिपूर्ण राजनीति में अवतरण होने के बाद मैं तत्कालीन माओवादी पार्टी से निकट रहकर राजनीति में क्रियाशील रहा । जब नेपाल में संविधान घोषणा (वि.सं. २०७२ आश्वीन ३) हो रहा था, उस समय एक समुदाय के लोग जश्न मना रहे थे, वही मधेशी एवं आदिवासी समूह के लोग अर्थात् दूसरे समुदाय के लोग आँसू बहा रहे थे, खून बह रहा था । प्राविधिक रूप में संविधान के पक्ष में ९० प्रतिशत बहुमत दिखाई देती है । लेकिन कांग्रेस–एमाले–माओवादी ने ह्वीप जारी कर, जनप्रतिनिधियों को डरा–धमका कर संविधान जारी किया । नैतिक रूप में मुझे लगा कि मुझे माओवादी के साथ रहना ठीक नहीं है । इसीलिए विभेदकारी संविधान के विरुद्ध हम लोग भी आन्दोलन में उतर आए ।

जब तक जिंदगी, तब तक संघर्ष
उस समय मैंने फिर ठान लिया– जब तक जिंदगी है, तब तक लड़ना ही होगा । पहाड में रहनेवाले जनजाति और दलित के साथ हो या मधेश में रहनेवाले मधेश, थारु एवं मुस्लिम समुदाय के साथ, मुठ्ठी भर रहे शासक वर्ग से जो विभेद हो रहा है, उसके विरुद्ध लड़ने का निर्णय मैंने लिया । यही निर्णय के साथ मैंने तत्कालीन मधेशी जनअधिकार फोरम ज्वाइन किया और यही पार्टी में क्रियाशील रहा । यह वि.सं. २०७३ साल की बात है ।

वि.सं. २०७४ साल में संसदीय चुनाव की घोषणा हो गई । खुद के मूल्यांकन में मैं संघीय संसद् के लिए प्रतिस्पर्धी व्यक्ति हूँ, इसके लिए तैयारी भी कर रहा था । इससे पहले भी कई बार केन्द्रीय सांसद् के लिए प्रतिस्पर्धा किया । लेकिन मुझे तत्कालीन फोरम नेतृत्व (उपेन्द्र यादव) की ओर से कहा गया कि प्रदेश नं. २ में मधेशवादी दलों की नेतृत्व में सरकार बनने की संभावना है, आप प्रदेश में प्रतिस्पर्धा कीजिए, आप को महत्वपूर्ण जिम्मेवारी दी जाएगी । लेकिन प्रतिबद्धता के अनुसार मुझे कोई भी जिम्मेदारी नहीं दी गई । आज के दिन मैं पार्टी में केन्द्रीय सदस्य हूँ और अपने क्षेत्र का सांसद् हूँ । इसके अलवा मुझे अन्य कोई भी जिम्मेदारी नहीं है ।

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नेपाल एक बहुराष्ट्रीय देश
कुछ लोग आज भी कहते हैं– तराई को एक अलग देश बनाया जाए । एक समय मैं भी इसी मान्यता के साथ चल रहा था । लेकिन बाद में महसूस हो गया कि ऐसी परिस्थिति नहीं है । जिस उद्देश्य के साथ मैंने सशस्त्र युद्ध किया, उसके प्रति भी कोई पश्चताप नहीं है । लेकिन एक बात सच है कि जहां विभेद होता है, वहां विद्रोह स्वभाविक है । तराई–मधेश में केन्द्रीत जितना भी आन्दोलन है, वह सब काठमांडू में रहनेवाले खस शासक वर्ग के प्रति व्यक्त आक्रोश है । मैंने तो एक बार प्रस्ताव भी किया था– नेपाल को एक हिमालय स्टेट (युनियन) के रूप में विकास किया जाए । मेरा मतलब है कि जिसतरह युरोपियन युनियन है, उसीतरह नेपाल में भी सब को मिलाकर एक युनियन के रूप में विकास किया जाए, क्योंकि नेपाल एक बहुराष्ट्रीय देश है । लेकिन इसको सुनने के लिए यहां कोई तैयार नहीं है ।

बाद में मैं समझा कि नेपाल को पूर्ण समावेशी बनाया जाए । लेकिन आज यह भी नहीं हो रहा है । हम लोग मधेश में रहनेवाले हैं, लेकिन पहाड में रहनेवाले हम लोगों को देखकर ‘बिहारी’ और ‘धोती’ कहते हैं । हम लोगों के लिए इससे बड़ा अपमान क्या है ? अन्तर–विरोध हर समाज में होता है । अर्थात् विश्व के हर देशों में सामाजिक अन्तर विरोध है । लेकिन हमारे यहां राष्ट्रीयता को लेकर अपमानित किया जाता है और कहा जाता है कि हम लोग नेपाली नहीं है ।

