आनन्द उल्लास महकाकर, गमके तब दीपक जलता है : डा. देवनारायण शर्मा
<pre)“मज़मून – 340”
*दीपोत्सव*
पुलकित अंग प्रेमाश्रुओं से,
दहले तब दीपक जलता है
नयनों में नवल प्रीति खिलकर,
झलके तब दीपक जलता है
अनुपम निर्मल सरस भावना,
कमल हृदय पर झरने लगती
आंखों में करुणा के आँसू,
छलके तब दीपक जलता है।
सबको साहस देने वाले,
आनन्द मग्न होकर दिखते
जब पूर्ण प्रेम से निमग्न मन,
ललके तब दीपक जलता है।
मुखकमल प्रेमयुक्त भावना,
जब खिल खिलाकर खिलने लगे
मनहर नवल धवल बिचार,
महके तब दीपक जलता है।
समता समानता समरसता,
भाईचारा छाजाये दिल में
सुखदायिनी हो जाये सबकी,
पलकें तब दीपक जलता है।
शुभ दीपावली त्यौहार जब,
सुखद हर्ष व उल्लास बिखेरे,
आनन्द उल्लास महकाकर,
गमके तब दीपक जलता है।।

डा. देवनारायण शर्मा


