युवा आञ्चलिक कवि गिरिराज अटल की तीन कविताएँ
कविता-१
*दीया और जीवन*
आज दीपावली है,
ऊर्जा,ऊष्मा और रोशनी का त्योहार,
पूरा घर अति मनोहारी रूप में सजा है,
हर-एक दीये का नववधू-सा शृंगार हुआ है,
शाम ढलते ही इन दीयों में तेल और बाती डाले जायेंगे,
फिर रातभर ये रोशनियों से जगमगायेंगे,
अमावस की अंधेरी रात को ये करेंगे रौशन,
ये लड़ेंगे तमी के तम से,तमारि के आगमन तक,
तिमिर होने तक कुछ बुझ जायेंगे या बुझा दिए जायेंगे,
इनमें से कुछ को भविष्य के लिए सहेजा जायेगा,
बचे हुए मिट्टी के दीयों को पुनः मिट्टी में ही विसर्जित किया जायेगा
कभी मनन किया…
दीये की जीवनयात्रा बिलकुल हमारे जैसी ही तो है
कुम्हार बनाता है दीया मिट्टी और पानी से
होता है रोशन अग्नि और वायु की रवानी से
और आकाश …
आकाश भी तो पहले सूरज को छिपाता है
फिर इन दीयों की रोशनी को चारों ओर फैलाता है
यही तो है पंचतत्व का किस्सा
हाँ यही सच तो है हमारे भी जीवन का अभिन्न हिस्सा।
कविता-२
ज़रा कस के हाथ थामे रखना
कि मैं लड़खड़ाता बहुत हूँ
ख़ुद ही पूछ लेना हाल मेरा
कि मैं तुमसे छुपाता बहुत हूँ
जानते हो ना मामाजी
भीतर समंदर छुपाए हूँ फिर भी
मैं मुस्कुराता बहुत हूँ
कविता-३
*मेहनत लगती है*
*सपनों को सच बनाने में,*
*हौसला ज़रूरी होता है*
*बुलन्दियों को पाने में,*
*बरसो लग जाते हैं ज़िन्दगी बनाने में,*
*और ज़िन्दगी फिर भी कम पडती है रिश्ते निभाने में।!*

सुनसरी , नेपाल


