नेपाल–भारत सम्बन्ध -राजनयिकों की यात्रा से जगती उम्मीद : डॉ. श्वेता दीप्ति
इन प्रयासों के बीच ही हर तबके में यह जिज्ञासा है कि क्या आगामी दौरे और बैठकें औपचारिक बैठकों तक सीमित रहेंगी, या दोनों देशों के बीच गंभीर मुद्दों को सुलझाने की दिशा में कुछ प्रगति होगी ?
डॉ श्वेता दीप्ति,नवम्बर 2020 अंक । भारत द्वारा जारी नए नक्शे के जवाब में, नेपाल द्वारा जारी नए नक्शे के साथ ही दोनों देशों में बढ़े तनाव के बीच या यूँ कहें कि ठंडे पड़ रहे रिश्तों में एकबार फिर से सरगर्मी दिख रही है । वैसे यह नहीं कहा जा सकता कि इस सरगर्मी से कोई परिणाम जल्द ही सामने आएगा या फिर नेपाल की चीन के प्रति बढ़ी हुई सहृदयता में कोई कमी आएगी क्योंकि, सत्ता पक्ष की खिसकती कुर्सी को बचाने के लिए सम्भव है कि एक बार फिर से राष्ट्रवादरूपी महत्त्वपूर्ण तुरुप का पत्ता जनता के समक्ष पेश कर दिया जाए । क्योंकि यह हमेशा से होता आया है । भारत जितना सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर नेपाल के नजदीक है, उतना ही राजनैतिक स्तर पर दूर । बहरहाल रिश्तों को एक नई दिशा देने के लिए अनमने मन से ही सही सत्तापक्ष की और भारत सरकार की कोशिशें सामने आने लगी हैं ।
यह कोई अप्रत्याशित कदम नहीं है, देर–सबेर यह होना ही था क्योंकि, नेपाल के लिए भारत की महत्ता या फिर भारत के लिए सामरिक तौर पर नेपाल का महत्तव जगजाहिर है । दोनों देशों के राजनयिकों की मुलाकात और यात्राओं से यह कयास लगने लगे हैं कि नेपाल भारत के सम्बन्धों में एक बार फिर से सौहार्दपूर्ण परिस्थिति बन रही है । हालाँकि राजनीति में न तो कोई सदा के लिए दोस्त होता है और न ही सदा के लिए दुश्मन । ये रिश्ते अवसर और हित पर टिके होते हैं । फिलहाल अमेरिका की राजनीति में जो परिवर्तन हुआ है अर्थात् जो बाइडन की जीत और ट्रम्प की हार पर नेपाल में जो भावनाएँ देखी गईं अक्सर ये भावनाएँ यहाँ पाकिस्तान और भारत के सन्दर्भ में देखी जाती है, जब भारत से नाराजगी पाकिस्तान की जीत पर नजर आती है । ट्रम्प की हार को भारत के प्रधानमंत्री मोदी के साथ जोड़कर देखा जाना हास्यास्पद ही माना जाएगा क्योंकि, मोदी और ट्रम्प की दोस्ती व्यक्तिगत से अधिक दो राजनीतिक प्रतिनिधियों की है जो अपने–अपने देश के हितों को देखकर बनती या बिगड़ती है ।
आगे के समय में यह आत्मीयता जो बाइडेन के साथ देखी जा सकती है और दिखेगी भी क्योंकि भारत विश्वस्तर पर अपनी एक मजबूत स्थिति में मौजूद है और अमेरिका कभी भी भारत का साथ या सहयोग नहीं छोड़ेगा । जहाँ अमेरिका की नाराजगी खुलकर चीन के खिलाफ सामने आ रही है वहीं नेपाल एक कमजोर विदेश नीति के तहत विश्व के समक्ष खुलकर चीन के करीब नजर आ रहा है । हालाँकि यह राजनीति है, नेपाल प्रतिनिधि अगर आज चीन के करीब हैं तो कल भारत या अन्य देश के नजदीक हो सकते हैं क्योंकि यह नजदीकी देश हित के लिए होती है । वैसे यह दीगर है कि यहाँ राजप्रतिनिधि अक्सर व्यक्तिगत हित के आगे बेबस दिखते हैं । खैर, बात करुँ आज के हालात की, आज नेपाल और भारत के बीच सीमा विवाद शुरु होने के तकरीबन एक साल बाद औपचारिक बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ है । बैठकें होने लगी हैं और एक दूसरे पर भरोसा करने की प्रक्रिया जोरों पर है ।
पिछले तीन हफ्तों में, भारत के दो उच्च–रैंकिंग सुरक्षा अधिकारियों रॉ प्रमुख सामंत कुमार गोयल और थल सेनाध्यक्ष एमएम नरवाने ने नेपाल की आधिकारिक यात्रा की है । उन्होंने न केवल उच्च–स्तरीय बैठकें कीं, बल्कि सरकारी अधिकारियों ने भी द्विपक्षीय मुद्दों पर सौहार्दपूर्ण बातचीत करने का दावा किया है, यानि हम यह कह सकते हैं कि आसार अच्छे नजर आ रहे हैं ।