नेपाल बनने से पहले हजारों साल से ही तराई में हमारे पूर्वज रहते थे । वास्तविकता तो यह है कि काठमांडू में रहनेवाले शासक वर्ग के पूर्वज नेपाली नहीं है, वे लोग बाहर से आए हैं । बाहर से आकर हम लोगों के ऊपर शासन करनेवाले लोग ही जब हम लोगों को ‘नेपाली नहीं हैं’ कहते हैं तो खून खौलता है । हमारी लड़ाई इसी विषय को लेकर है अर्थात् हमारी लडाई पहचान की है । अगर हम लोग भी इस देश कें नागरिक हैं तो समान अधिकार और सम्मान मिलना चाहिए । नहीं तो विद्रोह स्वाभाविक है ।

जहां से धान, चावल, गेहूं लाकर खाते हैं, वही रहनेवाले लोगों को ‘विदेशी’ कहा जाता हैं तो विभेद में रहनेवाले लोग को खुद को ‘नेपाली’ कहने की कोई भी बाध्यता नहीं है । इसतरह विभेद में पड़नेवाले व्यक्ति बोल सकता– ‘आप अपना कीजिए, मैं अपना करता हूँ ।’ इस सवाल को लेकर भी बहस सिर्जना हो सकती है । ऐसी बहस और मानसिकता विकास ना हो, इसके लिए पहाड़ में रहनेवालों की मानसिकता परिवर्तन होना जरुरी है । अगर मानसिकता परिवर्तन नहीं होगा तो अन्ततः परिणाम… । इसीलिए देश में व्याप्त सामाजिक और राजनीतिक विभेद जब हट जाएगा, जब हिमाल से लेकर तराई में रहनेवाले सभी समुदाय को समान अधिकार और पहचान मिलेगा, तब आपसी भाईचारा विकास होगा, आत्मियता एकता रहेगी । उसके बाद ही समृद्ध नेपाल संभव है ।

गिरफ्तार होने से बच गए
वि.सं. २०७६–०६८ साल की बात है, उस वक्त हम लोग भूमिगत राजनीति में क्रियाशील थे । नेपाल सकार का पुलिस प्रशासन गिरफ्तारी के लिए हम लोगों को खोज रहा था । यूपी (भारत) स्थित प्रख्यात एक मन्दिर के पास रहे धर्मशाला में पार्टी की मिटिङ हो रही थी । मिटिङ खतम होने के बाद हम लोग वहां से निकल गए । उसके कुछ ही देर बाद ही भारतीय पुलिस के साथ नेपाली पुलिस वहां पहुँच गई । हम लोग बालबाल बच गए ।

हम लोग यहां मिटिङ कर रहे हैं, ऐसी सूचना पुलिस प्रशासन तक पहुँचानेवाले कौन है ? यह अभी तक मुझे पता नहीं चला है । एक स्मरणीय बात है कि युद्धकाल में हम लोग भारत में भी रहते थे और नेपाल में भी रहते थे । सामान्यतः मैं अपने जिला पर्सा–बारा में नहीं रहता था । नेपाल में रहते वक्त मैं विशेषतः धनुषा और सर्लाही जिला में ज्यादा रहता था । जहां भी रहा, उच्च सतकर्ता के साथ रहना पड़ता था । क्योंकि भारत में सोते वक्त भारतीय पुलिस आकर हम लोगों को गिरफ्तार ना करें, इसका डर हरदम रहता था । हां, वहां की जो जनता हैं, उन लोगों का सहयोग हरदम रहता था । कुछ हद तक स्थानीय स्तर में राजनीतिक सहयोग भी रहता था ।

उस वक्त हम लोगों को यह भी आरोप लगा कि इन लोगों को भारतीय गुप्तचर विभाग ‘रअ’ ने परिचालित किया है । लेकिन इसमें कोई भी सत्यता नहीं है । सच्चाई तो यह है कि अगर कोई व्यक्ति तराई–मधेश की हित सोचकर कुछ मुद्दा लेकर आता है तो उसके ऊपर ‘रअ’ से परिचालित होने का आरोप सहज ही लग जाता है । अर्थात् तराई में उठनेवाला हर आन्दोलन को भारत से जोड़कर देखा जाता है, यह दरिद्र मानसिकता की उपज है ।

 राजनेता नहीं है
हम लोगों ने नेपाल में बहुत सारे नेता को जन्म दिया है, लेकिन राजनेता को जन्म देने में आज तक हम लोग असफल रहे । हमारी मानसिकता आज भी पिछड़ी हुई है । उदाहरण के लिए आज भी कुछ लोग नारा लगाते हैं– राजा आऊ देश बचाऊ अर्थात् राजा आए और देश को बचाए । लेकिन देश बचानेवाला राजा नहीं, जनता है ! इस बात को हम लोग कब समझ पाएंगे ? नेताओं के प्रति बढ़ती असन्तुष्टि के कारण भी ऐसे नारा लगने लगे हैं । इसीलिए नेताओं को भी सुधरने की जरुरत है ।

