तुम मेरे भीतर सांस लेती हो : हरिमोहन
<pre>तुम मेरे भीतर सांस लेती हो
जब बरसात हो रही हो और
मन हो कॉफ़ी हाउस जाने का,
गर्म कॉफी के साथ अपने पसन्द के
रोल सैंडविच खाने का,
तो मुझे पहन कर निकल जाया करो
तुम मेरे भीतर सांस लेती हो।
जब बर्फ पर घूमने का मन हो कभी,
रास्ते भर बर्फ हो, दर्रे हों,हिमनद हों
मैं अपनी पीठ पर उठाए
पार कराऊंगा सभी।
तुम मेरे भीतर सांस लेती हो।
गर्मियों में पाँव तपें रेत पर
फिर भी जरूरी काम से जाना हो,
थकी किसी यात्रा से लौटकर आना हो,
मेरा हाथ छाते की तरह पकड़े रहना,
तुम मेरे भीतर सांस लेती हो।
पतझड़ भी आएगा, हवाएं भी चलेंगी
फूल भी झरेंगे, पत्तियां भी गिरेंगी।
मैं पेड़ हूँ, खड़ा मिलूँगा,
तुम बदलते मौसम की प्रतीक्षा करना,
तुम मेरे भीतर सांस लेती हो।
प्रो. हरिमोहन
आगरा</pre>