इसके बाद ही, प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली कोरोना कहर और अपने ऑपरेशन के बाद पहली बार संखुवासभा में अरुण क्ष्क्ष्क्ष् जलविद्युत परियोजना के काम की निगरानी भी की और द्विपक्षीय परियोजना के कार्यान्वयन के बारे में भारतीय प्रधानमंत्री मोदी को एक सकारात्मक संदेश देने की कोशिश की है ।
सीमा विवाद के बीच नेपाल ने नए नक्शे को जारी किया था और उसी समय से कोविड का कहर भी जारी था । जिसके बीच नेपाल की वार्ता करने पहल को भारत नकारता रहा । किन्तु अब इसी कोरोना के साथ जीने की आदत पड़ गई है शायद इसलिए कोरोना की बढ़ती संख्या के बीच भी बैठकों और यात्राओं का सिलसिला जारी हो गया है । कड़वाहट को कम करने की कोशिश की जा रही है ।
तनाव के कारण बंद हो चुकी तंत्र की बैठक बुलाने की प्रक्रिया आगे बढ़ गई है। रुकी हुई परियोजनाएँ फिर से रफ्तार पकड़ रही है । सरकारी अधिकारियों के अनुसार, प्रधान मंत्री केपी शर्मा ओली और भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी संयुक्त रूप से किसी महत्वपूर्ण द्विपक्षीय परियोजना का उद्घाटन करने वाले हैं और यह संदेश देने वाले हैं कि दौर बदल रहा है और एकबार फिर नजदीकी भी बढ़ने वाली है।
इसी बीच नेपाल के लिए भारतीय राजदूत क्वात्रा ने भी अपनी मुलाकात और विचार विमर्श का दायरा बढ़ा दिया है । उनकी द्विपक्षीय मुद्दों पर विदेश सचिव भरत पौडेल के साथ हाल में ही एक लंबी बातचीत हुई जिसमें उन्होंने कहा कि भारत नेपाल के साथ विवादास्पद मुद्दों को सुलझाने के लिए प्रयासरत है ।
खबर है कि भारतीय दो महत्त्वपूर्ण पदाधिकारियों की यात्रा के बाद अब काठमान्डू एक और अतिथि के स्वागत के लिए तैयार है । भारतीय विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला यूरोप के विभिन्न देशों का दौरा करने के बाद, नेपाल की यात्रा पर आने वाले हैं । यह भारत की एक और पहल मानी जा सकती है । संवाद ही समस्याओं का निदान निकाल सकता है । भारतीय विदेश सचिव, जो नेपाली धाराप्रवाह बोलते हैं और नेपाल और भूटान मामलों के जानकार हैं, वो २६–२७ नवंबर को नेपाल आने वाले हैं ।
भारतीय विदेश सचिव की यात्रा के बाद, विदेश मंत्री प्रदीप कुमार ग्यावली दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की सह–अध्यक्षता वाली संयुक्त आयोग की बैठक के लिए नई दिल्ली जाने वाले हैं। यही नहीं, नेपाल के राजनीतिक नेताओं के साथ अच्छे व्यक्तिगत संबंध रखने वाले भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के भी नेपाल आने की संभावना है। दोनों देशों की यात्रा की तैयारी के लिए, विदेश मंत्रालय ने नई दिल्ली में नेपाली दूतावास के मिशन प्रमुख के रूप में राम प्रसाद सुबेदी को नियुक्त किया है और तैयारी की हिदायत दी गई है ।
इन सभी घटनाक्रमों से संकेत मिलता है कि द्विपक्षीय संबंध सही दिशा में बढ़ रहे हैं। इसी बीच भारतीय दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित एक लेख में, नेपाल में पूर्व भारतीय राजदूत मंजीब सिंह पुरी ने कहा, “भारतीय सेना प्रमुख के लिए नेपाल का निमंत्रण और इसे स्वीकार करने का भारत का निर्णय नियमित बातचीत शुरू करने की पारस्परिक इच्छा को दर्शाता है ।”
इन प्रयासों के बीच ही हर तबके में यह जिज्ञासा है कि क्या आगामी दौरे और बैठकें औपचारिक बैठकों तक सीमित रहेंगी, या दोनों देशों के बीच गंभीर मुद्दों को सुलझाने की दिशा में कुछ प्रगति होगी ?
