इन्सानियत सिसक रही है चप्पे चप्पे पर हो लहुलुहान ! : इन्दु तोदी
<pre>” दीप दिवाली के “
अन्तस राग द्वेष ईर्ष्या के काले धब्बे पड़े रह गए
ज्यों के त्यों,
बाहर बेजान फर्श दीवारों को खूब चमकाने लगे !
माँ, बेटी,पत्नी, बहन जिती जागती गृह लक्ष्मीयों के
आत्म सम्मान को रख ताक पर ये किस लक्ष्मी को
मनाने लगे!
विदीर्ण किया था मन भाई का कभी मद में हो चूर !
फिर दर्जी के पास कौन से नए कपड़े सिलवाने लगे!
इन्सानियत सिसक रही है चप्पे चप्पे पर हो लहुलुहान!
फिर वो कौन है जिसे भर बाहों मे गले लगाने लगे !
हर किसी को निचा दिखाने की होडबाजी सी चल रही
फिर ये किस की नजरों में उठने की कोशिश करने लगे!
प्रेम चटाइ बैठ कभी दुःख सुख का पुछा नही पड़ोसी को
फिर किस स्नेह ,,भाईचारे की दुहाई देने लगे!
खुन पसीना सिंचता गरीब पर मुस्कान को है मोहताज!
फिर किस फर्ज अदायगी के किस्से जग जाहिर करने लगे !
त्यौहारों की आड़ में कर रहे वैभवता की खूब नुमाइशें,
फिर ये किस श्रद्धा भक्ति से भगवान रिझाने लगे !
वो बुजुर्ग दीया अपनेपन के अहसास के तेल बिना
है बुझ सा गया
फिर घर के कोने कोने मे कैसी रोशनी सजाने लगे !
आइये इस दिवाली कुछ ऐसे दीप ले आएं !
नेह से नेह की लौ जलाएँ !!
जिस के तेज में हर रुह जगमग झिलमिलाने लगे !!!<\pre>