कुछ लोग कहते हैं कि गणतन्त्र आने के बाद ही सारी विकृतियां आई है, यह झूठ है । विकृतियां तो पहले भी थी । विशेषतः कांग्रेस और एमाले शासनकाल में अधिक विकृतियां दिखाई दी । भ्रष्टाचार और छाडातन्त्र इसी कालखण्ड में देखने को मिला । अपने को परिवर्तनकारी शक्ति कहलानेवाले पार्टियों के भीतर भी कमी–कमजोरियां है । हम लोगों ने नयी व्यवस्था तो लाया, लेकिन नेता और चरित्र पुराने ही होने के कारण जनता में बितृष्णा भी बढ़ रही है । इसीलिए सब को सुधरने की जरुरत है । राजनीति करनेवाले को सिर्फ ‘नेता’ नहीं, ‘राजनेता’ बनने की मानसिकता से चलना चाहिए ।

पश्चाताप
मैंने जीवन का प्रारम्भिक कालखण्ड अर्थात् ऊर्जाशील समय वामपन्थी आन्दोलन में बिताया, जो लगभग ४० साल का रहा । इसके प्रति मेरा पश्चाताप है । जिस वक्त मैं आन्दोलन में था, उस समय तो कुछ भी पश्चाताप नहीं था । लेकिन आज अपनी राजनीतिक इतिहास के प्रति झांकता हूं तो पश्चाताप हो जाता है । वामपन्थी कहलानेवालों की जीवन शैली, उन लोगों के द्वारा संचालित सरकार देखता हूं तो मुझे घिन आती है । मैंने सपना में भी नहीं सोचा था कि गरीब, पिछड़ा हुआ वर्ग और समुदाय के उत्थान के लिए लड़नेवाले व्यक्ति इसतरह खुद गिर जाएंगे ।
आजकल
सामान्यतः हरदिन प्रणाम और योग का अभ्यास करता हूँ । लेकिन पिछली बार स्वास्थ्य (आंख) में समस्या, कोरोना वायरस से सिर्जित परिस्थिति जैसे कुछ घटना, राजनीतिक दौडधूप के कारण आजकल सब छूट भी रहा है । अगर राजनीतिक एवं प्रशासनिक दौड़धूप से फुर्सत का कोई समय निकलता है तो मैं अध्ययन करना चाहता हूँ । विशेषतः राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं इतिहास संबंधी विषय मेरी प्राथमिकता रहती है । मेरा पारिवारिक पृष्ठभूमि हिन्दू सनातन धर्म से जुड़ा हुआ है, लेकिन पूजापाठ में ज्यादा विश्वास नहीं है, इसीलिए नहीं करता । मेरी नजर में धर्म एक जीवन जीने की कला है, लेकिन धर्म के भीतर ही कुछ ऐसी प्रावधान, परम्परा, आडम्बर, विभेद और अन्ध–विश्वास है, जिसको हटाने की जरुरत है ।
जीवन एक ही है
अध्यात्मवादी लोग कहते हैं– जीवन कुछ भी नहीं है अर्थात् क्षणभंगुर है । लेकिन मैं इसमें विश्वास नहीं करता । क्योंकि मेरे खयाल में जीवन महत्वपूर्ण है । माक्र्सवाद और द्वन्द्ववाद को मैने अध्ययन किया हैं, उसका प्रभाव मुझमें है, उसके आधार पर मैं भौतिकवादी हूँ । अर्थात् जीवन एक ही है । ना इससे पहले था और ना ही पीछे होनेवाला है । अर्थात् मैं पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करता । जो कुछ करना है, इसी जीवन में करना है, मानव कल्याण और समाज कल्याण के लिए करना है । इन्सान होने की पहचान रखना है तो इसी जीवन में रखना है । मैं ऐसी मान्यता रखता हूँ ।

अध्यात्म को सुख और खुशी के साथ भी जोड़कर देखा जाता है । लेकिन सुख और खुशी किसी को भी प्राप्त होनेवाला नहीं है । जो खुशी और सुख की अनुभूति होती है, वह क्षणिक है । इसका मतलव मानव जीवन ही दुःख का कारण है । कुछ लोगों की कल्पना रहती है कि अपार धन–दौलत में सुख और खुशी मिलती है । लेकिन ऐसा नहीं है । खुशी और सुखी रहने के लिए धन–दौलत के साथ अधिक संबंध नहीं है । ‘खुशी’ और ‘सुखी’ जटिल शब्द है । आज तक संसार में किसी को नहीं मिली है और ना ही मिलनेवाला है । हां, आपके पास जो है, जितना है, उसमें सन्तुष्ट रह जाएंगे तो आप को सन्तुष्टि मिलेगी, वही आप के लिए खुशी और सुख भी है । अगर आप ज्यादा प्यासा और भूखा रहेंगे तो आप को खाने के लिए अन्न भी मिल जाएगा, पीने के लिए पानी भी मिल जाएगी, लेकिन सन्तुष्टि नहीं मिलेगी । मैं राजनीतिक कार्यकर्ता हूँ, यही मेरी जीवन है, यही मेरा सुख और दुःख भी है । राजनीतिक बहस होना, संघर्ष होना आम बात है । यह एक प्रक्रिया भी है । अपने इच्छा के अनुसार कुछ नहीं होगा तो दुःखी होने की जरुरत भी नहीं है । यही संघर्ष और प्रक्रिया ही जीवन है ।

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