भारत के रक्षा मन्त्रालय मातहत के थिंक टयाङ्क मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान में नेपाल–भारत मामला सम्बन्धी अनुसन्धान कर रहे डा. निहार आर नायक का मानना है कि दोनों देशों के बीच हो रहे उच्चस्तरीय भ्रमण के समय में सीमा–सम्बन्धी विषय में भी बातचीत होगी ।
उनका कहना है कि, “बेशक, ये यात्राएँ दोनों देशों के नेताओं और अधिकारियों को पारस्परिक हित के मुद्दों पर चर्चा करने का अवसर प्रदान करती है।”
वहीं नेपाल अब केवल कालापानी ही नहीं, लिम्पियाधुरा, लिपुलेख भी अपने अधिकार में चाहता है। पहले भी दोनों देशों के विदेश सचिवों की कई बैठकें सुस्ता और कालापानी के मुद्दे पर हुई हैं, और सहमति भी हुई हैं लेकिन इसे अभी तक लागू नहीं किया गया है।
विश्लेषकों का मानना है कि सीमा विवाद पर चल रही बातचीत से तुरंत किसी निष्कर्ष पर आने की सम्भावना कम है, फिर भी बातचीत की शुरुआत होने से सुधार और परिणाम की संभावना बनी रहती है । विश्लेषकों के अनुसार, नेपाल और भारत दोनों इस समय बातचीत को आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं ।
इस समय सर्वव्यापी चिंता की बात यह है कि सीमा विवाद पर द्विपक्षीय वार्ता कहाँ तक जाएगी। नेपाल अपने पुराने रुख को स्पष्ट कर चुका है । नेपाल की माँग है कि, भारतीय सैनिकों को कालापानी से हटना चाहिए। हालाँकि, भारत द्वारा मानचित्र जारी करने के बाद, नेपाल ने संविधान में संशोधन किया और लिम्पियाधुरा और लिपुलेक तक के क्षेत्र को अपने मानचित्र में शामिल कर लिया है । ऐसी स्थिति में क्या अकेले कालापानी से भारतीय सैनिकों की वापसी से नेपाल संतुष्ट हो जाएगा ?
प्रधान मंत्री केपी शर्मा ओली और विदेश मंत्री प्रदीप कुमार ज्ञवाली ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि, भारत को अपनी सेना को कालापानी से तुरंत वापस बुला लेना चाहिए। वर्तमान में नेपाल और भारत के बीच गहन संवाद शुरू हो चुका है और यह सकारात्मक रुख है। किन्तु यह भी निर्विवाद है कि, इतनी आसानी से इस समस्या का निदान नहीं होने वाला है । कुछ समय पहले भारत के हिंदू अखबार के साथ एक साक्षात्कार में, मंत्री ज्ञवाली ने कहा था, “भारत को सुगौली संधि की भावना का पालन करना चाहिए और भारत के लिए सबसे अच्छा विकल्प है कि वह वहां से अपनी सेना हटा ले।” ज्ञवाली ने यह भी कहा कि नेपाल ने किसी अन्य विकल्प पर विचार नहीं किया है। इस पर जवाब में, भारतीय अधिकारियों ने कहा कि वार्ता से पहले नेपाल ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है ऐसे में वार्ता का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि नेपाल ने स्वयं निष्कर्ष और परिणाम जाहिर कर दिया है ।
भारत ने अभी तक कालापानी से सैनिकों को हटाने वाले नेपाल के रुख के बारे में कुछ नहीं कहा है। परन्तु यह जाहिर कर दिया है कि भारत का दावा हमेशा से उन क्षेत्रों पर है और वह भारत का हिस्सा है, नेपाल ने कृत्रिम रूप से उनका विस्तार किया है। वहीं नेपाल अब केवल कालापानी ही नहीं, लिम्पियाधुरा, लिपुलेख भी अपने अधिकार में चाहता है। पहले भी दोनों देशों के विदेश सचिवों की कई बैठकें सुस्ता और कालापानी के मुद्दे पर हुई हैं, और सहमति भी हुई हैं लेकिन इसे अभी तक लागू नहीं किया गया है।
तो अब सवाल यह है कि क्या इस मुद्दे पर आगामी विदेश सचिवों की वार्ता में कोई चर्चा होगी? या अतीत की ही तरह ये बैठकें भी बिना किसी एजेंडे के होगी और समाप्त हो जाएगी। वैसे माना जा रहा है कि, नेपाल विदेश सचिव और विदेश मंत्री दोनों ही आगामी बैठकों में सीमा विवाद का मुद्दा उठाएँगे । इस मुद्दे को हल करना बहुत चुनौतीपूर्ण है। लेकिन, नेपाल इस मुद्दे को आगे बढ़ाएगा, नेपाल ने भारत के साथ बातचीत करने के लिए एक विशेषज्ञ टीम तैयार की है ।
भू–राजनीतिक विश्लेषक जेजा शर्मा वागले ने कहा है कि अगर दोनों देशों के बीच संवादों की श्रृंखला शुरू हो भी जाती है, तो भी यह आशा करना मुश्किल होगा कि दोनों देशों के बीच विवादित मुद्दा आसानी से सुलझ जाएगा। उन्होंने कहा, “बातचीत की शुरुआत का मतलब समस्या का समाधान नहीं है । यह सिर्फ शुरुआत है ।”
हालांकि, नेपाल और भारत के बीच सीमा विवाद पिछले दो वर्षों से नहीं बल्कि कई वर्षों से है । हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच कई समस्याएं पैदा हुई हैं। परन्तु कोई समाधान नहीं मिला है। यही वजह बनी है कि चीन नेपाल के करीब आया है । कहावत है कि दो की लड़ाई के बीच में तीसरे को फायदा होता है जो नेपाल की राजनीति और चीन की विदेश नीति में स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है । चीन की नीति तो जग–जाहिर है । सहायता की आड़ में विस्तार की नीति के साथ ही चीन विश्व–शक्ति बनने का सपना देखता आया है और इसके लिए वह कमजोर देशों को हथियार बनाकर आगे बढ़ रहा है । मजे की बात तो यह है कि इसमें वह आसानी से कामयाब भी हो रहा है । विकास के सपने देखने वाले देश स्वयं ही विनाश की राह चुन रहे हैं और अपने देश को गिरवी रखने की हालत पैदा कर रहे हैं ।
इसी सन्दर्भ में वहीं अगर भारत की विदेश नीति देखें तो एक बड़ा फर्क स्पष्ट नजर आता है । भारत की किसी देश को दी गई आर्थिक सहायता से उसके लिए कभी मुश्किल पैदा नहीं होती है । भारत की सहायता बिना शर्त होती है जिससे मुश्किल पैदा होने की कोई आशंका नहीं होती । भारत की सहयोगी देश को दी गई सहायता में विकास को प्राथमिकता दी जाती है। भारत का विकास को लेकर सहयोग उसके सहयोगी देश की जरूरत के मुताबिक होता है। भारत बुनियादी जरूरतों वाली परियोजनाओं जैसी कार्य कर सहयोगी देश की क्षमता को बढ़ाता है । जिसके कई उदाहरण नेपाल में भी है । किन्तु अतीत में अपने द्वारा की गई गलती के बावजूद भारत पर दोषारोपण करना यहाँ की राजनीति रही है और यही राजनीति आम जनता के दिलों में भी जहर घोलती आई है । विगत में हमारे प्रतिनिधियों ने जो गलती की उसका खामियाजा आने वाली पीढ़ी को भुगतना ही होता है । गलती हुई है हमसे ही पर ठीकरा किसी और के सर पर फोड़ने की हमारी आदत रही है । गालिब का एक शेर याद आता है–“ताउम्र गालिब ये भूल करता रहा धूल चेहरे पर थी और आईना साफ करता रहा ।”
बहरहाल नेपाल और भारत के रिश्तों की उलझी हुई परतों को सुलझाने की आवश्यकता है और इसके लिए भारत को भी ईमानदारी और नेपाल को विश्वास में लेकर आगे आने की आवश्यकता है क्योंकि ये दो अलग देश होने के बावजूद एक शरीर के दो हिस्सों की तरह है जहाँ दोनों की अहमियत बराबर है । जाते हुए वर्ष के साथ ही यह उम्मीद करें कि हमारे रिश्ते एक बार फिर से सुदृढ़ और प्रगाढ़ हों । बातचीत और मुलाकात ही आगे की राह खोल सकती है और किसी निष्कर्ष पर पहुँचा सकती है ।

